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गरीबी उन्‍मूलन कार्यक्रम में RBI को घसीट कर जेटली भारत का अर्जेंटीना बनाने की फिराक में हैं?

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हिमांशु एस. झा

कोई भी क्रिया सही या गलत तभी मानी जा सकती है जब उसके परिणाम सामने आये किंतु उसके समालोचना से कार्य करने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से करने में मदद मिलती है. भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अनुभाग 7 को जब कानूनवेत्‍ताओं ने पहली जनवरी 1949 से लागू करवाया तो उसका ध्येय प्रबंधन ही था क्योंकि जनवरी 1949 में ही भारतीय रिजर्व बैंक को राष्ट्रीयकृत भी किया गया था. इस अनुभाग को भले ही अभी तक के किसी सरकार ने किसी भी परिस्थिती में अनुपयोग में नहीं लाया किंतु उसका उपयोग निहितार्थ ही था, भले ही उसका परिणाम जो भी हो. अभी हाल ही में 19 जुलाई 2018 को अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी फेडरल रिजर्व को उसके मौद्रिक नीति के कारण आड़े हाथों लिया जो अपने आप मे दुर्लभतम ही है. समाचार चैनल सीएनबीसी के साथ एक साक्षात्कार में डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि वह फेडरल रिजर्व द्वारा बढ़ाये गये ऋण दर को लेकर “रोमांचित नहीं” हैं. यह अमेरिका के इतिहास  में अस्वभाविक घटना है जिसमें राष्ट्रपति मौद्रिक नीति के ऊपर कोई टिप्पणी करें. इसी प्रकरण को ध्यान में रखते हुए मैं अपनी बात यहाँ रखूंगा.

अभी सप्ताह भर पहले भारतीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का यह ब्यान कि भारतीय रिजर्व बैंक के पूंजी ढांचे के लिये जो भी नई रूपरेखा बनेगी और उससे जो अतिरिक्त कोष प्राप्त होगा, उसका इस्तेमाल भविष्य की सरकारें आने वाले सालों में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में कर सकती हैं, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. दशकों पहले अर्जेंटीना की सरकार ने भी यही काम किया था और वहाँ आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया था.

माना जाता है कि भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अनुभाग 7 के तहत भारत सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को तीन आदेश दिये हैं. पहला पत्र माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस सुझाव पर कि सरकार स्वतंत्र बिजली उत्पादक जो उनके एकत्रित ऋण के आधार पर इंसोल्वेंसी एण्ड् बैंकरप्सी कोड (दिवालियापन और दिवालियापन कोड) से ग्रस्त हैं, के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 की अनुभाग 7 के तहत भारतीय रिजर्व बैंक को दिशानिर्देश देने पर विचार कर सकती है. बिजली उत्पादक कम्पनी ने कोर्ट के समक्ष भारतीय रिजर्व बैंक की उस सर्क्युलर (परिपत्र) के विरुद्ध यचिका दायर की थी जिसमें यह कहा गया था कि यदि ऋण ब्याज के भुगतान में एक दिन के लिये भी देरी होती है तो उसे डिफॉल्टर (दिवालिया) माना जाय और बैंक 180 दिन के भीतर रेजोल्यूशन (संकल्प) लेकर दिवालिया इकाई के विरुद्ध दिवालियापन की प्रक्रिया शुरू कर दे भले ही उसका वर्गीकरण स्टैंडर्ड असेट (मानक सम्पत्ति) में क्यों न हो. दूसरा पत्र 10 अक्टूबर को प्रेषित किया गया जिसमें उर्जित पटेल के विचारों की मांग की गई ताकी बाजार में लिक्वीडीटी (तरलता) लाने के लिए केंद्रीय बैंक के सरप्लस (अधिशेष) को उपयोग में लाया जा सके. इसी पत्र से विवाद शुरू हुआ और डॉ. विरल वी. आचार्य, उपगवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा एक लम्बा-चौड़ा व्यख्यान दिया गया. तीसरा पत्र इस आशय और सुझाव के साथ भेजा गया कि कुछ सरकारी बैंकों के त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई में कुछ ढील दिया जा सके.

यदि सरसरी निगाह से देखा जाय तो तीनों पत्र ही अपने आप में गंभीर तथा आलोचना को आकर्षित करने वाले हैं. पहले पत्र को कुछ हद तक नजरअंदाज किया जा  सकता है क्योंकि वह माननीय उच्च न्यायालय के सुझाव पर भेजा गया था किंतु दूसरा पत्र अपने आप में ही गम्भीर है क्योंकि जिस पूंजीगत भंडार की बात कही गई है वह एक तरह से रैनी डे (आकस्मिकता) के लिए रखा जाता है. भारतीय रिजर्व बैंक के पास सरप्लस (अधिशेष) निधि मुख्य्तः दो माध्यमों से आती है- पहला करेंसी एंड गोल्ड रिवैल्यूशन अकाउंट (मुद्रा और स्वर्ण पुनर्मूल्यांकन खाता) जिसमें मुख्यत: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिकार में रखे गये स्वर्ण और विदेशी मुद्रा भंडार होता है. वर्ष 2017-18 में यह 6.9 लाख करोड का था. यह खाता रुपये के मूल्यांकन पर बढ़ता और घटता रहता है. दूसरा जो मुख्य है वह है कंटीजेन्सी फंड (आकस्मिकता निधि) जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विशिष्ट प्रावधान है जिसका उपयोग भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति और विनिमय दर संचालन से उत्पन्न होने वाली अप्रत्याशित आकस्मिकताओं को पूरा करने के लिए एक विशिष्ट प्रावधान के रूप में किया जाता है।

