Home पड़ताल तीन राज्यों के चुनाव परिणाम और सांप्रदायिक राजनीति की सीमाएं

तीन राज्यों के चुनाव परिणाम और सांप्रदायिक राजनीति की सीमाएं

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गणपत तेली

राजस्थान में नई सरकार बनने से ठीक पहले ट्विटरपर एक यूज़र ने एक पुरान वीडियो हिंदू-मुसलमानों केबीच द्वेष फैलाने के उद्देश्य से पोस्ट किया और कई लोगों ने उसे शेयर भी किया। इसीबीच कुछ लोगों ने उसे ट्वीट को राजस्थान पुलिस को टैग कर शिकायत की और राजस्थानपुलिस ने चेतावनी देते हुए उस यूज़र को तुरंत यह डिलीट करने के लिए कहा और उसनेडिलीट कर दिया। यह घटना हिंदी क्षेत्र के तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश औरछत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के बाद आए बदलाव की ओर संकेत करती है।

पिछले चार-पांच सालों में ऐसे अनगिनत फेक वीडियो प्रसारित कर समाज में नफरत फैलाई गई जिससे हिंसा का तांडव होने लगा था। जाहिर सी बात है कि सरकारी दबाव के कारण पुलिस-प्रशासन ऐसी गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाते थे।

तीन राज्यों में हुए चुनावों में कांग्रेस ने किसानों की दुर्दशा और बेरोजगारी के मुद्दों को केन्द्र में रखा और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को मुद्दा ही नहीं माना और लगातार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास किए जाते रहे। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ तीन-चार हफ्ते की अवधि तक अपने प्रदेश से दूर रहकर चुनावी राज्यों में सांप्रदायिक बयान देते रहे। कभी उन्होंने ‘अली-बजरंग बली’ का जुमला पेश किया तो कभी शहरों नाम बदल देने की घोषणाएं की, तो कभी राममंदिर का शिगुफा छेड़ा। भाजपा के अधिकांश प्रचारकों ने इसी सांप्रदायिक लाइन पर अपने चुनावी भाषण केन्द्रित किए। भाजपा के प्रचार का दूसरा मुद्दा कांग्रेस, इसके कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके परिवार पर अवांछित और अमर्यादित टिप्पणी करना था। पिछले कुछ चुनावों की तरह भाजपा द्वारा इस बार भी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। भाजपा के पिछले चार-पांच सालों के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में इन्हीं दो मुद्दों के इर्द-गिर्द रहे। अनाप-शनाप बोलने के कारण कई बार वे हास्यास्पद भी लगे। हालांकि कांग्रेस ने भी सोफ़्ट हिंदुत्त्व का सहारा लिया लेकिन किसानों के मुद्दे को आगे रखा। और सरकारें बनाने के बाद कांग्रेसी मुख्यमंत्री तीव्रता से किसानों के कर्जामाफी और अन्य मुद्दों पर काम कर रहे हैं, फिर भी कांग्रेस का सोफ्ट हिंदुत्त्व की शरण में जाना खतरनाक संकेत है।

छोटे स्तर पर भी भाजपा की आईटी सेल और संघ परिवार के संगठनों से जुड़े लोगों ने सांप्रदायिक आधार पर चुनाव प्रचार की पर्याप्त कोशिशें की। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के धार्मिक विश्वासों आचरणों और सचिन पायलट के परिवार को आधार बनाकर खूब अफवाहें फैलाई गई। इसी बीच अयोध्या में बाबाओं का जमघटा भी लगा और अलग-अलग शहरों में रैलियां भी की गई। जब इस भीषण सांप्रदायिक गोलबंदी और नफरत की आग फैलाने में ये नेता जीजान से लगे हुए थे, तो भला हमारे टीवी वाले लोग कैसे पीछे रहते। उन्होंने भी इस आग में घी डालने का काम बखूबी किया लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी।

