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युवा कश्मीरी उद्यमियों को घाटी से पलायन के लिए मजबूर कर रही है इंटरनेट बंदी!

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जम्मू कश्मीर में इंटरनेट बंदी के 120 दिनों से ज्यादा खिंच जाने के कारण ज़ोर-शोर से शुरू हुए स्टार्ट अप दम तोड़ने ले हैं। युवा कश्मीरी उद्यमियों के रोज़गार की तलाश में अपने घर और सपने पीछे छोड़ घाटी से पलायन कर रहे हैं। पीरज़ादा आशिक की रिपोर्ट:

फास्टबीटल के कार्यालय में 4 अगस्त को गहमागहमी थी। एशिया में कालीन के सबसे बड़े कारखाने के रूप में जाने जाने वाली श्रीनगर की इंडो-कश्मीर कार्पेट फैक्ट्री के ऐतिहासिक प्रांगण में स्थित कंपनी के लिए हालात वैसे ही थे जैसे आम तौर पर होते हैं। फोन लगातार घनघना रहे थे और स्टाफ ई-मेल पर पूछे गये सवालों के जवाब देने में व्यस्त था। 28 वर्षीय शेख सामी उल्लाह, जिनके पास बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री है, विश्वास और गर्व भरे स्वर में वेंचर की कश्मीर के अप्रत्याशित बाज़ार में भी सफलता के बारे में बता रहे थे। सामी उल्लाह को तब पता नहीं था कि अगले दिन ही कश्मीर हमेशा के लिए बदल जायेगा।
केवल एक साल पहले ही स्थानीय व्यावसायियों के लिए ऑनलाइन कुरियर सेवा फास्टबीटल शुरू की गई थी पर सफलता मिलने में इसे ज़रा भी देर नहीं लगी। सामी उल्लाह कहते हैं, “किसी भी अन्य स्टार्ट अप की तरह हमारी शुरुआत साधारण रही पर वेब पर दर्जन भर मर्चेंडाईज से शुरू करने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म साल भर से कम समय में 200 स्थानीय उत्पादों के बाज़ार के रूप में विकसित हो गया। ग्राहकों के डैशबोर्ड पर 15,000 ग्राहक दिखने लगे। टर्नओवर दो करोड़ को छूने लगा।“
ग्राहक आधार बढ़ने के साथ फास्टबीटल ने श्रीनगर के उपायुक्त शाहिद चौधरी से 24 जुलाई 2019 को अपना मोबाइल एप्लीकेशन विमोचित करवाया। स्टार्ट अप ने स्थानीय मशहूर परिधान ब्रांड तुल पलव और हैंगर्स से गठजोड़ किया और फ्लिपकार्ट तथा अमेज़न जैसी बड़ी कंपनियों तक से भविष्य की संयुक्त योजनाओं के लिए संपर्क किया। जल्द ही इसने बारामूला, अनंतनाग और सोपोर में भी कार्यालय खोले। सामी उल्लाह, जिनके पिता सरकारी कर्मचारी हैं, कहते हैं, “यह अविश्वसनीय ही लगेगा कि आठ कर्मचारियों और छह डिलीवरी ब्वाय ने मिलकर यह कमाल कर दिखाया। भविष्य पूरी तरह उज्ज्वल और सुरक्षित लगने लगा था।“
सामी उल्लाह ने कंपनी लांच करने से पहले एक साल बाज़ार का अनुसंधान किया। उन्होंने बताया, “हम विफल होने के लिए स्टार्ट अप नहीं शुरू करना चाहते थे। कई अन्य हमसे जुड़े और हमने सपने को साकार करने के लिए अपनी जेब से भुगतान किया। इंटरनेट हमारी जीवनरेखा थी।“
