Home पड़ताल स्वराज के आदिवास-2: पत्थरगड़ी के इतिहास का जीता-जागता दस्तावेज़ हैं नब्बे पार...

स्वराज के आदिवास-2: पत्थरगड़ी के इतिहास का जीता-जागता दस्तावेज़ हैं नब्बे पार के सोमा भगत

SHARE
सोमाजी की ये जोड़ी एक युग की गवाह है
अभिषेक श्रीवास्तव / डूंगरपुर से लौटकर 

पहाड़ी के नीचे मोटरसाइकिलें छोड़ कर हम पैदल ही कांटेदार रास्‍तों पर ऊपर चल दिए। थावरचंद और मोहन ने बाहर से ही सोमाजी को आवाज लगाई। एक झोंपड़े के भीतर से भर्राई हुई आवाज़ में जवाब आया। हम उनके झोंपड़े के सामने पहुंचे तो गांव के आदमी के साथ अजनबी को देखकर वे अपने हाथ में रखी चिलम छुपाने लगे। नीले रंग का तौलिया लपेटे पुरानी काया का एक बुजुर्ग, जिसकी छाती के बाल भी पक चुके थे लेकिन पकी हुई मूंछ का ताव बरकरार था।

निचले छत की मिट्टी की एक छोटी सी कुटिया। सामने की दीवार पर टंगी एक पुराने किस्‍म की दुनाली बंदूक। मिट्टी के फर्श पर रखा घड़ा। घड़े के ऊपर फूल का लोटा। एक चारपाई जिस पर कपड़े अस्‍तव्‍यस्‍त फैले हुए थे। चारपाई के नीचे एक कुल्‍हाड़ी। कुल्‍हाड़ी के बगल में अंग्रेज़ी टॉनिक की एक शीशी गत्‍ते में रखी हुई। कुटिया के एक ओर लकड़ी का बंद दरवाज़ा था। दूसरी ओर मिट्टी की दीवार में बड़ा सा एक गोल छेद था। गोल छेद के दाहिने हाथ दीवार के सहारे खड़ा था एक तानपुरा। गोल छेद से हवा इतनी गति और ध्‍वनि के साथ भीतर आ रही थी कि बात करना भी मुश्किल था। अरावली की पहाडि़यों में जून के मौसम में जहां हवाएं इतना तेज़ चलती हों, इस खिड़कीनुमा छेद का रहस्‍य समझना मुश्किल था।

सोमा भगत की कुटिया

हमारे बैठने के लिए फर्श पर एक दरीनुमा कपड़ा बिछाकर सोमाजी हमारे ठीक सामने पालथी मारकर बैठ गए और अपने गांववाले थावरचंद से उन्‍होंने परिचय करवाने को कहा। हमने अपना परिचय दिया और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। वे हिंदी मिश्रित वागड़ी बोल रहे थे। जहां समझ नहीं आता, मोहनजी और थावरचंद समझा देते। एक ज़माने के आदिवासी नेता सोमाजी रोत अब सोमा भगत हो चुके थे। वे खुद को बाबा कहते हैं। अपनी उमर सौ साल से कुछ कम बताते हैं।

हमने जब 6 दिसंबर 1998 का जि़क्र किया तो उनकी आंखों में एक चमक सी दौड़ गई। हाथ उठाकर उत्‍साह में वे बोले, ”पहला पत्‍थर हमने लगाया था… देश का पहला पत्‍थर।” फिर वे एक कहानी में डूब गए। उस कहानी में, जिसकी हमें तलाश थी।

तलैया गांव में जो शिलालेख लगाया गया, उसकी कहानी शुरू होती है यहां से कोई पचासेक किलोमीटर दूर गुजरात के अरावली जिले की सीमा पर स्थित को‍ड़ीयागुण गांव से। कोडि़यागुण गांव डूंगरपुर के बिछीवाड़ा ब्‍लॉक में पड़ता है। उस गांव में तब एक बांध बनाया जा रहा था। बांध के कारण आदिवासी गांव डूब क्षेत्र में आ गए थे। सोमाजी बताते हैं कि दिल्‍ली से ‘कोई’ आया था उस वक्‍त। वे नाम याद करने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन याद नहीं आता। उसने पेसा कानून की जानकारी गांववालों को दी थी। बताया था कि अब ग्रामसभा को गांव के कामों पर पूरा अख्तियार है और इस बात की घोषणा कर दी जानी चाहिए ताकि विकास परियोजनाओं की डोर गांववालों के हाथों में रहे।

