ठगी के विज्ञापनों के लिए ज़िम्मेदार ठहराये जायें संपादक !

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भारतीय प्रेस परिषद को पत्रकार विष्णु राजगढ़िया का पत्र

सेवा में,
माननीय अध्यक्ष,
भारतीय प्रेस परिषद
सूचना भवन, 8-सी.जी.ओ. काॅम्पलेक्स
लोदी रोड, नई दिल्ली – 110003

पत्रांक 63/2017 दिनांक 08-02-17

संदर्भ – संचिका संख्या 14/191/2016-17 की सुनवाई दिनांक 07.02.2017

विषय – संपादकीय स्वतंत्रता को ठगी के विज्ञापन के दबाव से मुक्त करना तथा ठगी संबंधी विज्ञापनों के संबंध में अखबारों का दायित्व निर्धारित करना

मान्यवर,
कल दिनांक 07.02.2017 को कोलकाता में सुनवाई के क्रम में माननीय जांच समिति द्वारा मुझे बताया गया कि किसी अखबार में नौकरी अथवा प्रशिक्षण के नाम पर ठगी संबंधी विज्ञापनों की जांच करना किसी अखबार के लिए संभव नहीं। ऐसे विज्ञापनों के प्रकाशन से पूर्व और पश्चात बरते जाने लायक सावधानियों के संबंध में मेरे विभिन्न सुझावों के अनुरूप कोई दिशानिर्देश जारी करने पर भी माननीय जांच समिति की सहमति नहीं दिखी। यहां तक कि अखबारों में ठगी संबंधी विज्ञापनों और समाचारों के लगभग पचास से भी ज्यादा उदाहरणों के साथ मेरे द्वारा प्रस्तुत खोजपरक और तथ्यात्मक संचिका को भी माननीय जांच समिति द्वारा मुझे वापस लौटा दिया गया जबकि उस संचिका से इस परिघटना को समझने में काफी मदद मिल सकती थी।

उक्त आलोक में कल रात कोलकाता से निराश लौटते वक्त मैंने निश्चय किया था कि इस मामले में दुबारा भारतीय प्रेस परिषद को कष्ट नहीं दूंगा। लेकिन आज ही सुबह देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्र दैनिक जागरण के पटना संस्करण में पेज 18 पर प्रकाशित विज्ञापन “महिला व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान“ ने मुझे पुनः यह पत्र लिखने को विवश किया है। आशा है, माननीय भारतीय प्रेस परिषद इसे अन्यथा नहीं लेकर देश में पत्रकारिता के समक्ष एक बड़ी चुनौती के तौर पर लेगा।

विषय की गंभीरता स्पष्ट करने के लिए मैं एक विशेष अनुरोध की अनुमति चाहता हूं। मुझे जीवन में अपनी योग्यता/क्षमता के अनुरूप समुचित पद एवं अवसर मिले और कभी किसी जालसाजी का शिकार नहीं होना पड़ा। आपने भी देश की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे गरिमामय पद को सुशोभित किया और अब भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष का महती दायित्व है। भारतीय प्रेस परिषद के अन्य माननीय सदस्यों को भी जीवन में अपनी क्षमता एवं योग्यता के अनुरूप महत्वपूर्ण अवसर मिले। हममें से किसी के साथ भी ऐसा नहीं हुआ होगा, जो आज देश के लाखों बेरोेजगारों के साथ हो रहा है। हमें निश्चय ही ऐसे बेरोजगार युवक-युवतियों के साथ खुलेआम अन्याय को रोकना चाहिए।

क्या हम ऐसे मासूम बेरोजगारों से नजरें चुरा लें, जिसने फर्जी नौकरी के विज्ञापन के कारण आवेदन फार्म भरा, पासपोर्ट फोटो खिंचवाकर किसी गजेटेड आफिसर से अभिप्रमाणित कराया हो, किसी इंटरनेट कैफे से आनलाइन भरा हो या पांच-छह सौ रूपये का बैंक ड्राफ्ट बनवाकर स्पीड पोस्ट करना पड़ा हो? इसके बाद महीनों उम्मीद और इंतजार के बाद उसकी पीड़ा क्या होगी, इसकी कल्पना भी मुश्किल है।

कृपया आज 08.02.2017 को दैनिक जागरण (पटना) पेज दो पर प्रकाशित समाचार का संदर्भ लेना चाहेंगे-

समाचार के अनुसार बिहार सरकार ने राज्य में 23 हजार नए आंगनबाड़ी केंद्र खोलने तथा इनके संचालन के लिए 47 हजार पदों पर नियुक्ति का निर्णय लिया है।
चिंताजनक है कि इसी अखबार के इसी अंक यानी 08.02.2017 को दैनिक जागरण (पटना) पेज 18 पर किसी “महिला व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान“ का विज्ञापन प्रकाशित हुआ है।