आज, केंद्र के जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 को बदलने और संचारबंदी के कारण ज़िंदगी के थम जाने के बाद, फास्टबीटल का नवांबाज़ार में कार्यालय वीरान पड़ा है। मुख्य सड़क जहां कंपनी स्थित है, सारा दिन एक मोबाइल बंकर खड़ा रहता है। सड़क किनारे कंटीली तारें लगाई गई हैं। नागरिकों की हलचल पर पाबंदियों के बाद, स्टार्ट अप के पास कोई चारा न था कि अपनी सेवाएं स्थगित कर दें। उन्होंने 200 स्थानीय उत्पादकों से खरीदारी बंद कर दी है जिनमें घरों से काम करने वाली वृद्ध महिला बुनकर शामिल हैं।
सामी उल्लाह कहते हैं, “इंटरनेट स्टार्ट अप के लिए ऑक्सीजन होती है। केंद्र ने 5 अगस्त को इंटरनेट बंद कर दी। हमारा विकास वर्चुअल वर्ल्ड में हो रहा था। अब यह बंद हो गया। सभी कर्मचारी और उत्पादक बेरोज़गार हो गये।“ वह अब दुबई में नौकरी तलाश रहे हैं।
वह कहते हैं, “ग्राहक खोने, डिलीवर न किये गये ऑर्डर और इंटरनेट की अनुपलब्धता के कारण जमा सामान से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुझे कैसे भी काम ढूंढना होगा।“
इंटरनेट बंदी के दूसरे दिन से ही अभूतपूर्व सुरक्षा पाबंदियों के कारण फास्टबीटल का कार्यालय उनके अपने स्टाफ के लिए पहुंच से दूर हो गया और ऐसा कई सप्ताह तक रहा। सामी उल्लाह के अनुसार, “सड़कों पर कंटीले तार थे। हमारे कार्यालय तक आने वाली सड़कों पर कई सप्ताह तक किसी वाहन को आने-जाने नहीं दिया जा रहा था।“
सामी उल्लाह के किस्से जैसे हजारों किस्से हैं कश्मीर में इंटरनेट पर निर्भर कारोबारी इकाइयों के। सुनहरे भविष्य के प्रतीक स्टार्ट अप का भविष्य 120 दिनों से इंटरनेट के अभाव में अंधियारा दिखने लगा है।
‘कोई महिला सपना देखने की हिम्मत नहीं करेगी‘
कश्मीरी युवाओं की उद्यमशीलता से उत्साहित पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी-भारतीय जनता पार्टी सरकार ने जम्मू कश्मीर स्टार्ट अप नीति बनाई थी, जिसे 2018 में ही सार्वजनिक किया गया। इसका उद्देश्य “अगले दस सालों में जम्मू एवं कश्मीर में कम से कम 500 नये स्टार्ट अप विकसित करने को सुगम बनाना“ था।
स्टार्ट अप नीति पर अमल के लिए नोडल एजेंसी जेएंडके एंटरप्रिनर डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक तुफैल मट्टू कहते हैं, “नीति का उद्देश्य नये और चल रहे स्टार्टअप को शुरुआती निवेश जुटाने में मदद करना था। इसके अलावा इनोवेशन लैब स्थापित करना था जहां छात्र और नागरिक नवीन कौशल व मानवीय समस्याओं के तकीनीकी हल मुहैया कराने के आइडिया विकसित करना सीख सकें।“
नीति कागज पर बढ़िया थी पर 5 अगस्त के बाद सच्चाई अलग। ओमैरा और बिनिश, 29, एक स्थिर बाज़ार देने और चौबीस घंटे इंटरनेट मुहैया कराने में सरकार की विफलता को रेखांकित करती हैं, जिसके कारण क्षेत्र के सफलतम और स्वनिर्मित वेंचर तबाह हो रहे हैं।
श्रीनगर के कश्मीर विश्वविद्यालय में कॉलेज की साथी रहीं इन दोनों– एक के पास सोशियोलॉजी में मास्टर्स है और दूसरी के पास बैचलर ऑफ एज्युकेशन की डिग्री– ने 2015 में एक सपना देखने की हिम्मत की। उन्होंने ट्री हाऊस स्कूल में पढ़ाना बंद कर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कसीदाकारी उत्पादों की कढ़ाई-बुनाई, डिजाइन, मॉडल और तस्वीरें डालना शुरू किया।