सोमाजी के मुताबिक कोड़ीयागुण गांव से 1998 में आदिवासियों की एक विशाल यात्रा निकली थी। इस यात्रा में देश भर से कार्यकर्ता भी जमा हुए थे। वही यात्रा जब गांव-गांव होते हुए तलैया पहुंची तो यहां बड़ा भारी जलसा हुआ। कोई पांच सौ लोग जमा हुए। सबकी मौजूदगी में यहां देश का पहला शिलालेख लगाया गया। सोमाजी को डॉ. बीडी शर्मा और दिलीपचंद भूरिया का नाम अच्‍छे से याद था। ध्‍यान रहे कि केंद्र का पेसा कानून भूरिया कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर ही तैयार किया गया था। उस दिन तलैया में दिलीपचंद भूरिया भी आए थे।

अपनी कहानी के बीच सोमाजी बताते हैं कि कैसे यहां पत्‍थर लगाने के बाद पुलिस की धरपकड़ में उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया था। ”अकेले मैं गिरफ्तार हुआ था”, वे छाती ठोंककर कहते हैं। तलैया में पत्‍थरगड़ी के बाद ही सोमाजी और उनके साथियों ने वागड़ मजदूर किसान संगठन की स्‍थापना की। यह संगठन अपनी पैदाइश से ही पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले गांवों में पेसा कानून का प्रचार करने में जुटा है। अब तक वागड़ के इलाके में कोई 350 से ज्‍यादा पत्‍थर गाड़े जा चुके हैं और यह काम अब भी जारी है।

वागड़ संगठन की शुरुआत से कुछ अपनी दिक्‍कतें रही हैं जिसके चलते बीस साल की लंबी अवधि में लगातार काम करते रहने के बावजूद पत्‍थरगड़ी की परिघटना में राजस्‍थान और खासकर डूंगरपुर का योगदान नहीं गिना जाता। इस क्षेत्र में पेसा कानून के क्रियान्‍वयन पर हालांकि दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर कमल नयन चौबे ने 2012 से 2014 के बीच अहम काम किया है। इस संगठन और इसके काम पर हम अगले अध्‍यायों में विस्‍तार से बात करेंगे।

इस बीच जब हम सोमाजी की तस्‍वीरें उतारने लगे, तो उन्‍होंने हमें रोका। अपनी पोती मोनिका से उन्‍होंने भगवा वस्‍त्र मंगवाया। एक का उन्‍होंने सिर पर साफ़ा बांधा और दूसरे को गले में डाल लिया। बोले- ”अब ठीक है”। फिर उन्‍होंने हमारे पीछे रखा तानपुरा मंगवाया। उसे किसी दक्ष संगीतकार की तरह पकड़ा और फोटो खिंचवाने की मुद्रा में बैठ गए। हमने उनसे गीत गाने का आग्रह किया। बिना किसी संकोच के वे वागड़ी में एक गीत सुनाने लगे।

गीत का आशय यह था कि जब घर से कहीं जाने के लिए बाहर निकलो और रास्‍ते में कुछ मार-झगड़ा हो जाए तो कुछ देर के लिए ठहर जाओ। खराब वक्‍त अपने आप टल जाएगा। झगड़े में जाकर उलझने की ज़रूरत नहीं है। वागड़ में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि यहां के आदिवासियों का स्‍वभाव हमेशा से झारखण्‍ड और छत्‍तीसगढ़ के आदिवासियों से भिन्‍न रहा है। ये किसी भी स्थिति में हिंसक नहीं होते। सोमाजी का गीत यही बात दुहरा रहा था, लेकिन अगले ही गीत में उन्‍होंने वागड़ की क्रांतिकारी परंपरा से भी अवगत करा दिया।

यह गीत अंग्रेज़ों के खिलाफ आदिवासियों की लड़ाई की कहानी कहता था। वे बताते हैं कि इसी गांव में एक ज़माने में दो अंग्रेज़ों का सिर काट कर लटका दिया गया था। यहीं हमारा ध्‍यान दीवार पर टंगी बंदूक की ओर चला जाता है। पूछने पर सोमाजी बताते हैं कि बंदूक उनके पुरखों की परंपरा का हिस्‍सा है। इसका इस्‍तेमाल नहीं किया जाता, हालांकि बीच-बीच में वे इसे चलाकर देख लेते हैं कि दुरुस्‍त है या नहीं। फिर वे बंदूक अपने कंधे पर डालकर किसी फौजी की तरह सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं। इस उम्र में भी सोमाजी की फुर्ती देखने के लायक है।

