Home काॅलम चुनाव चर्चा: महागठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर अब सवाल नहीं

चुनाव चर्चा: महागठबंधन में राहुल गाँधी के नेतृत्व पर अब सवाल नहीं

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चंद्र प्रकाश झा 

नई लोकसभा के लिए 2019 में निर्धारित चुनाव की सियासी तैयारियां मिजोरम,तेलंगाना, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद तेज होतीजा रही हैं। आम चुनाव के कार्यक्रम एक अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष के प्रारम्भ में ही घोषितकर दिए जाने की संभावना है। ये चुनाव जब भी होंगे, भारत  के भविष्य की दिशा-दशा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इस चुनाव में केंद्र में अभी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिकअलायंस (एनडीए) की 26 मई 2014 से कायम नरेंद्र मोदी सरकार को दूसरी बार राजसत्ता संभालने का जनादेश मिलेगा अथवा नहीं, इस बारे में कुछभी कहना कयासबाजी होगी। मोदी भारत के 14वें प्रधानमंत्री है और उनका अगले आम चुनाव में इस पद के लिए प्रमुख दावेदार होना तय है।

गौरतलब है कि तमिलनाडु के दिवंगत पूर्वमुख्यमंत्री एम.करूणानिधि की चेन्नई में स्थापित प्रतिमा के रविवार को  यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) कीअध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा किये गए अनावरण के उपलक्ष्य में आयोजित रैली मेंद्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) प्रमुख एम.के.स्टालिन ने विपक्षी महागठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित कर दिया। इस अवसर पर अन्यके अलावा खुद राहुल गांधी, आंध्र प्रदेश केमुख्यमंत्री एवं तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) प्रमुख नारा चंद्राबाबू नायडू और केरल के मुख्यमंत्री एवं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता पी.विजयनभी उपस्थित थे। स्टालिन के प्रस्ताव पर विपक्षी दलों के नेताओं की प्रतिक्रया खुलकर सामने तो नहीं आयी है लेकिन विधान सभा चुनाव नतीजों के बाद यह लगभग तय है कि केंद्रीय सत्ता पर विपक्षी दावेदारी में कांग्रेस के नेतृत्व और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी की केन्द्रीयता को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। 

इन चुनावों से बहुत पहले राहुल गांधी कह चुके थे कि वह 17 वीं लोकसभा चुनाव में उनके पक्ष की जीत की स्थिति में प्रधानमंत्री पदका दायित्व संभालने के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी वढेरा या अन्य किसी की भी दावेदारी के सुझाव की अब कोई चर्चा नहीं होती है। ‘ नेता वही जो इलेक्शन जितवाए’की उक्ति के सन्दर्भ में कांग्रेस में आम सहमति बन चुकी है कि राहुलगांधी के नेतृत्व में चुनाव हारे नहीं बल्कि जीते भी जा सकते हैं। छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत के बाद राहुल गांधी ने रफाएल मुद्दे पर जिस तरह अपनी आक्रामकता बढ़ाई है उसके कायल उनके विरोधी भी लगते हैं। इसमें भी संदेह नहीं है कि चुनावी परिणामों की दृष्टि से अहम भारत के विशाल मध्यवर्ग के लोगों के बीच राहुल गांधी की व्यावहारिक राजनीति औरभाषागत शालीनता की प्रशंसा उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

भाजपा ने जनमानस में यह बात प्रस्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का कोई विकल्प नहीं है, और राहुल गांधी  राजनीतिक तौर पर ‘पप्पू’हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो हाल तक कहते रहे कि उनकी पार्टी केंद्र में अगले पचास बरस तक राज करेगी। लेकिन अब सत्तारूढ़ खेमा में यह बात  गहरे पैठ गयी लगती है कि अगर वह अगला चुनावन हीं जीत सकी तो नई सरकार का नेतृत्व राहुल गांधी को मिलने से रोकना संभव नहीं होगा। गौरतलब है इन पांच विधान सभा चुनावों के उपरान्त भाजपा और उसके समर्थकों ने राहुल गांधी को पप्पू कहना छोड़ दिया है।

बहरहाल,  राहुल गांधी के नेतृत्व को कांग्रेस के बाहर के विपक्षी खेमा में सबकी स्वीकार्यता अभी नहीं मिली है। उत्तर प्रदेश कीपूर्व मुख्यमंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती अर्से से स्वयं को प्रधानमत्री पद का दावेदार मानती रही हैं। उन्होंने विपक्षी महागठबंधन में कांग्रेस नेतृत्व स्वीकार नहीं किया है। वह लोक सभा की सर्वाधिक 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के प्रति तो सहज नज़र आती हैं लेकिन कांग्रेस से हाथ मिलाने में उनकी आनाकानी बरकरार है। अकारण नहीं है कि बसपा ने कांग्रेस की शुरुआती कोशिशों के बावजूद उसके साथ छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कहीं भी गठबंधन नहीं किया, हालांकि उसने चुनाव परिणाम निकलने के बाद कांग्रेस को अपना समर्थन घोषित करने में विलम्ब नहीं किया। बताया जाता है कि बसपा मध्यप्रदेश में कांग्रेस से गठबंधन  के लिए उसके वास्ते 50 सीट छोड़ने और अन्य दो राज्यों में भी ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ी रही जो कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। चुनाव के बाद कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में बसपा के समर्थन की जरुरत नहीं थी क्योंकि उसे वहाँ आशातीत सफलता मिली है। लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसपाका समर्थन कांग्रेस के काम आ सकता है जहां कांग्रेस को विधान सभा में स्पष्ट बहुमतप्राप्त करने में कुछ कसर रह गई। बसपा को मध्यप्रदेश में दो और राजस्थान में  छह सीटें मिली हैं। बसपा ने  छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी कीजनता कांग्रेस (छत्तीसगढ़) के साथ गठबंधन कर दो सीटें जीती।