इंस्टाग्राम पर 44 हज़ार से ज़्यादा फालोअरों के साथ ओमैरा और बिनिश के स्टार्ट अप क्राफ्ट वर्ल्ड कश्मीर ने अपना अलग बाज़ार बनाया जो न सिर्फ जम्मू कश्मीर में था बल्कि दिल्ली, पंजाब और मुंबई तक फैला था। श्रीनगर में तेंगोपोरा निवासी ओमैरा कहती हैं, “बिना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के हमारा सफल वेंचर संभव नहीं था। बाज़ार विकसित हो रहा था, प्रतिदिन 15 ऑनलाइन ऑर्डर मिल रहे थे। हम बहुत व्यस्त थे। हमने बढ़ती मांग पूरी करने के लिए 14 और लड़कियों, ज्यादातर गांवों से, को प्रशिक्षित किया।“
केवल महिलाओं का यह वेंचर ओमैरा और बिनिश के कसीदाकारी उत्पादों में नवीनताएं पैदा करने पर निर्भर था। दोनों ने बेबी सेट, टेबल कवर और आभूषणों में काफी प्रयोग किये। उनके पुष्प आभूषण स्थानीय बाजार में हिट हो गये। सफलता से उत्साहित दोनों सहेलियों ने वकील, शिक्षिकाओं, सरकारी कर्मचारियों जैसी कामकाजी महिलाओं को जोड़ा और अतिरिक्त समय में कुछ अतिरिक्त कमाई करने में मदद की।
ओमैरा, जिन्हें महिला कर्मचारियों, अधिकांश अपने घर की इकलौती कमाऊ सदस्य थीं, की संख्या में कटौती करनी पड़ी, बताती हैं, “हमारे उत्पादों को लेकर दुल्हन बनने जा रही लड़कियां दीवानी थीं। ताज़ा फूलों के आभूषण पाकिस्तानी शैली के हैं। हमने इसे यहां के अनुरूप बनाया। बहुत जल्द यह यहां चल निकले। यदि इंटरनेट कुछ और सप्ताह बंद रहा तो फिर घाटी की कोई महिला सपना देखने की हिम्मत नहीं करेगी।“
 
‘पलायन को मजबूर‘
इंटरनेट की अनुपलब्धता ने पांच दोस्तों को बढ़िया चलता अपना स्टार्ट अप बंद कर अपने करियर फिर से शुरू करने के लिए घाटी छोड़ने पर मजबूर किया। लालचौक डॉट कॉम स्टार्टअप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शेख मोहम्मद उस्मान और उनके चार दोस्तों– हसीब अशई, जुबैर जहूर, मुबाशीर बशीर और असीम मेहराज– का कहना है कि इंटरनेट ब्लॉकेड के बाद से उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा। लालचौक डॉट कॉम किताबों से संबंधित घाटी का इकलौता ऑनलाइन प्लेटफॉर्म था जो इतिहास बन जाने वाला है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शुरू करने का विचार कश्मीर विश्वविद्यालय परिसर, जहां वह साथ पढ़ते थे, बागीचों, कैफे ओर घरों में अंतहीन बैठकों के बाद जन्मा था। समूह में से अकेले घाटी में रह गये अशई बताते हैं, “विचार ऐसा बिजनेस मॉडल तैयार करना था जिससे हम कश्मीर में सम्मान के साथ रह सकें। हमने कल्पना नहीं की थी कि तीन साल की सफलता के बाद हमें घाटी से पलायन करना होगा।“ उनके अनुसार, “चारों संचारबंदी के बाद घाटी से चले गये हैं। तीन महीने तक हाथ में पैसा न होने के कारण उन पर उनके अभिभावकों का दबाव था कि नयी नौकरी और सुरक्षित करियर ढूंढें।“
