Home पड़ताल आज़ादी की 73वीं वर्षगांठ पर ‘वेल्‍फेयर स्‍टेट’ के ताबूत में आखिरी कील

आज़ादी की 73वीं वर्षगांठ पर ‘वेल्‍फेयर स्‍टेट’ के ताबूत में आखिरी कील

SHARE

अंग्रेज़ी राज से आज़ादी के 73वें जश्न में एक औपचारिक कार्यक्रम में देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा, वह प्रातिनिधिक संसदीय लोकतंत्र के सर्वेसर्वा नेता का और इस नाते इस आधुनिक राष्ट्र–राज्य का आधिकारिक बयान है। इस कार्यक्रम का आयोजन स्थल मुगलों की विरासत और फ़िलहाल डालमिया समूह के आधिकारिक नियंत्रण में संरक्षित दिल्ली का लाल क़िला था।

मोदी जी ने ऐसे तो कई बातें कहीं। देश के अधिसंख्यकों का दिल जीत चुके एक लोकप्रिय नेता के तौर पर उनका आत्मविश्वास अपने चरम पर था। जो आधिकारिक घोषणाएं उन्होंने कीं उसके लिए इससे कम आत्मविश्वास से काम भी नहीं चलता। उन्होंने कई बातें कहीं। लगभग डेढ़ घंटे बोलते हुए बहुत कुछ कहा जा सकता है। माना जाता है कि ए-4 साइज़ का एक पेज पढ़ने में करीब दो मिनट का समय लगता है, इस लिहाज से मोदी जी ने 90 मिनट में करीब-करीब 45 पन्नों का भाषण दिया। इन पैंतालीस पन्नों में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, जो अब आधिकारिक तौर पर देश के इतिहास में रिकॉर्ड हो चुका है।

बाकी बातों को छोड़कर मेरा ध्यान उनकी कही दो बातों पर गया। पहली, कि ‘अब वक़्त आ गया है कि देश की जनता, सरकार को अपने घरों से बाहर निकाले’ और दूसरी, कि ‘धनाड्य वर्ग खुद देश का धन हैं अत: इन्हें देखने का नज़रिया बदला जाये और इनका सम्मान व सराहना की जाए। अगर यह वर्ग धन पैदा करता है तो देश का धन ही है और जनता को उस धन का लाभ मिलेगा’।

लोगों की ज़िंदगी में सरकार की भूमिका कम से कम होना सैद्धान्तिक रूप से बुरी बात नहीं है। यह तो इस बात का द्योतक है कि देश में आत्मनिर्भरता है, जहां राज्य ने ऐसा माहौल तैयार कर दिया है कि लोग अपनी ज़िंदगी के बारे में बेहतर ढंग से सोच सकते हैं और राज्‍य उन्‍हें प्रगति करने की सहूलियतें प्रदान करता है। मोदी के कहने में ऐसा स्वर हालांकि नहीं था। वे जब बोल रहे थे, तो उसकी व्यंजना कुछ इस तरफ इशारा कर रही थी कि जो काम पिछले सत्तर साल में नहीं हुआ वह हमने बीते पांच साल और 72 दिनों में कर दिखाया। वो काम है–नव–उदारवादी अर्थव्यवस्था की महत्वाकांक्षी परियोजना के पूरे होने की घोषणा।

एक ऐसी घोषणा, जिसमें अपने नागरिकों को यह जताया गया कि राज्य अब लोगों की परवाह करने से आजिज़ आ चुका है। उसके पास अब दूसरे महत्वपूर्ण काम हैं- जैसे कार्पोरेट्स की परियोजनाओं को फैसिलिटेट, रेग्युलेट करना और इनके खिलाफ हर संभव संस्थान, व्यक्ति, नागरिक, संगठन, आंदोलन, यूनियनों आदि से निपटना। वास्तव में इस बात को गहरे स्तर पर कल्याणकारी राज्य के अंत की घोषणा के तौर पर देखा जाना चाहिए।

जो आशंकाएं 1990 के बाद वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की आर्थिक नीतियां अपनाने से पैदा हुईं थीं, उसका ही इज़हार मोदी जी ने अपने भाषण में किया है। यह संदेह या व्यंजना अकारण होती अगर इसी भाषण में मोदी जी नव-धनाड्य वर्ग के प्रति सहानुभूति का आह्वान नहीं करते। इन दोनों महत्वपूर्ण उद्घोषों को एक साथ जोड़कर देखे जाने की ज़रूरत है।

खानदानी और विरासत से धनी लोगों का ज़माना काफी पहले बीत गया- जिन्हें लेकर कभी आज़ादी के तुरंत बाद राष्ट्र-निर्माण में उनकी भूमिका को ‘देशी-पूंजीपति’ शब्द से अलंकृत करते हुए खुद जवाहरलाल नेहरू ने तमाम सहूलियतें दी थीं। यह बात भी सही है ब्रिटिश राज से आज़ादी की ललक इन देशी पूंजीपतियों में बेतहाशा थी। इसके पीछे भावनात्मक कारणों के साथ-साथ अपने व्यापार-वाणिज्य को बढ़ाने की आकांक्षा भी थी। इन देशी पूंजीपतियों में टाटा, बिड़ला, बजाज, गोदरेज आदि थे। इन्हें मुनाफा दिलाने के लिए नेहरू की योजना आम जनता की क्रय–शक्ति को बढ़ाने की थी। इसी उद्देश्‍य से तमाम योजनाबद्ध विकास, भूमि-सुधार, रियायतें आदि दी गयी थीं।

