इन पांच खबरों के लिए अनंत गोयनका को मिलना चाहिए रामनाथ गोयनका अवार्ड

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इंडियन एक्सप्रेस ने 12 साल पहले एक अच्छा काम ये किया कि सार्थक पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड शुरू किया। इंडियन एक्सप्रेस पत्रकारों का प्रिय अखबार है। उसके द्वारा दिया जाने वाला अवार्ड पत्रकारों का प्रिय पुरस्कार है। लेकिन कई बार ये पुरस्कार डिजर्विंग लोगों को नहीं मिल पाता। खासकर तब जब वो डिजर्विंग आदमी खुद एक्सप्रेस समूह में रहकर एक्सीलेंस की पत्रकारिता कर रहा हो। तब तो और भी मुश्किल हो जाती है जब वो आदमी खुद रामनाथ गोयनका का वारिस हो जिसके नाम पर ये अवार्ड दिया जाता है। जी हाँ हम बात कर रहे हैं एक्सप्रेस के वर्तमान और भविष्य अनंत गोयनका की।

दुनिया का हर बड़ा मीडिया हाउस ये जान चुका है कि पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल वर्ल्ड ही है। एक्सप्रेस समूह ने इस बात को समझा। हिन्दुस्तान के लगभग सभी अखबार मालिकों ने अपने-अपने डिजिटल वेंचर का जिम्मा अपने नौनिहाल कम-उम्र बेटों-पोतों को हाथ में दे रखा है। इंडियन एक्सप्रेस डिजिटल मीडिया की कमान भी विवेक गोयनका के सुपुत्र यंग कूल ड्यूड अनंत गोयनका के हाथ में है। इंडियन एक्सप्रेस अखबार के पाठकों को शायद ही पता हो कि अनंत गोयनका डिजिटल मीडिया में रामनाथ गोयनका की विरासत को किस तरह से आगे बढ़ा रहे हैं। खासकर हिन्दी पत्रकारिता को बढ़ावा देने में अनंत का योगदान अनदेखा ही जा रहा है।

रामनाथ गोयनका और प्रभाष जोशी ने जनसत्ता जैसा अखबार देकर उस समय के सभी हिन्दी अखबारों और पाठकों को झकझोर दिया था। रामनाथ गोयनका और प्रभाष जोशी की उम्र ढलने के साथ ही जनसत्ता अखबार भी ढल गया। कुछ लोग तो कहने लगे थे कि जनसत्ता के पाँव कब्र में लटक रहे हैं। लेकिन तभी सीन में अनंत गोयनका की एंट्री हुई।

साल 2015 में अनंत गोयनका को लगा होगा कि भले ही जनसत्ता अखबार मृतप्राय बनाया जा चुका है, डिजिटल संसार में जनसत्ता को नए सिरे से जिंदा किया जाए। उन्होंने एक काबिल संपादक चुना जो उनके विजन को समझ सके। अनंत गोयनका अपने मकसद में कितने कामयाब रहे इसे आप इसी से समझ सकते हैं कि करीब दो साल में ही अक्टूबर 2017 में जनसत्ता डॉट कॉम देश भर में डेस्कटॉप पर पढ़ा जाने वाला नंबर वन हिन्दी समाचार वेबसाइट बन गया।

ठीक वैसे ही जैसे जनसत्ता अखबार ने रामनाथ गोयनका की छत्रछाया में लॉन्च होते बिक्री के मामले में बाकी हिन्दी अखबारों को पीछे छोड़ दिया था। क्या आपको भी जनसत्ता अखबार में छपी वो अपील याद आ गयी कि अब हम और कॉपी नहीं छाप सकते और लोग अखबार साझा करके पढ़ें! बाप और पूत परापर घोड़ा, ज्यादा नहीं तो थोड़ा-थोड़ा। अनंत ने ऐसी कोई अपील तो नहीं छपवायी लेकिन इंडियन एक्सप्रेस अखबार में जनसत्ता डॉट कॉम की उपलब्धि का बड़ा-बड़ा इश्तेहार जरूर छपवाया। अनंत ने दावा किया जनसत्ता ने ये मिथक तोड़ दिया है कि ट्रैफिक लाने के लिए खबरों की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है।

जाहिर है अनंत गोयनका खुद को डिजिटल एज का रामनाथ गोयनका समझ रहे हैं। जनसत्ता अखबार किन स्टोरी के दम पर नंबर वन बना था ये आज की पीढ़ी नहीं जानती। लेकिन अनंत गोयनका का जनसत्ता डॉट कॉम की चंद एक्सीलेंस स्टोरी को हम रेखांकित करना चाहेंगे ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान भूल न जाएं। साथ ही हम इंडियन एक्सप्रेस समूह से गुजारिश करेंगे कि अनंत गोयनका को नंबर वन हिन्दी वेबसाइट (डेस्कटॉप पर) बनाने के लिए गोयनका अवार्ड दे। इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए अनंत के लीडरशिप में जनसत्ता ऑनलाइन ने जो शानदर स्टोरी की उनमें से किसी एक के लिए ही उन्हें गोयनका अवार्ड मिल जाना चाहिए था।

डिजिटल पत्रकारिता में अनंत के योगदान को समझने के लिए नीचे कुछ सैंपल दिए जा रहे हैं। आप ही कहिए इन स्टोरी के लिए अनंत गोयनका को ये एक्सीलेंस अवार्ड नहीं मिलना चाहिए? क्या रामनाथ गोयनका का वारिस होना कोई गुनाह है? मेरे ख्याल से तो उन्हें पुलित्जर मिलना चाहिए, फिलहाल गोयनका अवार्ड मिल जाए तो ही दुखी दिल की थोड़ी मरहम-पट्टी हो जाए।


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