दोस्तों के लिए अलग होने का फैसला आसान न था, जिन्होंने मिलकर बैचलर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन डिग्री हासिल की थी और फिर मास्टर्स इन कंप्यूटर एप्लीकेशन भी। उन्होंने मिलकर लालचौक डॉट कॉम स्थापित करने का निर्णय किया था। प्लेटफॉर्म मई 2017 में लांच किया गया।
अशई बताते हैं, “कश्मीर में लाल चौक क्षेत्र मार्केटिंग के लिए केंद्रीय स्थान है। हमें उम्मीद थी कि नाम से ही हमें आसानी से ग्राहक मिलेंगे और वैसा हुआ भी। बहुउत्पादों वाला ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मई 2017 में शुरू किया गया था पर जनवरी 2018 आते-आते हमारे लिए साफ हो गया कि किताबें ही भविष्य हैं। हमारा फोकस कश्मीर पर दुर्लभ किताबों पर था। और फिर हमने फ्रेम, ग्रीटिंग कार्ड तथा पोस्टर बनाना शुरू करने के रूप में विस्तार किया।“
शुरुआती चार महीनों में केवल 1500 ग्राहकों ने उनका एप्लीकेशन डाउनलोड किया था पर धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर दस हजार हो गयी। हर महीने 400 ऑनलाइन ऑर्डर के साथ, बिक्री प्रति माह साढ़े चार से पांच लाख के बीच हो गई लेकिन, 5 अगस्त को किये गये सुरक्षा उपायों ने सबकुछ ठप कर दिया। अशई कहते हैं, “अब हमारा एक-दूसरे से संपर्क भी नहीं रहा। मैं फिर से संपर्क बनाने के लिए इंटरनेट के शुरू होने का इंतज़ार कर रहा हूं। मैं बहुत चिंतित हूं।“
‘मानसिक बंदी’ 
न केवल स्टार्ट-अप बल्कि कश्मीर का कला परिदृश्य भी समान रूप से प्रभावित हुआ है।
मुजतबा रिज़वी का कश्मीर को वैश्विक कला नक्शे पर लाने का सपना तेज़ी से धुंधलाता जा रहा है। रिज़वी ने लंदन विश्वविद्यालय से गोल्डस्मिथ से मैनेजमेंट ऑफ इनोवेशन का अध्ययन किया है। उनकी उम्मीदें ऑनलाइन पहल कश्मीर आर्ट क्वेस्ट पर टिकी थीं, जिसने  435 स्थानीय कलाकारों को साथ लाया था सोशल मीडिया के ज़रिये दुनिया भर के संभावित खरीदारों को समकालीन कला दिखाने के लिये।
रिज़वी बताते हैं कि कश्मीर आर्ट क्वेस्ट 2010 से हर साल वार्षिक प्रदर्शनी करता आया है, 2019 में ही नहीं कर पाया। इस पहल की बड़ी उपलब्धि कोची में लोकप्रिय कोची-मुज़िरिस-बाइनेल में हिस्सा लेना था।
वह कहते हैं, “कला क्षेत्र में अपनी जगह बनाना मुश्किल होता है, पर हमने किसी तरह यह कर लिया था। इंटरनेट ने युवा कश्मीरी कलाकारों को अपना कार्य दिखाने का एक दुर्लभ अवसर दिया था। हमने कलाकारों के लिये आर्थिक रास्ते खोले। लोग स्थानीय कलाकृतियां खरीदने लगे।”
इंटरनेट ने उन्हें संभावित खरीदारों को पहचानने में मदद की और बिक्री तेज होने लगी थी। वह कहते हैं, “बिक्री से भी ज्यादा कला को कद्र मिलने का संतोष था। कलाकार निखरने लगे थे। और 5 अगस्त हुआ। इसने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को खत्म कर दिया। अल्लाह जाने अब कब तक कश्मीरी कलाकारों को फिर विस्मृति में रहना होगा।“