सोमाजी डोजा ग्राम पंचायत में सबसे बुजुर्ग व्‍यक्ति हैं। किसी भी फैसले के निपटारे के लिए उन्‍हें गांव में याद किया जाता है। उनका ज्‍यादातर वक्‍त ऐसे फैसलों के लिए होने वाली ग्राम सभा की बैठकों में या सत्‍संग में बीतता है। उनके पांच बेटे और पांच बेटियां हैं। एक बेटा गुज़र चुका है। एक साथ रहता है और तीन अहमदाबाद पलायन कर चुके हैं। घर में एक पोता अजय और दो पोतियां मोनिका और गुडि़या हैं। हम जितनी देर बात करते रहे, सोमाजी की पत्‍नी और बहू दूसरे दरवाजे पर बैठकर देखती रहीं।

सोमा भगत की पोती मोनिका

सोमाजी ने कोड़ीयागुण नाम के गांव की कहानी सुनाकर हमारी जिज्ञासा को बढ़ा दिया था। तलैया को समझने के लिए अब कोड़ीयागुण जाना जरूरी था, जहां से डॉ. बीडी शर्मा की अगुवाई में आदिवासियों की यात्रा 1998 में निकली थी। दिक्‍कत यह थी कि उस गांव में जाने को कोई सहज ही तैयार नहीं होता। वजह यह है कि बीच में एक बहुत विशाल जंगल पड़ता है और पहाड़ के बीच से होकर जाने वाला रास्‍ता काफी खराब है। खुले जंगल के बीच से जाना होता है जहां जंगली पशुओं के मिलने का खतरा होता है। अगले दिन इस यात्रा की आस में हम सोमाजी से विदा लेते हैं। थावरचंद और मोहन रोत ने वादा किया है कि संगठन से कोई न कोई कोडीयागुण के लिए हमारा सारथी ज़रूर बनेगा।

शाम ढलते डूंगरपुर शहर में वापसी एक विडंबना रचती है। एक ओर बीस किलोमीटर की दूरी पर सैकड़ों आदिवासी गांव प्‍यासे हैं। दूसरी ओर यह शहर, जहां फतेहगढ़ी पहाड़ी के ऊपर संगीतमय फव्‍वारा चलता है और नीचे गैप सागर झील का अथाह पानी शंकर की प्रतिमा को नहलाने के काम आता है। कहने को यह आरक्षित सीट है, लेकिन शहर की सड़क पर आपको आदिवासी नहीं मिलेंगे। हमारी वापसी के वक्‍त उनकी भी वापसी का वक्‍त होता है। वे रोज़ यहां मजदूरी करने आते हैं और दिन ढलते अपने-अपने गांवों को लौट जाते हैं। जिला प्रशासन ने इस शहर को देश का सबसे साफ़ शहर बनाने की ठानी है। यहां सड़क पर गंदगी फैलाने पर जुर्माने का प्रावधान है, लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि आप कौन हैं- आदिवासी या गैर-आदिवासी।

अपनी बन्दूक में तल्लीन सोमाजी

ठीक यही बात शहर की चौहद्दी पर तैनात ट्रैफिक पुलिस की सख्‍ती पर लागू होती है। थावरचंद हेलमेट और लाइसेंस ले जाना भूल गए थे। जाते वक्‍त और लौटते वक्‍त उन्‍हें मुख्‍य सड़क छोड़कर गांव की पगडंडियों से होकर आना पड़ा। वे कहते हैं- ”इन्‍हें पता चल जाए कि सामने वाला एसटी है तो किसी भी कारण से जुर्माना लगा देंगे।” सबसे साफ़ शहर का अर्थ हमारे सामने धीरे-धीरे खुल रहा है। कोड़ीयागुण जाने का रास्‍ता खुलना अब भी बाकी है।

पहला अध्याय: स्वराज के आदिवास-1: पत्थरगड़ी के अतीत पर देश के पहले “गाँव गणराज्य” से प्रामाणिक रिपोर्ट


क्रमशः