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लॉकडाउन – गुड़गांव में बच्चों को भूखा नहीं देख सका लाचार पिता, आत्महत्या की

प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि लॉकडाउन के कारण जो लोग कष्ट उठा रहे हैं, वह देश हित में योगदान दे रहे हैं। तो क्या मुकेश जैसे गरीब मज़दूरों की भूख और आत्महत्या देशहित में योगदान है? 

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एक तरफ़ जब देश की गरीब जनता के खातों में जनधन योजना के तहत 500 रुपये डालने का ढिंढोरा अश्लील सरकारी प्रचार अभियान के सहारे पीटा जा रहा था, हरियाणा के गुड़गांव के सेक्टर 53 में एक मज़दूर मुकेश (30) ने बच्चों का पेट न भर पाने की निराशा में आत्महत्या कर ली। बिहार के मधेपुरा से मज़दूरी करने आये मुकेश पर उसके चार बच्चों, पत्नी, सास और विकलांग ससुर की ज़िम्मेदारी थी। मुकेश की सबसे छोटी बच्ची 5 महीने की है।

गुड़गांव के सेक्टर 53 के डीएलएफ फेज़ 5 में स्थित पारस अस्पताल के पास करीब आधे किलोमीटर के अंतराल पर स्वरस्वती कुंज नामक बस्ती है, जहां टीन के छप्परों के कई सारे क्लस्टर बने हुए हैं, और हर क्लस्टर में 250-300 झुग्गियां बनी हुई हैं। इस इंडस्ट्रियल इलाके में बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच बनी यह मज़दूर बस्तियां, दरअसल टिन की बनी झुग्गियां हैं, जहां 500 से ज़्यादा मज़दूर परिवार रहते हैं। मुकेश की पत्नी के दो भाई भी इसी झुग्गी में ही रहते हैं। मुकेश इनके साथ ही निर्माणाधीन साइटों पर पेंट, पीओपी और पुट्टी का काम करते थे। 

वहां रहने वाले मज़दूरों के अनुसार लॉकडाउन के पहले भी मुकेश को लगातार काम नहीं मिल पा रहा था। कोरोना की मार और लॉकडाउन से एक महीने पहले से ही मुकेश को कोई काम नहीं मिल पाया था। बताया यह भी जा रहा है कि ठेकेदार के पास मुकेश के पैसे भी बकाया थे, जो लॉकडाउन की वजह से नहीं मिल पा रहे थे, जिससे घर की हालत और ज़्यादा ख़राब हो गयी थी। इन दिनों उनका परिवार पड़ोसी मज़दूरों के दिये खाने से अपना पेट भर रहा था।

परिवार ने पिछले चार दिनों से कुछ नहीं खाया था। मुकेश को जब कोई रास्ता नहीं दिखायी दिया तो उसने बीते गुरुवार को अपना मोबाइल, जिसकी कीमत लगभग 12000 थी, बेच दिया था, जिसके उसे 2500 रुपये मिले थे। टिन के शेड रहने के कारण हालिया दिनों की बढ़ती गर्मी व तेज़ धूप से उसके बच्चे सो नहीं पा रहे थे तो उसने एक छोटा पंखा खरीदा था और कुछ पैसों का राशन लेकर आया था, तथा बचे 400 रुपये पत्नी को दे दिये थे। उसी रात उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। 

मुकेश के ससुर उमेश का करीब 7 महीने पहले एक्सीडेंट हो गया था, जिसके बाद वे पैर से विकलांग हो गये थे. उमेश का कहना है कि परिवार में बेहद गरीबी थी, घर में कुछ बचा नहीं था और हमारा खाना-पीना सब बंद हो गया था। जिस वक़्त मुकेश ने फांसी लगा ली, उस वक़्त वे पास के मंदिर में बंट रहा खाना लेने गये थे।

 

 

मुकेश के परिवार के अनुसार पुलिस को जब मामले का पता चला, तो उन्होंने घरवालों पर दबाव बनाकर जल्दीबाज़ी में मुकेश का अंतिम-संस्कार करवा दिया। अंतिम संस्कार करने के लिए भी परिवार को लगभग 5000 का उधार लेना पड़ा। गुड़गांव प्रशासन व पुलिस का कहना है कि मुकेश डिप्रेशन का शिकार था, इसलिए आत्महत्या कर ली।

झुग्गी में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बंगाल आदि राज्यों के मज़दूर रहते हैं। इन सभी मज़दूरों व उनके परिवारों की हालत भी ख़राब है. इनका कहना है कि सरकार को हम सभी परिवारों को मुफ़्त में राशन उपलब्ध करवाना चाहिए और गुज़ारे के लिए कुछ पैसे भी दिये जाने चाहिए, अन्यथा अन्य परिवारों का हाल भी ऐसा हो सकता है। जिन झुग्गियों में ये मज़दूर रहते हैं, उसका किराया 1500 रुपये है, जिसे भरने के लिए भी उन पर दबाव डाला जा रहा है। 

मुकेश की जान किन वजहों से गयी? क्या इसके लिए कभी कोई जवाबदेही तय होगी? प्रधानमंत्री जी ने 14 अप्रैल के भाषण में कहा था कि लॉकडाउन के कारण जो लोग कष्ट उठा रहे हैं, वह देश हित में योगदान दे रहे हैं। तो क्या मुकेश जैसे गरीब मज़दूरों की भूख और आत्महत्या देशहित में योगदान है? 

(फीचर्ड/आर्टिकल इमेज विशाल सिंह के फेसबुक वाल से साभार)

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