रिज़वी जो कश्मीर आर्ट क्वेस्ट के संस्थापक और प्रबंध निदेशक हैं, 5 अगस्त के दिन को याद करते हुए बताते हैं कि उस दिन और उसके कई सप्ताह बाद तक वह अपने स्टूडियो की दीवारों को घूरते रहे और उनकी पेंटिंग की इच्छा ही समाप्त हो गई। वह कहते हैं, “संचारबंदी ने एक तरह से मानसिक बंदी भी कर दी। हालात पर मेरी प्रतिक्रिया ज़ोर से हंसना भर थी। हम सभी कई महीने तक साथ फंस गये। फिर मायूसी बढ़ने लगी और मैंने नौकरी के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। कश्मीर में कलाकर्म का सपना देखना मुश्किल बन गया है।“
कश्मीर आर्ट क्वेस्ट ने इस साल श्रीनगर बाइनेल के आयोजन का फैसला किया था। रिज़वी दुनिया भर के सौ कलाकारों के संपर्क में थे। उन्होंने बताया, “सबकुछ ढह गया। कोई संपर्क नहीं है। 2010 से जो हम नेटवर्क बनाया था, खत्म हो रहा है।“
चिंताजनक रुझान, पर रोक की कोशिश
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले चार महीनों की अनिश्चितता में कश्मीर में इंटरनेट पर निर्भर स्टार्ट अप में 80 फीसदी नौकरियां गई हैं। यह ऐसे समय पर हुआ है जब जम्मू एवं कश्मीर की बेरोजगारी दर ऊंची (प्रति 1000 युवाओं पर 35) है।
सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन एकॉनॉमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट ‘भारत में बेरोजगारी‘ के अनुसार जम्मू एवं कश्मीर का प्रदर्शन अपनी युवा आबादी, जो प्रदेश की कुल आबादी का 60 फीसदी है, के लिए नौकरियां पैदा करने के मामले में कमज़ोर रहा है। 2019 के पहले चार महीनों में तत्कालीन संयुक्त प्रदेश में बेरोज़गारी दर 15.89  थी जिससे नौकरियां पैदा करने के मामले में इस प्रदेश का प्रदर्शन काफी बुरा था। रिपोर्ट के अनुसार घाटी में रोज़गार चाहने वाले स्नातकों में इस साल बेरोजगारी दर 25.2 थी।
कश्मीर के रोजगार निदेशालय के अनुसार इस साल के पहले छह महीनों में 13000 स्नातकों और स्नातकोत्तर युवाओं समेत 38323 युवाओं ने सरकारी रोजगार कार्यालय में जॉब काउंसेलिंग के लिए खुद को पंजीकृत करवाया। अनंतनाग जिले से सर्वाधिक 8712 युवाओं ने पंजीकरण करवाया जबकि श्रीनगर 4572 के साथ दूसरे नंबर पर था।
जेएंडके एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने इस चिंताजनक रुझान को रोकने और हस्तक्षेप का फैसला किया है। मट्टू कहते हैं कि विभाग उन प्रशिक्षित आकांक्षियों तक पहुंचने की कोशिश कररहा है जो इस साल अपना उद्यम शुरू करने के लिए कर्ज पाने के लिए औपचारिकताएं पूरी करने में विफल रहे।
2004 से इंस्टीट्यूट ने 30000 युवाओं को प्रशिक्षित किया है और 15000 इकाइयां स्थापित करने में मदद की है जिनमें से 85 फीसदी इंटरनेट पर निर्भर हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार हर यूनिट औसत तीन से पांच लोगों को रोजगार देती है अर्थात घाटी में लगभग 75000 बेरोजगार युवाओं को काम मिला है।
लगभग 25 फीसदी उद्यम कृषि, मुर्गीपालन और भेड़ों के क्षेत्र में है। जेएंडके एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के वीमन एंटरप्रिनरशि प्रोग्राम के तहत न्यूनतम मैट्रिकुलेशन की योग्यता वाली 18 से 45 वर्ष की महिलाओं को लक्षित किया था। उन्हें 6 फीसदी की ब्याज दर पर तीन लाख रुपये के कर्ज की सुविधा दी गई थी। इसे बेहद अच्छा जवाब मिला था।
