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चुनाव परिणाम की समीक्षा में मंदी की भूमिका का ज़िक्र अतिरेक क्यों है?

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हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए चुनाव ने अचानक ही विश्लेषण की भाषा बदल दी है। जो लोग हरियाणा में 70 पार का अनुमान लगा रहे थे या इस डर से चुनाव विश्लेषण की भाषा का सहम कर प्रयोग कर रहे थे, वे सभी नतीजों के आते ही बदल गये।

यही स्थिति महाराष्ट्र के बारे में रही। मंदी और सरकारी संस्थानों की अनदेखी के तथ्यों को भाजपा की हार और जनता के विपक्ष बन जाने की बात को ऐसे दुहराया गया मानो यही अंतिम सच् हो। भाजपा के शीर्ष नेताओं पर हालांकि इन बातों का कोई असर नहीं पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी लगातार अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व बन जाने की जोड़तोड़ में लगे रहे। चुनाव के नतीजों का असर मोदी तो क्या अमित शाह पर भी नहीं पड़ा। सरकार बनाने का खेल सटोरियों को मात देने वाली रणनीति के तहत जारी है।

मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा राजनीति की जो पारी खेल रही है उसमें विपक्ष की भूमिका दर्शक की बनी हुई है। वह एक भी राजनीतिक आंदोलन बना पाने में फिलहाल अक्षम है। जो भी वोट उसके हिस्से आ रहा है वह जनता की हताशा और उस सहानुभूति का परिणाम है जिसका मोदी-भाजपा की तानाशाही और मंदी से कुछ खास लेना देना नहीं है। हमारे आसपास के ज्यादातर विश्लेषक अनावश्यक ही इस पर जोर लगाकर खींचतान कर रहे हैं।

जो विश्लेषक तानाशाही और मंदी को चुनावी राजनीति से जोड़ते हुए परिणाम को देख रहे हैं उन्हें भारत में मंदी और संसदीय राजनीति के परिणामों के ऐतिहासिक संबंधों पर एक नजर जरूर डाल लेनी चाहिए।

1960-65 के बीच भारत के औद्योगिक और कृषि संकट ने एक तरफ नक्सलबाड़ी की राजनीति को जन्म दिया जो असंसदीय राजनीति पर जोर देते हुए आगे बढ़ा, तो दूसरी तरफ इसने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को पुनर्निर्मित किया और जमींदारों में एक नई पैठ बनाते हुए इंदिरा और देश को एक दूसरे का पर्याय बना दिया। 1966 से लेकर 1984 तक चले एकछत्र राज ने 1970 की लंबी अवधि वाली मंदी को भी देखा और उस आपात्काल को भी झेला जिसने भारतीय राजनीति में आई थोड़ी सी नागरिकता का पक्ष भी जूतों की नोंक पर उछाल दिया गया था।

1980 के दशक में नवधनाढ्यों, व्यापारियों और अस्मितावादियों की राजनीति राज्यों में नये सिरे से संगठित हुई। 1980 में खेती का संकट दलित और पिछड़े समुदाय को संगठित करने की ओर ले गया। यह समुदाय भी क्षेत्रीय पार्टियों की गैर-आर्थिक मांगों के आधार पर आगे आया और राजनीतिक मसलों पर देश के स्तर पर संगठित नहीं हो सका, जबकि इसकी संभावना राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर अधिक थी। इसी दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन ने एक नये दौर में कदम रखा और सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक विकास के विकल्प को आगे लेकर आया।

1990 के दशक की मंदी के दौर में भारतीय राजनीति की बागडोर को सीधे विश्वबैंक-मुद्राकोष ने पकड़ा और राजनीतिक नेतृत्व अमेरिका ने। पार्टियों की भूमिका सरकार बनाने-गिराने, सांसदों की खरीद-फरोख्त और दलबदल आदि तक सीमित रह गई। इस बागडोर ने मनमोहन सिंह को मंदी और गहरे सामाजिक संकट के बावजूद उस समय तक प्रधानमंत्री बनाये रखा जब तक कि एक अन्य पार्टी पूरी भारतीय राजनीति और समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेने की स्थिति में नहीं आ गयी।