दोनों मामलों में, भारतीय रिजर्व बैंक आकस्मिकता निधि द्वारा तरलता को समायोजित करने या मुद्रा मूल्य में बड़े उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए प्रासंगिक बाजारों में हस्तक्षेप करता है. भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी कमाई मुख्यत: विदेशी मुद्रा भंडार जो कि बॉण्ड या अन्य केंद्रीय बैंकों के ट्रेजरी बिल (राजकोष) या फिर शीर्ष रेटेड प्रतिभूति या फिर अन्य केंद्रीय बैंकों में जमा निधि से रोजी कमाया जाता है, से प्राप्त होती है. भारतीय रिजर्व बैंक स्थानीय रुपये-नामित सरकारी बॉन्ड या प्रतिभूतियों के अपने होल्डिंग्स (स्वामित्व) पर भी ब्याज अर्जित करता है, बैंकों को दिए गए उस रकम पर आने वाली ब्याज से भी कमाई करता है जो बहुत कम कार्यकाल के लिए भारतीय रिजर्व बैंक उधार देता है. यह राज्य सरकार और भारत सरकार के कर्ज की निगरानी पर भी कमीशन (दलाली) प्राप्त करता है.

भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी कमाई में से आयकर नहीं देना होता है अत: वह अपने सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर कुछ आकस्मिकता निधि रख बाकी सभी अधिशेष सरकार को भारतीय रिजर्व बैंक  अधिनियम के अनुभाग 47 के तहत हस्तांतरित कर देता है. गौरतलब है कि जितनी अधिक आकस्मिकता निधि होगी, उतनी कम निधि सरकार को हस्तांतरित होगी. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक से और अधिक अधिशेष की मांग करना मूर्खतापूर्ण रवैया ही माना जायेगा.

अब यदि तीसरे पत्र पर गौर किया जाय तो यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये सुधारात्मक कार्रवाई को प्रतिलोम करने वाला माना जायेगा. भारतीय रिजर्व बैंक ने बमुश्किल से बैंकों की बैलेंस शीट को साफ किया है। ऐसे में यह बहुत ही बचकाना और कहीं न कहीं डिफॉल्टर (दिवालिया) को गलत प्रश्रय देना जैसा हो गया. आइये समझते हैं कि यह अनुभाग 7 है क्या? अनुभाग 7 भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 में प्रबंधन के रूप में दिया गया है जिसमें कहा गया है कि 7 (1) केंद्र सरकार समय-समय पर बैंक को ऐसी दिशा दे सकती है, बैंक के गवर्नर के परामर्श के बाद, जो सार्वजनिक हित में जरूरी विचार कर सकता है. ज्ञातव्य हो कि जो भी दिशानिर्देश होगा वह “बैंक के गवर्नर के परामर्श के बाद” ही होगा. ऐसे में बैंक का गवर्नर यदि हामी नहीं भरे तो इन पत्रों का भारविहीन होना ही जान पड़ता है.

10 अक्टूबर 2018 के पत्र के बाद डॉ. विरल वी. आचार्य, उपगवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मुंबई में 26 अक्तूबर 2018 को दिए गए ए. डी. श्रॉफ स्मारक व्याख्यान को यहां उद्‍धृत करना अतिमहत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के प्रमुख श्री मार्टिन रेडरेडो के इस कथन- “मूल रूप से, मैं दो मुख्य अवधारणों का बचाव कर रहा हूं: एक हमारे निर्णय लेने की प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता और यह कि आरक्षित निधियों का उपयोग मौद्रिक और वित्तीय स्थिरता के लिए होना चाहिए”- को प्रश्रय दिया था.

वह आगे कहते हैं- “इस नाटकीय प्रस्‍थान की जड़ें हैं क्रिस्टिना फर्नांडिज के नेतृत्व वाली अर्जेंटीना सरकार द्वारा 14 दिसंबर 2009 को पारित उस आपात आदेश में जिसके अनुसार उस वर्ष परिपक्व हो रहे लोक ऋणों के वित्‍तपोषण करने के लिए द्विशताब्दिक स्‍थायित्‍व और न्‍यूनकृत ऋणग्रस्तता निधि की स्‍थापना की जा रही थी। इसमें केंद्रीय बैंक की आरक्षित निधियों में से 6.6 बिलियन डॉलर की रकम को नेशलन ट्रेजरी में अंतरित करना निहित था। दावा यह था कि केंद्रीय बैंक के पास 18 बिलियन डॉलर की अतिरिक्‍त आरक्षित निधि थी।”

वास्तव में, श्री रेडराडो ने यह निधि अंतरित करने से मना कर दिया था, इसलिए सरकार ने दुराचार और कर्तव्यभंग के लिए 7 जनवरी 2010 के एक और आपात आदेश द्वारा उन्हें पद से हटाने का प्रयास किया, तथापि, यह प्रयास विफल हो गया क्योंकि यह असंवैधानिक था।