Home पड़ताल अपनी जनपक्षधरता की कीमत चुका रहे हैं पत्रकार रूपेश कुमार सिंह

अपनी जनपक्षधरता की कीमत चुका रहे हैं पत्रकार रूपेश कुमार सिंह

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बोल की लव आजाद है तेरे।।
पर हमारे व्यवस्था संचालक बार-बार यह एहसास दिलाने की कोशिश में लगे रहते हैं कि हमें इस अव्यवस्था के खिलाफ कुछ नहीं बोलना है, सब गड़बड़ियां देखकर मुंह बंद रखना है वरना हमें यह एहसास दिलाने के लिए सत्ता संचालक कोई भी अमानवीय कदम उठा सकते हैं। अगर आप व्यवस्था के खिलाफ बोलेंगे तो आप पर झूठे आरोप लगाकर, उस आरोप का हवाला देकर कड़ी से कड़ी सजा दिला सकते हैं और बार-बार आपकी जमीर को मारने के लिए ताकि वह कहीं उनकी बिकी हुई जमीर को धिक्कारने व लोगों की जमीर को बचाने न लगे सुरक्षा का हवाला देकर हर संभव प्रताड़ना दे सकते है।

देश में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। इसी कड़ी में एक नाम है पत्रकार रूपेश कुमार सिंह जिन्हें उनकी जुझारूपन के कारण गलत तरीके से पकड़कर झूठे आरोप लगाकर धारा 414, 120 बी सहित यूएपीए के तहत कई धाराएं-10,13,18,20,38,39 थोप दी गयी हैं और जेल में डाल दिया गया है। इतना ही नहीं आगे भी सही व्यवस्था के लिए बोलने के कारण बहाने बनाकर उन्हें यातना देने की कोशिश की जा रही है।

जजर्र सेल में बंद है रूपेश कुमार 

25 सितंबर को रूपेश कुमार सिंह और उनके साथ सात बंदियों को शेरघाटी जेल से गया जेल में शिफ्ट किया गया। उनके साथ लाए बाकि सात बंदियों को एक साथ एक सेल में डाला गया, जहां पंखा और नल की सुविधा है। वहीं रूपेश कुमार सिंह को एक अलग जर्जर सेल जहां विचाराधीन बंदी नहीं अपराधिक गतिविधियों के आरोपित बंदी रहते है, में एक बेहद खराब कमरे में डाला गया जहां न पानी है न पंखा, जहां छत की स्थिति यह है कि 80 प्रतिशत हिस्से से लगातार बारिश का पानी टपक रहा है। दीवारें सीलन भरी हुई हैं, जिस कमरे के छत के 80 प्रतिशत हिस्से से लगातार पानी चू रहा हो, तो हम कल्पना कर सकते हैं कि वहां रहने वाले इंसान की क्या स्थिति हो सकती है? उसके फर्श पर कितना जगह बचता होगा सोने के लिए, बाकि समान पानी से कितना महफूज रह सकता होगा और उस चैबीस घंटे सीलन भरे ठंडे कमरे में रहने वाला व्यक्ति किस तरह से ठंड को झेल रहा होगा। पर शायद हमें इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इस देश की व्यवस्था को व्यवस्था संचालको ने इतना दुरूस्त बना ही रखा है कि किसान सूखा से आत्महत्या करते हैं, जनता बाढ़ से मरती है, और उनके पक्षधर जेलों में ऐसी जर्जर स्थिति झेलते हैं।

रूपेश कुमार सिंह से 28 सितंबर को अपनी मुलाकात के बाद ईप्सा शताक्षी बताती है-‘‘जब रूपेश को यहां शिफ्ट किया गया था, उस वक्त उस कमरे में एक और बंदी था, रूपेश ने जेल प्रशासन को कमरे की हालत से जब अवगत कराया उसके बाद जेल प्रशासन द्वारा उस अन्य बंदी को दूसरे कमरे में डाल दिया गया, मगर रूपेश को उसी कमरे में छोड़ दिया गया।’’ यह इस बात का सबूत देती है कि जानबूझ कर उन्हें उस स्थिति में रखा जा रहा है। जानबूझ कर जेल प्रशासन उसे नजरअंदाज कर रही है। ऐसी स्थिति में उनके स्वास्थ्य पर जो बूरा कोई प्रभाव पड़ रहा है, उसका पूरा जिम्मेवार जेल प्रशासन ही होगा। ईप्सा शताक्षी आगे बताती है कि उन्हें पैर के नसों में खिचाव का गंभीर प्रोब्लम है, उन्हें डर है कि ऐसी स्थिति में उनकी परेशानी और गंभीर रूप से न बढ़ जाए क्योंकि 25 तारीख से लेकर अभी तक वे उसी अवस्था में रह रहे हैं जो उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने मुलाकात में भी नसों के दर्द के बढ़ने का जिक्र किया था।