मंदी भारतीय राजनीति में एक ऐसी तानाशाही को लेकर आती है जो अगली मंदी के आने तक बनी रहती है। बदलाव सामाजिक आंदोलन के उस आवरण में आता है जो सत्ता के बनते ही छिलके की तरह उतरने लगता है और वह आंदोलन बेमानी दिखने लगता है। मोदी के साथ संकट यही है कि वह अमेरिकी सहयोग से सत्ता को संगठित कर सकने की स्थिति में नहीं आ पा रहे हैं और वह जिन बदलावों का वादा करते हुए आए, उसके छिलके सूखकर गिर जाने को तैयार नहीं हो पा रहे हैं। हिंदुत्व का एजेंडा जिंदा है, और उससे भी अधिक तबाह लोगों की नौकरी की तलाश जारी है।

कांग्रेस विकल्प बनने को अब भी तैयार नहीं दिख रही है। वह मंदी और सामाजिक संकट से बन रही स्थितियों को राजनीतिक आंदोलन बनाना तो दूर, भाजपा नेतृत्व की कारस्तानियों को भी सामने लाने से कतरा रही है। क्या यह सिर्फ इसलिए कि वह मोदी सरकार से डर रही है? मुझे लगता है कि यह समझदारी हमें कहीं नहीं ले जाएगी।

दरअसल, भाजपा के नेतृत्व में जो समूह सत्ता के गलियारों में आया है और केंद्र से लेकर गांवों तक फैला हुआ है, वह एक नया राजनीतिक-आर्थिक समूह है और उससे हम चाहे जितनी नफरत करें वह अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। उसके लिए गाय नैतिकता नहीं राजनीति का प्रश्न है जिसके सहारे वह अपने को मजबूत करना चाहता है। उसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध वोट हासिल करने का माध्यम हैं। उसके लिए हिंदू होने का अर्थ डरा धमका कर श्रम से पैदा हुए अतिरिक्त मूल्य को लूट या हड़प लेना है। उसके लिए मंदिर खोलने और मुस्लिम समुदाय से कसाईबाड़ा छीनकर बड़े पैमाने पर कसाईबाड़ा चलाने के बीच कोई फर्क नहीं है। कांग्रेस इस समुदाय के स्थिर होने जाने का इंतजार कर रही है और मोदी इस समुदाय की अस्थिरता से लगातार बेचैन हैं। मोदी की चुप्पी इस समुदाय की बेचैनी का ही इज़हार नहीं है, यह उस समुदाय की बचैनी का भी इज़हार है जो मोदी से थोड़ी और अधिक तानाशाही की मांग कर रहा है। यह गठजोड़ और राजनीतिक खेल कब तक चलेगा, यह बहुत कुछ इस समुदाय की उस अतृप्त आकांक्षा पर निर्भर है जिसे पूरा करना फिलहाल मोदी की राजनीति के हिस्से में है।

इसीलिए दो राज्यों में हुए चुनाव परिणाम में मंदी की भूमिका का विश्लेषण मुझे अतिरेक जैसा लगता है। चुनाव में जनता की भूमिका का विश्लेषण जरूर होना चाहिए लेकिन यदि वह मनमाने तरीके से हो, तब उससे कुछ भी हासिल नहीं होता। वोट में बदलाव की चाह दिखती है लेकिन वह बदलाव लोकतंत्र के मूल्यों के पक्ष में हो, यह ज़रूरी नहीं है। भारत की चुनाव प्रणाली में सरकार निर्माण के केंद्र में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष अत्यंत कमजोर बना रहा है। बहुमतवाद का शुरूआती अर्थ हिंदू बहुमत ही रहा जो बाद में एक दूसरे के पर्याय बनते गये, और अब ये एक हो चुके हैं। उदारवाद ने तो राजनीति का अर्थ ही सरकार निर्माण बना दिया− यह चाहे जैसे भी, जिस तरीके से हो। अर्थनीति, समाज और संस्कृति का अर्थ इसी मंजिल को हासिल करने की सीढ़ियां हैं, सिर्फ सीढ़ियां, इससे अधिक कुछ नहीं।

विकल्प का अर्थ है सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आंदोलन। भारतीय राजनीति में ये आंदोलन अक्सर ही चुनाव के गलियारे से बाहर खेतों, जंगलों, खदानों, कारखानों और शहर के गरीब, मध्यवर्ग के बीच से पैदा हुए। उम्मीद है कि चुनाव के विश्लेषण वोट और सरकार निर्माण के पैटर्न को समझने से बाहर जाकर उन नई निर्मितियों को भी देखेंगे जहां बदलाव की बयार धीमी ही सही लेकिन चल रही है। भारतीय राजनीति में द्वंद सिर्फ सत्ता के गलियारे में नहीं, इसके बाहर भी है।

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