ग्यारह दिसंबर की सुबह जब नतीज़े आने शुरू हुए तो यह आश्चर्यजनक था कि पहले राउंड में गिने जाने वाले पोस्टल बैलेट्स में इस बार भाजपा आगे नहीं जा रही थी, बल्कि कांग्रेस उसे यहां भी टक्कर दे रही थी। यह आश्चर्यजनक था और लग रहा था कि भाजपा के इस सांप्रदायिक प्रचार के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों ने भी वोट किया है और यह आगे भाजपा को भारी हार की ओर ले जाएगा। ऐसा न होना भी ईवीएम पर शक का एक आधार बनता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ठीक ही ईवीएम पर जांच की बात कहीं है।     

शाम तक जैसे-जैसे नतीज़े भाजपा के खिलाफ मुक्कमल होने लगे, भाजपा के उक्त सांप्रदायिक एजेण्डे को मात मिलने लगी। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि जहाँ-जहाँ योगी ने रैलिया की वहां भाजपा को ज्यादा सफलता नहीं मिली और आधी से ज्यादा सीटों पर भाजपा चुनाव हार गई। उदाहरण के लिए अलवर में पिछली बार भाजपा ग्यारह में से नौ सीटें जीती थी, लेकिन इस बार महज दो पर सिमट गई। धातव्य है कि अलवर में मॉब लिचिंग की घटना भी हुई थी। तेलंगाना में योगी ने भाजपा की सरकार बनने पर हैदराबाद, करीमनगर आदि जगहों के नाम बदलने का वादा किया था, वहाँ भाजपा की विधायक संख्या पहले से भी कम हो गई।

इसी तरह से जहाँ-जहाँ नरेन्द्र मोदी ने रैली की उन जगहों पर भी भाजपा को आशातीत सफलता नहीं मिली और उसके उम्मीद्वार हारें। ऐसी जगहों में, हनुमानगढ़, सीकर, झुनझुनु, दौसा, जोधपुर, भरतपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जबलपुर, विदिशा, छतरपुर, छिंदवाड़ा, ग्लालियर, अंबिकापुर, बिलासपुर, जगदलपुर आदि विधानसभा की सीटें शामिल हैं।

यह ध्यान देने की बात है कि इन चुनावों मेंजब-जब कांग्रेस के सचिन पायलट, अशोक गहलोत, ज्योतिर्रादित्य सिंधिया, दिग्विजयसिंह, कमलनाथ, भूपेश बघेल आदि नेताओं ने जब भी भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार कोरेस्पोंड किया तो उन्होंने इसके सामने किसानों और युवाओं के मुद्दे रखे। कांग्रेसइस बार इस रणनीति में सफल रही कि न तो वह सांप्रदायिकता के खेल में पड़ भाजपा केपाले में खेलने गई और न ही उनके किसी नेता ने अनाप-शनाप बयान दिया। आर्थिकमुद्दों को निरंतर केन्द्र में रखे जाने के कारण वह सफलता हासिल कर सकी।  

भाजपा की इस चुनाव में हुई हार यह संकेत करतीहै कि भारतीय जन मानस में सांप्रदायिकता को पसंद करने वाला एक हिस्सा है लेकिन एकबड़ा हिस्सा लंबे समय तक इससे संबद्ध नहीं रह पाता है। यह बात समझकर ही भाजपा केप्रचारकों ने 2014 का चुनाव राममंदिर या किसी अन्यसांप्रदायिक मुद्दे पर न लड़कर विकास के मुद्दे पर लड़ा था, जिसमें आर्थिक खुशहालीके बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन आज जब अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, तो भाजपा केसामने अपने पुराने सांप्रदायिक मुद्दों के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई चारानहीं था। और, इस बात की उम्मीद कम ही दिखाई देती है कि लोकसभा चुनावों तक भाजपा केलिए स्थितियों में कुछ बदलाव होगा।

लेखक जामिया मिलिया के हिंदी विभाग में प्राध्‍यापकहैं

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