क्यों झेलने को मजबूर है रूपेश कुमार सिंह यह परिस्थिति

इसका कारण शेरघाटी जेल में वहां की अनियमितता और अव्यवस्था को लेकर बंदियों द्वारा रूपेश कुमार सिंह के नेतृत्व में अपनी मांगो के लिए की गई भूख हड़ताल है।
वे सारे 9 बंदियों को जो शेरघाटी जेल में भूख हड़ताल में अग्रिम पंक्ति में थे, गया सेंट्रल जेल शिफ्ट किया गया है। 4 सितंबर को 100 से ज्यादा बंदियों ने जेल प्रशासन की अव्यवस्था के खिलाफ अपनी मांगों को रखा था और उसके लिए भूख हड़ताल की थी।
जिन मांगों को लेकर यह भूख हड़ताल हुई थी हमें भी एक बार उसे देखना चाहिए कि क्या वे मांगे बेबुनियाद है? क्या हर जेल में ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? वे मांग थी-
1. जेल मैनुअल के साथ सभी बंदियों को खाना, नाश्ता और चाय तथा पाकशाला में जेल मैनुअल टांगा जाय।
2. जेल अस्पताल में 24 घंटे डाॅक्टर की उपस्थिति सुनिश्चित किया जाए।
3. मुलाकाती से पैसा लेना बंद किया जाए व मुलाकाती कक्ष में पंखा व लाइट सुनिश्चित किया जाए।
4. बंदियों को अपने परिजनों व वकील से बात करने के लिए STD चालू करवाया जाय।
5. शौचालय के सभी नल व गेट ठीक करवाया जाय।
6. मच्छरों से बचाव के लिए सप्ताह में एक बार मच्छर मारने की दवा का छिड़काव किया जाए।
7. बंदियों पर जेल प्रशासन द्वारा लाठी चलाना व थप्पड़ मारना बंद किया जाय।
8. हरेक वार्ड में इमरजेंसी लाइट की व्यवस्था सुनिश्चित की जाये।

जेलो के लिए ऐसे मांगों के मायने

जेलों की बदतर हालत जरूर सुधरनी चाहिए। बात सिर्फ एक जेल की नहीं है।( थोड़ा बहुत अंतर देखा जा सकता है) जेल के भीतर की हालत तोे वहां बंद कोई बंदी ही बता सकता हैं, पर बाहर की खस्ता हालत से हर मुलाकाती अच्छी तरह परिचित हो सकता है। इस जेल में मुलाकात के लिए आए बंदी और परिजनों की तुलना में एक बहुत ही छोटी-सी जगह, जहां भीषण गर्मी और उमस भरी होती है, एक-दूसरे के पसीने की बदबू महकती रहती हैं, दो जालियों के बीच से चेहरा भी साफ नजर नहीं आता है, न लाइट की व्यवस्था, न पंखा उपर से अंधेरी-सी जगह। उस वातावरण में अपनों से मुलाकात को बेचैन बंदी व परिजन एक-दूसरे को ठेलते अपनी बातें चीख-चीख कर करने पर मजबूर, क्योंकि जगह छोटी-सी है लोग ज्यादा है और अपनी बात कहने के लिए समय कम। वहीं मुलाकातियों से कहीं मुलाकात के नाम पर तो कहीं समान पहुंचाने के नाम पर पैसे लिये जाते हैं। जिसके जरीये अलग-अलग चीजों से अच्छी रकम की उगाही कर ली जाती हैं। रूपेश कुमार सिंह और उनके जैसे तमाम लोग इस व्यवस्था के लिए रोड़े के रूप में नजर आते है इसलिए प्रशासन उन्हें अलग-अलग तरह के बहाने बनाकर कड़ी सजा दे रही है। उक्त मांगों को लेकर की गई भूख हड़ताल के बाद मजबूर हो जेल व्यवस्था में बदलाव किये गये थे, मगर इस बदलाव के नुकसान को झेलना जेल प्रशासन को रास नहीं आया, रूपेश कुमार सिंह के साथ आज का रवैया इसी कारण रहा है।