आंगनबाड़ी के नए केंद्र खोलने के बिहार सरकार के निर्णय से इस विज्ञापन का सीधा संबंध है। लेकिन इस संस्था की जांच आवश्यक है। इसके वेबसाइट पर संस्था के किसी भी पदाधिकारी का नाम, पता अथवा फोन नबंर नहीं दिया गया है। संपर्क के तौर पर सिर्फ एक ई-मेल आइडी है। संस्था का वैधानिक स्वरूप क्या है, इसकी भी कोई सूचना नहीं। कोई पंजीकरण संख्या भी नहीं दी गई है। कुछ तसवीरें हैं जो पटियाला के किसी काॅलेज के पुराने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रतीत होती हैं। रिजल्ट्स नामक टैब में छह परीक्षाओं के परिणाम दिखाने का भ्रम पैदा किया गया है, लेकिन उस टैब को खोलें तो कोई परीक्षा परिणाम नहीं दिखेगा।

 

इस वेबसाइट में आंगनबाड़ी और आशा वर्कर के तथाकथित प्रशिक्षण का फार्म भरने के नाम पर पांच सौ/साढ़े तीन सौ रुपया कराया जाता है। संभव है, इसके बाद प्रशिक्षण शुल्क भी लिया जाता हो। लेकिन वास्तव में किसी भी किस्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, अथवा नहीं, यह जांच का विषय है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या वाकई आज दैनिक जागरण में प्रकाशित यह विज्ञापन आंगनबाड़ी संबंधी प्रशिक्षण हेतु है अथवा इसके नाम पर बिहार, झारखंड, उŸारप्रदेश इत्यादि राज्यों की लाखों गरीब महिलाओं को ठगी का शिकार बना लिया जाएगा। क्या देश के समाचारपत्रों के पास इतनी भी योग्यता/क्षमता नहीं कि एक विज्ञापन में प्रकाशित दावे की जांच कर सके?

मान्यवर, मैंने अपने मूल आवेदन में भी स्पष्ट किया था कि मेरी शिकायत किसी संस्थान विशेष से नहीं बल्कि मैंने रोजगार या प्रशिक्षण के नाम पर ठगी संबंधी विज्ञापनों के मामले में समाचारपत्रों का दायित्व सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। मैंने दैनिक हिंदुस्तान में 30.06.2016 को प्रकाशित भारतीय पशुपालन निगम लिमिटेड के नियुक्तियों संबंधी विज्ञापन असलियत की जांच कराने संबंधी निवेदन भारतीय प्रेस परिषद से किया था। उसी मामले की सुनवाई कोलकाता में 07.02.2017 को हुई। सुनवाई में जांच समिति के माननीय सदस्यों ने कहा कि किसी अखबार के लिए ऐसे विज्ञापनों की असलियत की जांच करना संभव नहीं है।

लेकिन सक्रिय पत्रकारिता के अपने अनुभवों के आधार पर पूरी विनम्रता के साथ मैं कहना चाहूंगा कि किसी भी संवाददाता के लिए ऐसे किसी ठगी संबंधी विज्ञापन की जांच करना बेहद आसान है। हर अखबार समूह में ऐसे दूरदर्शी, खोजी पत्रकार हैं जो एक-दो घंटे के अंदर ऐसे किसी ठग गिरोह का भंडाफोड़ कर दें। इससे ठगी की वारदात रूकेगी। जबकि अगर अखबारों ने ऐसे ठगी गिरोहों के विज्ञापन छापकर और उस पर चुप्पी साधकर प्रश्रय दिया, तो समाज में अपराध बढ़ेंगे, हताशा बढ़ेगी। दैनिक हिंदुस्तान में 03.02.2017 को प्रकाशित रिपोर्ट नोएडा के “घर बैठे गैंग ने छह लाख लोगों से 37 अरब रूपये ठगे“ देखी जा सकती है। ऐसे गिरोहों के विज्ञापन आखिर कोई समाचारपत्र कैसे छाप सकता है?

मैं यह भी कहना चाहूंगा कि कई अखबारों के प्रमुख संपादकीय पदों पर आसीन लोगों तथा वरिष्ठ पत्रकारों ने व्यक्तिगत चर्चा में यह बात खुलकर स्वीकारी है कि उनके अखबार में ऐसे विज्ञापनों के प्रकाशन से उनका सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन वे चाहकर भी उस पर रिपोर्ट नहीं कर सकते क्योंकि यह विज्ञापन का मामला है।

स्पष्ट है कि संपादकीय स्वतंत्रता पर ठगी के विज्ञापनों का भारी दबाव है। देश में प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने तथा पत्रकारिता का स्तर उन्नत करने के भारतीय प्रेस परिषद के दायित्व के आलोक में समाचारपत्रों की स्वतंत्रता को ठगी के विज्ञापनों के दबाव से मुक्त करने हेतु विशेष कदम उठाने की अपेक्षा है।

