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गन्ना और जिन्ना के बीच फंसे कैराना उपचुनाव में आज प्रचार का अंतिम दिन, महागठबंधन भारी

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मनदीप पुनिया / कैराना से 

कैराना का नाम सामने आते ही दिमाग में हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उभरकर आता है. भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को इसके जनक स्वर्गीय सांसद हुकम सिंह की मौत के बाद 28 मई को हो रहे लोकसभा उपचुनाव में भी जीवित रखा है, लेकिन रालोद और विपक्ष (सपा, बसपा, कांग्रेस) के गठबंधन के चलते यह मुख्य मुद्दा नहीं बन पा रहा है. गोरखपुर उपचुनाव में अपने गढ़ में ही मात खाने के बाद सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैराना के मैदान में एक बार फिर से हिन्दुत्व का पत्ता फेंक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रालोद के जयंत चौधरी गन्ना किसानों और साम्प्रदायिक सौहार्द को मुद्दा बनाकर चुनाव में उतर रहे हैं. असल में दोनों ही पार्टियां जातिगत ध्रुवीकरण करने के लिए खूब नट-बुलट कस रही हैं.

मीडियाविजिल ने दोनों ही पार्टियों के स्टार प्रचारकों के भाषणों को सुनकर और लोगों पर पड़ने वाले उनके प्रभावों को मापने के लिए ग्राउंड पर जाकर अलग-अलग समुदायों से बातचीत करके इस चुनाव के धार्मिक और जातीय समीकरणों की पड़ताल की है.

योगी के जातिगत तीर और हिन्दुत्व कार्ड  
तारीख 24 मई, शामली के इंटर कॉलेज के मैदान में यूपी के मुख्यमंत्री योगी कैराना से भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह की चुनावी सभा को संबोधित करते हुए अपना पुराना हथियार “हिन्दुत्व” निकाल लाए. कुल 36 मिनट के भाषण में उनका कहना था कि इस उपचुनाव में स्पष्ट रूप से ध्रुवीकरण हो चुका है. “एक तरफ वो लोग हैं जिन्होंने मुजफ्फरनगर और पश्चिमी यूपी को दंगों की आग में झोंका, सचिन और गौरव जैसे कितने ही नौजवानों की हत्या कर यहाँ के निर्दोष लोगों को फंसा दिया. तब ये सब चुप पड़े थे, कुछ भी नहीं बोल रहे थे. उस समय भाजपा के कार्यकर्ता आवाज उठा रहे थे, संजीव बालियान और सुरेश राणा को उठाकर बंद किया गया था.”
उन्होंने रालोद को न सिर्फ हिन्दू विरोधी बल्कि जातिवादी बताते हुए कहा “कोई जाति का नारा दे रहा होगा, कोई अपने अस्तित्व की बात कर रहा होगा, कोई किसानों का नारा दे रहा होगा. कोई कह रहा है गन्ना या जिन्ना. गन्ना हमारा मुद्दा ज़रूर है, लेकिन हम जिन्ना की भी तस्वीर नहीं रहने देंगे.”
उन्होंने कैराना के सांसद रहे स्वर्गीय हुकम सिंह का जिक्र करते हुए कहा कि अगर पिछली सरकार कोई काम करती तो हुकम सिंह को कैराना में हिन्दुओं के पलायन के लिए सड़क से संसद तक आन्दोलन न करना पड़ता.

इस उपचुनाव में योगी को पहले ही पता चल चुका है कि इस सीट पर खाली हिन्दुत्व के कार्ड से काम नहीं चलने वाला है इसीलिए उन्होंने अपने भाषण में कई जातिगत तीर भी छोड़े. उन्होंने अपने भाषणों में कश्यप, सैनी और प्रजापति जाति के लिए किए गए कार्यों का अलग से जिक्र किया.
योगी के हिन्दुत्व कार्ड और जातिगत तीरों का असर मापने के लिए मीडियाविजिल ने शामली और कैराना शहर तथा भूरा और झिंझाना गांव में जाकर आम लोगों से बातचीत की. कैराना के शहरी और ग्रामीण इलाकों ने योगी के हिंदुत्व के कार्ड को नकार दिया है. लगभग हर समुदाय साम्प्रदायिक सौहार्द की बात कर रहा है. हिन्दू जाट, मुस्लिम जाट, मुस्लिम गुज्जर, दलित, कई दूसरी किसान जातियों और बाकी बची सभी मुस्लिम जातियों को योगी दंगा फसाद करवाने वाले लगते हैं.
इसके उलट योगी के जातिगत तीर सही निशाने पर लगे हैं. शहर में रह रहे कश्यप, सैनी, प्रजापति और कई अन्य कामगार जातियों के ज्यादातर लोगों पर योगी आदित्यनाथ के हिन्दुत्व का जादू सर चढ़कर बोल रहा है और इन्हें योगी के कामकाज करने का अंदाज़ पसंद आया है. इसलिए उपचुनाव में वे फिर दोबारा भाजपा को ही वोट डालने की बात कह रहे हैं. कैराना के हिन्दू गुज्जर भी भाजपा के साथ ही हैं.
रालोद का गन्ना और जिन्ना मन्त्र  
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ही हरित प्रदेश (पश्चिमी यूपी) में अपने वजूद को बचाने के लिए जूझ रही रालोद महागठबंधन के चलते अपनी जमीन बचाती नज़र आ रही है. रालोद के अध्यक्ष अजीत सिंह और जयंत चौधरी महागठबंधन की प्रत्याशी तबस्सुम हसन की चुनावी सभाओं में गन्ना और जिन्ना का डायलाग बोलकर गन्ने के बकाया और हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात कर रहे हैं. गन्ना और जिन्ना के डायलाग के असर को मापने के मीडियाविजिल ने शामली, कैराना, भैंसवाल और गठवाला खाप के गांव के लोगों से बातचीत की.

कैराना सूबे के किसानों का एक बड़ा तबका गन्ने के बकाया के मुद्दे को लेकर रालोद के साथ जरूर है, लेकिन बहुत सारे किसान इस बार भी भाजपा को वोट दे रहे हैं. रालोद हिन्दू-मुस्लिम एकता को फिर से स्थापित करने में एक हद तक सफल जरूर हुई है, लेकिन गांव के किसानों के मुकाबले शहरी कामगार तबका अभी भी दिलों में एक-दूसरे के प्रति खटास पाले बैठे हैं.

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