दरअसल लगभग सरकारी जगह स्कूल, आफिस , जेल, सरकारी बैंक , सरकारी हर जगह पर लोगों के रूकने, रहने व बाथरूम, पानी, लाइट, पंखें की स्थिति बद से बदतर होती है मगर व्यवस्था को इतना डेमेज कर दिया गया है कि लोग उसे सामान्य मान लेते हैं, उसे झेलने के आदि हो जाते है। जबतक कि उससे कोई अप्रिय घटना न घटे। व्यवस्था संचालकों ने सिस्टम को ऐसा बना रखा है कि सिस्टम में लगे लोग न चाहते हुए भी अपनी जमीर को सुला देते है और व्यवस्था उसे निकम्मा और लोभी बना देती है। वहां रूपेश कुमार सिंह जैसे लोगों का बोलना व्यवस्था संचालकों की आंखों में खटना लाजमी है।

कितनी जरूरी है ये बदलाव

खैर जेल में व्यवस्था की यह बदतर स्थिति और भी चिंतनीय है क्योंकि यहां बंदियों को रात-दिन इन स्थिति से गुजरना पड़ता है। सत्ता-प्रशासन की ओर से अपराध मिटाने के नाम पर जो मुहिम चलती है, उसमें जेलों में बंद आधे से ज्यादा तो फर्जी केसों में फंसाए गये लोग होते है। 4 जून 2019 को ही झारखंड के पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, वकील मिथलेश कुमार सिंह और ड्राइवर मोहम्मद कलाम को फर्जी केस में फंसाकर बिहार के शेरघाटी जेल में डाल दिया गया है। रूपेश कुमार सिंह को उनकी लेखनी छोड़ने की धमकी दी गयी और ऐसा करने से इनकार करने पर उनकी गाड़ी में पुलिस द्वारा विस्फोटक प्लांट करके उनपर विस्फोटक सप्लाई करने का केस बनाकर जेल में डाल दिया गया। आज उनके परिजनों को उनसे मुलाकत के लिए 5-6 घंटे का रास्ता तय करना पड़ता है, एक दिन मुलाकात न हो पायी, तो दूसरे दिन के लिए होटल लेने पड़ते हैं। बात करने की कोई सुविधा नहीं होने के कारण काफी परेशानी उठानी पड़ती है, पर यह हाल सिर्फ एक बंदी का नहीं है। बहुतेरे बंदियों का यही हाल है। क्या कैदी मतलब जीवन के हर जरूरतों से दूर होना होता है? क्या कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार करना जेल प्रशासन का दायित्व है? जबकि सच्चाई यह है कि जेल में ऐसे कितने ही बंदी है जो फर्जी केस में फंसाए गये हैं, बहुत कम कैदी ऐसे होंगे, जिन्हें सही अर्थो में उसी जुर्म की सजा मिली हो, जो उन्होंने किया है।