यह चिंताजनक है कि ठग कंपनियों को अपना जाल फैलाने में स्वयं हमारे देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन संबंधित समाचारपत्रों के संपादक या पत्रकार को ऐसी किसी कंपनी द्वारा की जाने वाली ठगी की जानकारी होने पर भी उन्हें इस संबंध में कोई तथ्यात्मक रिपोर्ट के संकलन, लेखन और प्रकाशन की अनुमति नहीं होती। ऐसे मामलों में कई अखबारों के प्रबंधन का स्पष्ट निर्देश होता है कि विज्ञापन दाताओं के संबंध में कोई नकारात्मक खबर नहीं लिखनी है।

यह स्पष्ट तौर पर विज्ञापन के दबाव के कारण पत्रकारीय स्वतंत्रता का हनन है। आखिर क्या वजह है कि नोएडा में छह लाख लोगों से 37 अरब रूपये ठगे जाने की लंबी प्रक्रिया के दौरान समाचारपत्रों ने इस संबंध में कोई खोजपरक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की? यहां तक कि उपर दिये गये किन्हीं अन्य अखबारों के दो समाचारों में उस ठग कंपनी को महिमामंडित किया गया है।

मान्यवर,

हमारी टीम की पड़ताल के अनुसार कि देश में विभिन्न फर्जी संस्थाओं द्वारा बेरोजगार नौजवानों से नौकरी के नाम पर ठगी की घटनाएं लगातार की जा रही हैं। ऐसी संस्थाएं किसी एनजीओ या कंपनी के रूप में पंजीकृत होती हैं। इनके द्वारा खुलेआम समाचारपत्रों में विज्ञापन देकर बड़ी संख्या में नौकरियां देने के दावे किए जाते हैं।

आवेदन के साथ 200 रुपये से लेकर 3000 रुपये तक वसूले जाते हैं। किसी विज्ञापन में तो ऐसी रिक्तियों की संख्या हजारों में होती है। वेतन भी आकर्षक बताया जाता है। प्रशिक्षण के नाम पर भी भारी-भरकम वसूली की जाती है। कुछ कंपनियां तो नौजवानों को फर्जी नियुक्ति पत्र तक थमा देती हैं। कई संस्थाएं तो ऐसा आभास कराती हैं मानो वह कोई केंद्र सरकार या राज्य सरकार की संस्था हो। कुछ संस्थाओं द्वारा कोई वितरण केंद्र खोलने के नाम पर भी ठगी की जाती है।

कुछ संस्थाएं भारत सरकार अथवा राज्य सरकार की लोकप्रिय योजनाओं के नाम का दुरूपयोग करती हैं। जैसे- स्वच्छ भारत मिशन, स्किल इंडिया, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, समेकित बाल संरक्षण योजना, मनरेगा, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, सर्व शिक्षा अभियान इत्यादि। आम नागरिक इन योजनाओं के नाम से या मिलते-जुलते नाम के फर्क को समझ नहीं पाते और बेहद आसानी से इनकी ठगी का शिकार हो जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि यह सारा गोरखधंधा खुलेआम होने के बावजूद ऐसी कोई सरकारी मशीनरी या सामाजिक संस्था नहीं है जो इन चीजों पर नजर रखे या रोक लगाए। जब बड़ी संख्या में बेरोजगारों को ठगी का शिकार बना लिया जाता है तब मामला सामने आता है। प्राथमिकी दर्ज होने पर पुलिस सक्रिय होती है। लेकिन तब तक जालसाज गिरोह भारी ठगी करके फरार हो चुके होते हैं।

झारखंड फाउंडेशन की रिसर्च टीम द्वारा ऐसे मामलों की ओर समाज, प्रशासन और मीडिया का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया जाता रहा है। लेकिन अब तक हम सरकार की किसी भी एजेंसी को संवेदनशील या सक्रिय करने में असफल रहे हैं।
संबंधित विभिन्न उदाहरण अनुलग्नक- एक में देखे जा सकते हैं।

