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सूचना आयोगों ने RTI कानून का बनाया मज़ाक, देश भर में 1.81 लाख शिकायतें लंबित

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रजनीश, द सिटिज़न


विकास का झंडा अपने कंधों पर ढोने एवं पारदर्शी शासन देने का दावा करने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा शासित तीन राज्यों – गुजरात, महाराष्ट्र और नगालैंड – में सूचना आयोग बिना किसी कप्तान के चल रहे हैं. भाजपा की अबतक सहयोगी रही तेलुगू देशम शासित आंध्र प्रदेश में राज्य सूचना आयोग के निष्क्रिय रहने की वजह से पिछले 10 महीने से लोगों की सूचना के अधिकार से संबंधित शिकायतें नहीं सुनी जा सकी हैं. पश्चिम बंगाल में राज्य सूचना आयोग ने अलग– अलग अवधि में कुल मिलाकर बारह महीनों तक किसी अपील और शिकायत पर सुनवाई नहीं की. सिक्किम में राज्य सूचना आयोग दो महीने तक निष्क्रिय रही.

ये निष्कर्ष सतर्क नागरिक संगठन और सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) द्वारा संयुक्त रूप से “रिपोर्ट कार्ड ऑन द परफॉरमेंस ऑफ़ इनफार्मेशन कमीशन्स इन इंडिया” शीर्षक से देश के विभिन्न राज्यों में सूचना आयोगों के प्रदर्शन के बारे में किये गये एक सर्वेक्षण में सामने आये हैं. इस सर्वेक्षण में सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत गठित केंद्रीय सूचना आयोग समेत 29 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों के सूचना आयोगों को शामिल किया गया है.

सर्वेक्षण के मुताबिक, महाराष्ट्र में मुख्य सूचना आयुक्त ने अप्रैल 2017 में अवकाश ग्रहण किया. उसके बाद एक सूचना आयुक्त ने कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त का दायित्व संभाला, जबकि सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 में कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त का कोई प्रावधान नहीं है. राज्य सरकार द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त की बहाली करना अभी बाकी है.

उधर, गुजरात में भी जनवरी 2018 में मुख्य सूचना आयुक्त के सेवानिवृत्त होने के बाद से यह पद खाली पड़ा हुआ है और राज्य सूचना आयोग बिना नाविक के नाव के समान दिशाहीन चल रहा है.

भाजपा के सहयोग चलने वाली नगालैंड सरकार का आलम यह है कि राज्य में मुख्य सूचना आयुक्त का पद सितम्बर 2017 से खाली होने के बावजूद उसे जनता को सूचना हासिल करने में हो रही कठिनाइयों की कोई फिक्र नहीं है.

भाजपा की अबतक सहयोगी रही तेलुगू देशम शासित आंध्र प्रदेश में राज्य सूचना आयोग के निष्क्रिय रहने की वजह से पिछले 10 महीने से लोगों की सूचना के अधिकार से संबंधित शिकायतें नहीं सुनी जा सकी हैं. वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद कई महीनों तक आंध्र प्रदेश का राज्य सूचना आयोग अलग हुए दोनों राज्यों- तेलंगाना और आंध्र प्रदेश– के लिए सूचना आयोग का काम करता रहा. लेकिन मई 2017 में प्रथम सूचना आयुक्त के सेवानिवृत्त होने के बाद से यह आयोग निष्क्रिय पड़ गया. अगस्त 2017 में हैदराबाद हाईकोर्ट ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की राज्य सरकारों को दोनों राज्यों में अलग–अलग सूचना आयोग गठित करने का निर्देश दिया.

हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए तेलंगाना सरकार ने 13 सितम्बर 2017 को तेलंगाना सूचना आयोग का गठन किया और 25 सितम्बर 2017 को दो सूचना आयुक्तों ने कार्यभार संभाला. इस प्रकार, तेलंगाना में तीन महीनों तक कोई सक्रिय सूचना आयोग उपलब्ध नहीं था.

उधर, आंध्र प्रदेश सरकार ने अगस्त 2017 में राज्य सूचना आयोग गठित करने का एक आदेश जारी किया. लेकिन वहां आजतक एक भी सूचना आयुक्त नियुक्त नहीं किया जा सका है. लिहाज़ा, आंध्र प्रदेश सूचना आयोग का सक्रिय होना अभी बाकी है और पिछले 10 महीनों से वहां लोगों को सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले आधिकारियों से वांछित सूचना पाने के क्रम में आने वाली शिकायतों की सुनवाई के लिए जूझना पड़ रहा है.

इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल में तकरीबन 12 महीनों (नवम्बर 2015 से जुलाई 2016 तक और फिर अप्रैल 2017 से जुलाई 2017 तक) की अवधि में राज्य सूचना आयोग ने किसी भी अपील या शिकायत पर इसलिए सुनवाई नहीं की क्योंकि उक्त अवधि में आयोग में सिर्फ एक सूचना आयुक्त कार्यरत था.