मट्टू कहते हैं, “स्टार्ट-अप के लिए 100 आवेदनों में से 50 स्टार्टअप इंडिया योजना के तहत मंजूर किये जाते हैं। जेएंडके एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट इनोवेशन पर फोकस करता है जिनमें हस्तकला, बागवानी और बुनाई जैसे पारंपारिक क्षेत्र शामिल हैं। इंस्टीट्यूट ने लोगों की मानसिकता बदलने के लिए काफी मेहनत की है। लोग अब सरकार पर निर्भर नहीं हैं, इन पर फोकस जारी रहेगा।“
चार प्रमुख योजनाओं – सीड कैपिटल फंड स्कीम, यूथ स्टार्ट-अप लोन स्कीम, नेशनल मायनॉरिटी डेवलपमेंट फायनांस कार्पोरेशन और वीमन डेवलपमेंट कार्पोरेशन के ज़रिये वीमन एंटरप्रिनरशिप का भविष्य इंटरनेट की उपलब्धता पर निर्भर है। यहां तक कि 198 करोड़ रुपये के निवेश से स्थापित 1500 इकाइयों और एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के ज़रिये पंजीकृत इकाइयों को 60-70 करोड़ का कर्ज देकर शुरू किये स्टार्ट अप का अस्तित्व इंटरनेट की उपलब्धता पर निर्भर है।
आर्थिकी एवं सांख्यिकी निदेशालय के अनुसार जेएंडके एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने योजनाओं केअमल में सफलता की दर 87 फीसदी दर्शायी थी। आठवीं कक्षा पास युवाओं के लिये सॉफ्ट लोन मंजूर करने का उद्देश्य पत्थरबाज़ी व हिंसा से निकालकर मुख्यधारा में लाना था।
जेएंडके एंटरप्रिनरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के समक्ष वास्तविक चुनौती थी स्थानीय प्रतिभाओं को वैश्विक नक्शे पर लाना और इंटरनेट इस लक्ष्य को पाना संभव बना रहा था। मट्टू कहते हैं, “हम नहीं चाहते कि स्थानीय उद्यमी कर्ज़ पर निर्भर रहें। हम निवेशकों, वित्तीय गठजोड़ों और वेंचर कैपिटलिस्ट्स पर फोकस कर रहे हैं।”
लेकिन इंटरनेट बंद होने से सैकड़ों स्थानीय युवाओं और जेएंडके एंटरप्रिनपशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की आकांक्षाएं अधर में हैं। सामी उल्लाह कहते हैं, “सरकार इंटरनेट के साथ सारी उम्मीदों को खत्म कर रही है, जिससे युवाओं में हताशा बढ़ ही रही है। उन्हें केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहने के लिये मजबूर किया जा रहा है जो दिन-ब-दिन कम ही होती जा रही हैं।
कभी फलते-फूलते व्यवसाय थे, जो प्रधाननंत्री की प्रिय परियोजना स्टार्ट अप इंडिया का चेहरा बन सकते थे, बंद हो रहे हैं। नवांबाज़ार में फास्टबीटल का कार्यालय धूल फांक रहा है। यहां आने वालों की संख्या नगण्य है। चूंकि भविष्य को लेकर कुछ निश्चित नहीं है इसलिये मालिकों ने कोई सूचना नहीं लगाई कि काम कब से दोबारा शुरू होगा।


पीरज़ादा आशिक़ की यह रिपोर्ट ‘द हिन्दू’ में 7 दिसंबर 2019 को प्रकाशित हुई थी। उसकी अनुमति से इसका अनुवाद कश्मीर खबर ने किया है।

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