यहां प्रस्तुत उदाहरणों से स्पष्ट है कि-

कोई भी ठगी गिरोह हमारे देश और राज्य में कोई भी फर्जी विज्ञापन प्रकाशित करके इसके नाम पर भोले-भाले नागरिकों से करोड़ों रुपये की ठगी करने के लिए स्वतंत्र है।
केंद्र और राज्य स्तर पर सरकार की कोई भी एजेंसी ऐसी नहीं है जो इन विषयों का संज्ञान लेकर इस पर स्वतः कार्रवाई करे।
केंद्र अथवा राज्य सरकार के जिन विभागों अथवा लोकप्रिय कार्यक्रमों के नाम पर ऐसे विज्ञापन प्रचारित किए जाते हैं, उन विभागों द्वारा ही ऐसे विज्ञापनों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।
किसी जागरूक नागरिक अथवा संस्था द्वारा इस संबंध में शिकायत पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करते समय समाचार पत्र द्वारा जानबूझकर आंखें मूंद ली जाती हैं। ऐसे विज्ञापन के प्रकाशन के पहले या उसके बाद उस पर कोई जांच पड़ताल नहीं की जाती है।
ऐसे विज्ञापनों के कारण ठगी के शिकार लोग दूर- दूर के तथा असंगठित होते हैं जिसके कारण या तो उनके द्वारा कोई विधिवत शिकायत दर्ज नहीं हो पाती है अथवा शिकायत किए जाने पर भी जितने बड़े पैमाने पर ठगी हुई है, उस अनुपात में कार्यवाही नहीं हो पाती।
ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज होने के बावजूद संबंधित ठग भारी वसूली करके फरार हो चुके होते हैं और उनसे राशि की वसूली अथवा दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो पाती।

उक्त आलोक में भारतीय प्रेस परिषद से निवेदन है कि

1. इस परिघटना की जांच हेतु भारतीय प्रेस परिषद द्वारा एक विशेष जांच दल का गठन किया जाए। इस जांच दल द्वारा फर्जी संस्थाओं द्वारा रोजगार, प्रशिक्षण, शिक्षा, एजेंसी, चिटफंड आदि के नाम पर अखबारों में प्रकाशित होने वाले ठगी के विज्ञापनों की व्यापक जांच करके एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

2. भारतीय प्रेस परिषद द्वारा समाचार पत्रों के लिए एक मार्गदर्शिका जारी की जाए जिसमें बड़े पैमाने पर ऐसी नियुक्तियों या सरकारी योजनाओं हेतु प्रशिक्षण से संबंधी विज्ञापन प्रकाशित करते समय संबंधित संस्था की विश्वसनीयता एवं संसाधनों की जानकारी प्राप्त करना अनिवार्य हो। ऐसे विज्ञापन प्रदाता के नाम, पते संबंधी पूरा रिकार्ड भी सार्वजनिक हो।

3. मार्गदर्शिका में यह स्पष्ट संदेश हो कि कोई अखबार महज यह कहकर अपने दायित्व से पीछे नहीं हट सकता कि हमने पाठकों को स्वयं विज्ञापन की जांच कर लेने की वैधानिक सूचना दे दी है। जब समाचार पत्र अन्य तमाम विषयों की गहन जांच पड़ताल करने में इतनी दिलचस्पी लेते हों, तो भला अपने ही अखबार में प्रकाशित किए गए किसी अपराधमूलक विज्ञापन की मामूली पड़ताल तक का दायित्व लेने से इंकार कैसे कर सकते हैं?

4. प्रत्येक समाचारपत्र में एक वरीय संपादकीय सदस्य को यह दायित्व हो कि उसके अखबार मेें प्रकाशित ऐसे विज्ञापनों का स्वतः संज्ञान लेकर उसकी जांच कराये तथा उसके पास कोई भी नागरिक ऐसी किसी आशंका के आलोक में शिकायत दर्ज कर सके, भले ही वह स्वयं किसी ठगी का शिकार न हुआ हो।

5. अगर जांच समिति के माननीय सदस्यों को ऐसा प्रतीत होता हो कि देश के समाचारपत्रों को स्तर अभी इतना उच्च है कि उन पर ऐसा दायित्व थोपना अनुचित होगा, तब भी अखबारों का स्तर उच्च करने के लक्ष्य के तहत इस संबंध में देश के प्रमुख समाचारपत्रों के संपादकों तथा वरिष्ठ पत्रकारों के सुझाव आमंत्रित किये जा सकते हैं। संभव है, स्वयं संपादकों/पत्रकारों की ओर से ही ऐसा कोई व्यावहारिक सुझाव निकलकर आ जाए, जिससे अखबारों को इस कलंक से मुक्ति मिले और बेरोजगारों से ठगी बंद हो।

मान्यवर, मैं इस पर समुचित चिंतन-प्रक्रिया को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस पत्र को सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध करा रहा हूं तथा इस क्रम में कोई महत्वपूर्ण सुझाव आने पर माननीय प्रेस परिषद को भी अग्रसारित करूंगा।
आशा है, देश करोड़ों मासूम बेरोजगारों, गरीब अल्प-शिक्षित महिलाओं और ग्रामीणों के हितों को ध्यान में रखते हुए उक्त आलोक में समुचित कदम उठाने तथा इसकी समुचित जानकारी उपलब्ध कराने की कृपा की जाएगी।

 

  भवदीय


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