केंद्रीय सत्ता पर विपक्षी दावेदारी मेंकांग्रेस की स्वीकार्यता को लेकर वामपंथी दलों और खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्टपार्टी (सीपीएम) का भी उहापोह बरकरार है। ये दीगर बात है कि माकपा की पहल पर तेलंगानाऔर राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस, दोनों के खिलाफ ‘तीसरा मोर्चा ‘ कायम करने के प्रयास विफल सिद्ध हुए। मिजोरम और तेलंगाना के अपेक्षाकृत छोटे दो राज्यों में क्षेत्रीयदलों का प्रभुत्व कायम हुआ। तेलंगाना की सत्ता में लौटी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री के.सी.आर भी भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ तीसरा मोर्चा के रूप में  ‘फ़ेडरल फ्रंट’ बनानेकी बात करते रहते हैं। लेकिन उन्होंने इस फ़ेडरल फ्रंट में पश्चिम बंगाल की  मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और कुछेक अन्य दलों के भीशामिल होने की जो आश लगाए रखी थी वह पूरी होनी संभव नहीं लगती।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा संसद के शीतकालीन सत्र की पूर्वसंध्या पर विपक्षी दलों की बुलाई बैठक में चंद्राबाबू नायडू ही नहीं ममता बनर्जी औरअरविन्द केजरीवाल भी शामिल हुए। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रा बाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ने अपनी धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के साथ पहली बार हाथ मिलाकर तेलंगाना के चुनाव में गठबंधन कर लिया। आंध्र प्रदेश विधानसभा के 2019 में ही निर्धारित चुनाव में भी इन दोनों का गठबंधन हो सकता है। यह भी गौरतलब है कि इन पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में जहां एक तरफ भाजपा का किसी से कोई गठबंधन नहीं था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को राजस्थान में पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल, पूर्व रक्षामंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा वहाँ और मध्य प्रदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव के नवगठित लोकतांत्रिक जनता दल को अपने गठबंधन में शामिल करने में सफलता मिली।

इन चुनावों के बाद तेलंगाना में के चंद्रशेखरराव ( केसीआर ) गुरुवार को  लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। उनकी पार्टी टीआरएस को 119सीटों की विधानसभा में 88 सीटें मिली जबकि कांग्रेस-टीडीपी-भाकपा और अन्य के ‘प्रजा कुटमी’  गठबंधन को 21सीटें मिलीं।  वहाँ अपने दम पर चुनाव लड़ी भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली है। तेलंगाना की नयी सरकार में विधान परिषद सदस्य मोहम्मद महमूदअली को फिर उप मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री बनाया गया है। मिजोरम की 40 सदस्यीय विधान सभा की 26 सीटें जीतने वाले मिज़ो नेशनल फ्रंट के अध्यक्ष ज़ोरमथंगा ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। वह 1998 से 2008 तक दो बार मुख्यमंत्री रहे थे। वहाँ पिछले 10 बरस सत्ता में रही कांग्रेस को सिर्फ पांच सीट मिलीं।  मुख्यमंत्री ललथनहवला दो सीटों से चुनाव लड़े थे पर दोनों जगह हार गए। नवगठित ज़ोरम पीपुल्स मूवमेन्ट मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कांग्रेस विधायक दल के नेता के चुनाव-चयन में शुरुआती उहापोह के बाद नयी सरकार के गठन कीऔपचारिकताएं  पूरी होने वाली हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सोमवार को नई सरकार का गठन हो गया। मध्य प्रदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ मुख्यमंत्री बने जो विधान सभा चुनाव नहीं लड़े थे। उन्हें अगले छह माह में विधायक निर्वाचित होने की दरकार है। राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और  कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री बने। गहलौत  राज्य की सरदारपुरा विधान सभा सीट से और पायलट टोंक सीट से जीते हैं। छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने है जो दुर्ग जिला की पाटन सीट सेजीते हैं। 

इन तीनों राज्यों में नई सरकार के गठनके अवसर पर विपक्षी दलों के भी आमंत्रित नेताओं के जमावड़े ने विपक्षी महागठबंधन में राहुल गांधी के नेतृत्व के सवाल को दरकिनार कर दिया। अब देखना है कि आम चुनावके कार्यक्रम की घोषणा के पहले और फिर चुनाव परिणाम के बाद विपक्षी गठबंधन और उसके नेतृत्व का सवाल और जवाब क्या रूप लेता है। 



(मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)




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