प्रशासनिक अराजकता व न्याय की व्यवस्था

यहां स्थिति सुधारने में प्रशासन की कम रूचि है, मुख्य धैय है बिगड़ी व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज को अराजकता का हवाला देकर बल पूर्वक शांत करना। कानून और व्यवस्था के नाम पर पुलिसिया दमन करना। रूपेश कुमार सिंह पर एक आरोप यह भी है कि वे सरकार की जनविरोधी नीति के खिलाफ लिखते हैं, यानी सरकार के खिलाफ लिखना बोलने ही अपराध है चाहे वह जनविरोधी ही क्यों न हो?
सच बोलने लिखने वालो को झूठे आरोपों के तहत उस अपराध की पूरी सजा दी जाती है, प्रताड़ना दी जाती है जो उन्होंने किया ही नहीं। खैर वे दोषी हैं या नहीं इस बात का फैसला अदालत करती है। मगर मामले लम्बी खींचने की पुलिस प्रशासन को पूरी छूट है। पुलिस प्रशासन पर ऐसा कोई दबाव नहीं है कि वह निश्चित समय में केस की फाइल तैयार करे, या है भी तो निष्क्रिय है जिसका परिणाम यह है कि आज जनपक्षधरों को, प्रगतिशीलों को किसी भी झूठे केस में फंसाकर जेल में डाल दिया जाता है कई केस तो इतने झूठे होते हैं कि उसका खंडन समाज ही कर देता है, मगर उसे अदालत में फैसले तक पहुंचाने में इतना वक्त खींचा जाता है कि उक्त व्यक्ति की जिंदगी का अच्छा हिस्सा उन चारदिवारी में बीत जाती है और उस दौरान भी जेल प्रशासन को यह छूट होती है कि वे उक्त बंदी के साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार कर सकते है। चाहे तो अंडा सेल में रख सकते हैं, चाहे तो जर्जर कमरे में जैसा रूपेश कुमार सिंह को रखा गया है जिससे वह मानसिक-शारीरिक रूप से प्रताड़ित होते रहे। कानून और व्यवस्था की धज्जियां उड़ाकर उसके रक्षा के नाम पर पुलिसिया राज चलाए जा रहे हैं।

शेरघाटी जेल के बंदियों का आठ सूत्री मांगों को लेकर यह भूख हड़ताल सराहनीय था। ऐसी मांग हर जेलों में होनी चाहिए, जहां इसकी सुविधा नहीं है इसे तो बंदी ही नहीं परिजनों की ओर से भी होनी चाहिए क्योंकि इसे परिजन हर बार झेलते हैं। हमारे साथी रूपेश कुमार सिंह को भले ही इस कारण ही बदतर स्थिति में रखा गया है मगर वे आज भी अपने भरोसे के साथ खड़े है। जिस रूपेश कुमार को सच बोलने के लिए झूठे आरोपों का मुकाबला करना पड़ा अब उन्हें सच बोलने के लिए जेल प्रशासन के षड्यंत्र का मुकाबला करना पड़ रहा है। उनके जैसे इंसान को यातना देना जेल प्रशासन के लिए शर्म की बात होनी चाहिए। हमें ऐसे इंसान पर गर्व है जो व्यवस्था से समझौता कर लेना, हल नहीं उसे जीने लायक बनाने पर विश्वास करता है। इंसान चाहे जहां भी हो मूल सुविधाओं से उसे वंचित नहीं किया जा सकता। एक इंसान को इंसान की जिंदगी जीने की हर जगह स्वतंत्रता होनी चाहिए।

1 COMMENT

  1. एक हास्य फिल्म का डायलॉग है ,l एक दृश्य में एक दरोगा जी जिले के सारे दरोगाओं की मीटिंग लेते हैं और कहते हैं फला थाने के लिए सबसे ईमानदार दरोगा चाहिए और इस थाने की बोली शुरू होती है 5 lakh से 5 lakh ek ….5 लाख 2….5 लाख 3. I
    सालों हुए जस्टिस मुल्ला ने पुलिस को अपराधियों का संगठित गिरोह कहा था l यह एक सर्वज्ञान तथ्य है कि कहीं चोरी ना हो रही हो अगर आप वहां चौकी खुलवा दें तो वहां चोरी होने सुनिश्चित है l क्योंकि हर चौकी se SP ko एक निश्चित राशि पहुंचाई जाती है ऐसा ही भारत भर में जेलों में होता है l इसीलिए Pucl jesi मानवाधिकार संस्थाओं को तिहाड़ जेल में निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जाती l
    इसी साल 26 जनवरी को जब इंकलाबी मजदूर केंद्र के अध्यक्ष को गिरफ्तार कर हल्द्वानी , uttarakhand जेल में रखा गया तो उन्हें भी उन्हें भी पैसे ना देने पर दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा जबकि उनका एक पाव पोलियो ग्रसित है और उन्हें एक कान से भी कम सुनाई देता है !
    भारत भर में नशा ,अपराध, , अपहरण ,वेश्यावृत्ति के अड्डे भला पुलिस के सहयोग के बिना कैसे चल सकते हैं ?
    जिस राजनीति का पतन इतना हो गया हो कि अपनी 90 साल की मां को भी नोटबंदी के समय लाइन में खड़ा कर दिया जाए

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