Home पड़ताल क्या गन्ना किसानों का गुस्सा बीजेपी को कैराना में ले डूबेगा? मतदान...

क्या गन्ना किसानों का गुस्सा बीजेपी को कैराना में ले डूबेगा? मतदान से पहले ग्राउंड रिपोर्ट

SHARE
मनदीप पुनिया / कैराना से 

‘जब 2014 के लोकसभा चुनाव हुए थे तो ये भाजपा वाले कह रहे थे कि अच्छे दिन आएंगे. मगर भाजपा सरकार बनते ही अच्छे दिन तो गए और बुरे दिन आ गए. मुझे तो लग रहा है अगर भाजपा सरकार दोबारा आ गई तो ये देश ही छोड़कर जाना पड़ेगा पब्लिक को. क्योंकि यहां भुखमरी इतनी आ गई. मज़दूर को मज़दूरी नहीं मिल रही, किसान को फसलों का उचित दाम नहीं मिल रहा, जो मिल रहा है वो भी समय पर नहीं मिल रहा. भाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश का तो बुरा हाल हो रखा है, ये सड़कें देख लो. इन पर चलना दूभर हो रखा है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कहते थे कि देश का किसान खुशहाल होगा तो देश खुशहाल होगा. लेकिन भाजपा वालों ने इसको उल्टा कर दिया, इन्होंने यहां बता दिया कि देश का किसान जितना दुखी होगा उतना तुम सुखी रहोगे.’

मीडियाविजिल से बातचीत कर रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान वीरेंदर ने अपने खेत में दो बैलों के साथ ईख(गन्ना) की गुड़ाई करते वक़्त भाजपा सरकार पर जमकर गुस्सा निकाला.

कैराना उपचुनाव में वोट देने के सवाल पर उन्होंने आगे बताया, ‘अबकी बार तो भाजपा हारेगी. किसानों को ना फसलों के उचित दाम दिए हैं, ना उनकी पेमेंट समय पर दी है. इनके पास कोई मुद्दा नहीं है चुनाव लड़ने का. ये तो बस हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं और हम इस मुद्दे पर इनको वोट देंगे नहीं.’

कैराना उपचुनाव में एक बात तो साफ नजर आ रही है कि समाज के एक बड़े तबके को मोदी-योगी का ‘हिंदुत्व’ कार्ड रास नहीं आ रहा है. किसान अपने खेती-बाड़ी के मुद्दों को लेकर इस बार भाजपा से बहुत गुस्सा हैं. देश को अपने गन्ने से बनी चीनी से मिठास का एहसास करवाने वाला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान बार-बार मोदी के पाकिस्तान से चीनी लेने के फैसले से भी बहुत ज्यादा गुस्सा है.

अपने खेत में मोटर के कुएं पर बैठे किसान सूबे सिंह अबकी बार अपने खेत में हुई कमजोर गन्ने की फसल को लेकर सरकार से गुस्से में हैं. सूबे सिंह का कहना है कि उसके खेत की मिट्टी की जांच के लिए मृदा जांच कार्ड(सॉइल हेल्थ कार्ड) दो बार बनकर उसके घर आ चुका है लेकिन आजतक कोई भी उसके खेत से मिट्टी नहीं लेकर गया. मिट्टी की स्थिति की सही जानकारी के अभाव में उसकी फसल के नुकसान के साथ-साथ इस योजना में लगाये गए देश के करोड़ों रुपए भी बर्बाद हो गए.

भाजपा सरकार पर झुंझलाते हुए उन्होंने बताया, ‘अभी किसान अपने खेतों को सींचकर खाद डालने वाला था लेकिन सरकार ने 125 रुपए डाई और यूरिया के कट्टे पर इस गवर्नमेंट ने एकदम से बढ़ा दिए. किसान को अब यूरिया खाद की जरूरत हुई तभी एकदम इनके रेट बढ़ा दिए क्योंकि इस सरकार को लगा कि किसान से जो मिले वो खींच लो.’

इस बार किसान ना सिर्फ खाद-बीज की बढ़ी हुई कीमतों से परेशान है, वह पश्चिमी यूपी क्षेत्र में आवारा पशुओं की हुई बढ़ोतरी के कारण भी परेशान है. लगभग हर किसान का कहना था कि उन्हें रात-रात भर जागकर इन आवारा सांडों और बछड़ों से अपनी फसलों की रखवाली करनी पड़ती है. उनके पशुओं की कीमतों में आई कमी पर किसान राशिद ने मीडियाविजिल को बताया, ‘पशुधन हमारा एटीएम होता था, जब कभी पैसों की तंगी होती थी तो हम अपना पशु बेचकर एटीएम की तरह उससे पैसे निकाल लेते थे. लेकिन जब से ये सरकार आई है तब से ही पशु व्यापारियों को बीच सड़कों पर रुकवाकर पीट दिया जाता है, कई बार तो मारा भी गया है. ऐसे में हमारे पशुओं की क़ीमतें गिर ईं. भाईसाब आप देखो इस सरकार ने एक हिसाब से हमसे हमारा एटीएम छीनने का काम किया है।’

क्या हैं किसानों के नाराज़ होने के मुख्य कारण

-गन्ने के उचित दाम और उनकी फसल की समय से पेमेंट ना मिलना

-भाजपा का पुराने ट्रैक्टरों और वाहनों पर रोक लगाने का फैसला

-महंगी हुई बिजली

-मृदा जांच योजना(साइल हेल्थ कार्ड मिशन) का असफल होना

-डीज़ल की बढ़ती कीमतें

-खाद-यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी

-हिंदू-मुस्लिम तनाव को बढ़ावा देना

-आवारा पशुओं की बढ़ोतरी होना

कैराना लोकसभा में जाट और मुसलमान किसान इस बार भाजपा के खिलाफ जरूर खड़े हैं मगर हिन्दू गुज्जर किसान अपनी खेती किसानी के मुद्दों के बावजूद भी इस चुनाव में भाजपा को वोट देने वाले हैं. हिन्दू गुज्जर भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह को अपनी धर्म और जाति बहन मानकर वोट डालने की बात कह रहे हैं. इस समुदाय के लोग हुकम सिंह की मौत की वजह से भी मृगांका को सहानुभूति वोट देने वाले हैं.

मज़दूर भी हैं परेशान

गन्ने के खेत में मजदूरी करने आए मज़दूर रोहतास इस बार भाजपा को वोट नहीं देने वाले हैं. उनका कहना है, ‘जब किसान को ही सरकार पेमेंट नहीं दे रही तो किसान मज़दूर को कहां से मज़दूरी दे देगा और मज़दूर कहां से खाना खाएगा. इस सरकार ने हम मज़दूर भी मारे गए और किसान भी. भाजपा तो बहुत बेकार है, इसका नामोनिशान नहीं रहना चाहिए कहीं भी।’

इस इलाके में ज्यादातर मज़दूर दलित ही हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण के जेल से जयंत चौधरी को समर्थन देने के बाद तो कैराना के दलित खुलकर महागठबंधन के साथ आ गए हैं.

कश्यप समुदाय के लोग जिनमें ज्यादातर लोग मज़दूर हैं, बिजली की बढ़ी हुई कीमतों के कारण भाजपा सरकार से गुस्से में जरूर हैं लेकिन इस समुदाय के ज्यादातर लोग भाजपा को ही वोट देने की बात कह रहे हैं.