अब जबकि आवारा वित्तीय पूंजी का दौर है, ऐसे खानदान पीछे छूटते हुए दिखलाई पड़ रहे हैं। उनका स्थान वैसे लोग लेने को आतुर हैं जिनके पास पूंजी भले कम हो लेकिन सरकार पर जिनकी पकड़ अच्छी है। ये वे लोग हैं जिन्‍हें अपनी पूंजी से व्यापार–वाणिज्य शुरू करने की ज़रूरत नहीं है। जिसे ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ कहते हैं, उसके मार्फत उन्हें वे सारे संसाधन खुद राज्य मुहैया कराएगा। ऐसा बीते पांच साल में तेज गति से हुआ भी है।

अब इनके प्रति कोई रोष पैदा न हो- जैसा कि लोगों में धीरे-धीरे पनप रहा है- तो उसके लिए सरकार को यह अपील करनी होगी और उन्हें नयी पदवियों से विभूषित भी करना होगा। ‘धन सर्जक’ शायद वेल्थ क्रिएटर का हिन्दी तर्जुमा हो सकता है यानी वैसे लोग, जो धन पैदा करते हैं। कैसे? यह पूछना जनता का काम नहीं होना चाहिए, इसलिए इन पर आस्था व्यक्त करने की समझाइश प्रधानमंत्री जी द्वारा दी गयी है।

‘सरकार को अपने घरों से बाहर निकालना’ यानी सरकार के भरोसे नहीं बैठना 2019 में पैदा हुआ एक नया मुहावरा हो सकता है। इस मुहावरे का प्रयोग अगर वाक्य बनाने में किया जाए तो उसके कुछ उदाहरण इस प्रकार होंगे– ‘रेलवे के टिकटों पर पांच साल पहले से छपना शुरू हो गया था कि आपकी इस यात्रा का 43 प्रतिशत धन लोगों (सरकार) द्वारा दिया गया है’।

इस मुहावरे का प्रयोग करें तो हमें कहना चाहिए कि अब हम यह 43 प्रतिशत किराया भी खुद भरेंगे। इसके लिए सरकार रेलवे को निजी हाथों में दे देगी और हम सरकार को अपने घर से बाहर कर देंगे।

ठीक इसी प्रकार आपके बच्चे की शिक्षा के लिए सरकार स्कूल बनवाती रही है, शिक्षकों की व्यवस्था करती रही है। अब इस नए मुहावरे में हम कहेंगे कि अपने बच्चे की शिक्षा की ज़िम्मेदारी हमारी और केवल हमारी होगी। सरकार शिक्षा का जिम्‍मा कॉरपोरेट्स को दे देगी जहां आप बिना सरकारी सहयोग के अपने बच्चे को पढ़ाएंगे और सरकार को अपने घरों से बाहर कर देंगे।

इससे दोनों उद्देश्य सफल हो जाएंगे– पहला, हम सरकार को अपने घरों से बाहर कर देंगे और दूसरा, देश में धन सर्जकों का निर्माण बड़े पैमाने पर कर सकेंगे। चूंकि अब इन्हीं धनकुबेरों से हमारी ज़िंदगी का हर कारोबार चलेगा, तो हम उन पर कोई संदेह नहीं करेगे, उनकी इज्ज़त करेंगे और उन पर कोई सवाल भी नहीं उठाएंगे।

राष्ट्रवाद के नशे में चूर जनता वैसे भी अपने हालात के लिए धीरे-धीरे सरकार से सवाल करना छोड़कर सवाल करने वालों पर हमले करने को आतुर हो चुकी है। जिसे अब इस मुहिम का हिस्सा भी बनना है, वे अदानी की संपत्ति में हुए इजाफे पर सवाल उठाने वाले को अब ‘राष्ट्रवादी’ तरीके से समझाएं और अपनी सरकार का काम आसान करें। अब जय शाह की अवैध ढंग से बेतहाशा बढ़ी संपत्ति पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता क्योंकि वह ‘वेल्थ क्रिएटर’ है। उसकी इज्‍ज़त करना इस देश की जनता का धर्म है।

यह सवाल अब बेमानी है कि अगर लोगों की ज़िंदगी में सरकार को घरों के बाहर बैठना है तो भला वह किस रूप में होगा? इसके लिए सरकार ने हाल ही में यूएपीए यानी अवैधानिक गतिविधि निरोधक कानून में संशोधन आपके चुने हुए प्रतिनिधियों की करतल ध्वनि से संसद के भीतर पारित करवाया है। इसके तहत अवैधानिक या गैरकानूनी क्या होगा? यह तय करने का अधिकार सरकार के पास होगा और जब आप सरकार को घर के बाहर कर चुके हैं तो यह उस पर ही छोड़ दीजिये। ठीक?

इसका सही जवाब हालांकि यह होना चाहिए कि सरकार को जब हमने अपने-अपने घरों से बाहर कर ही दिया है तो अब सरकार भी हमारे गांवों से बाहर निकले, हमारे संसाधनों पर नज़र न रखे और दोनों अपने-अपने हाल में मस्त रहें।

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.