सिक्किम में, एकमात्र कार्यरत सूचना आयुक्त के सेवानिवृत होने के बाद राज्य सूचना आयोग दो महीनों (दिसम्बर 2017 से फरवरी 2018) तक निष्क्रिय रहा.

सूचना प्राप्ति के मामले में हालात इस कदर गंभीर हैं कि कई राज्यों में सूचना आयोग निर्धारित क्षमता के साथ काम नहीं कर रहे. केरल में सूचना आयोग सिर्फ एक सूचना आयुक्त के साथ काम कर रहा है. नतीजतन, वहां 31 अक्टूबर 2017 तक लगभग 14 हजार अपील और शिकायतें लंबित पड़ी हैं.

उड़ीसा के राज्य सूचना आयोग में तीन सूचना आयुक्तों के कार्यरत होने के बावजूद वहां 31 अक्टूबर 2017 तक 10 हजार से भी ज्यादा अपील और शिकायतें लंबित हैं.

केन्द्रीय सूचना आयोग में अगर बात करें, तो वहां अभी में 4 रिक्तियां हैं. पहली रिक्ति दिसम्बर 2016 में हुई थी. वर्तमान में वहां कार्यरत 7 सूचना आयुक्तों में से 4 आयुक्त, जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त भी शामिल हैं, 2018 में अवकाश ग्रहण करेंगे.

जहां तक विभिन्न सूचना आयोगों के समक्ष अपीलों और शिकायतों का सवाल है, 23 सूचना आयोगों द्वारा 1 जनवरी 2016 से लेकर 31 अक्टूबर 2017 तक अवधि में कुल 2,76,405 अपील और शिकायतें पंजीकृत की गयीं और इसमें से 2,14,809 मामलों को निपटा दिया गया. सबसे अधिक अपील और शिकायतें (83,054) उत्तर प्रदेश में पंजीकृत की गयीं. कुल 47,756 अपील और शिकायतों के साथ केन्द्रीय सूचना आयोग दूसरे नंबर पर रहा. तीसरे नंबर पर कर्नाटक सूचना आयोग रहा, जहां कुल 32,403 अपील और शिकायतें दर्ज की गयीं.

मिज़ोरम और मेघालय में सबसे कम क्रमशः 21 और 63 अपील और शिकायतें पंजीकृत की गयीं.

अपील और शिकायतों को निपटाने के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग अव्वल रहा. उसने उक्त अवधि में कुल 54,219 अपील और शिकायतों का निपटारा किया.

हैरत की बात यह है कि अपील और शिकायतों के पंजीकरण और निपटान के बारे में सुशासन का दावा करने वाले नीतीश कुमार शासित बिहार, विकास के झंडे गाड़ने का दावा करे वाले भाजपा शासित मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के साथ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ने कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करायी. यही नहीं, इन 6 राज्यों के सूचना आयोगों के वेबसाइटों पर भी इस बाबत कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी.

जहां तक विभिन्न सूचना आयोगों द्वारा बिना कोई आदेश दिए अपील और शिकायतों को वापस लौटाने देने का सवाल है, जनवरी 2016 से अक्टूबर 2017 तक की अवधि में केन्द्रीय सूचना आयोग ने कुल 27,558 अपील/शिकायतों को कोई आदेश दिए बगैर वापस लौटा दिया. इसी अवधि के लिए यही काम गुजरात सूचना आयोग ने भी किया जब उसने कुल 9,854 अपील/शिकायतों को वापस लौटाया.

अपील और शिकायतों के लंबित रहने का आंकड़ा चौकाने वाला है. 31 दिसम्बर 2016 तक 23 राज्यों के सूचना आयोगों में कुल 1,81,852 मामले लंबित थे. अक्टूबर 2017 यह आंकड़ा बढ़कर 1,99,186 जा पहुंचा. 31 अक्टूबर 2017 तक सबसे अधिक अपील/शिकायतें (41,561) उत्तर प्रदेश में लंबित थे. इसी अवधि में कुल 41,178 लंबित अपील/शिकायतों के साथ महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर था.

31 अक्टूबर 2017 तक मिज़ोरम और सिक्किम में कोई अपील/शिकायत लंबित नहीं थी.

विभिन्न सूचना आयोगों द्वारा लंबित मामलों को निपटाने की मासिक दर के हिसाब से अगर देखा जाये, तो 1 नवम्बर 2017 को दाखिल किये गये अपील/शिकायत के निपटारा पश्चिम बंगाल में 43 साल बाद 2060 में हो पायेगा! इसी तरह, केरल में 1 नवम्बर 2017 को दाखिल किये गये अपील/शिकायत के निपटारे में साढ़े 6 वर्ष का समय लगेगा जबकि इसी काम के लिए उड़ीसा में 5 वर्ष का समय चाहिए होगा!


साभार- द सिटिजन