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‘अश्वेत दम’ पर फ्राँस विश्वविजेता! भारत में एक दलित दूल्हे का पहली बार बग्घी में बैठना ख़बर नहीं!

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पंकज श्रीवास्तव


फ्राँस ने फुटबॉल विश्वकप का ख़िताब अपने नाम कर लिया। जश्न का माहौल है, फ्राँस में ही नहीं दुनिया भर में। पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर किरन बेदी भी झूमते हुए ट्विटर पर याद दिला रही हैं कि पुडुचेरी कभी ‘फ्रेंच टेरेेटरी’ रह चुका है। ( उद्भट राष्ट्रवादियों के शब्दकोश में उपनिवेश अब ‘टेरेटरी’ हो चुका है।)

कल भारत में भी एक बड़ी घटना हुई जश्न की !

ख़बर यूपी में कासगंज के पास के एक गाँव से है। यहाँ पहली बार एक दलित दूल्हा बग्घी पर सवार होकर अपनी ससुराल पहुँचा। पहली बार! मतलब समझ रहे हैं न!

बात आगे करें, इसके पहले पाँच दिन पीछे चलते हैं।

“भारत ने फ्राँस को पछाड़कर दुनिया की छठीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का ख़िताब हासिल कर लिया है”- पाँच दिन पहले ज़्यादातर अख़बारों के पहले पन्ने इस सुर्ख़ी से रँगे पड़े थे। इस उपलब्धि के तिरपाल से उस ख़बर को ढँकने की बेशर्म कोशिश की गई जिसमें भुखमरी के सूचकाँक में भारत को सौवें नंबर पर रखा गया था। 119 देशों की सूची में 100वाँ नंबर!

यह भी छिपाने की कोशिश की गई कि भारत में प्रति व्यक्ति आय महज़ 17 हज़ार रुपये सालाना है जबकि फ्राँस में प्रति व्यक्ति आय क़रीब 25 लाख रुपये!

पहले पन्ने का खेल ऐसे ही होता है, ख़ासतौर पर जब मीडिया सरकार के ‘प्रोजेक्ट अच्छे दिन’ के साथ नत्थी हो गया हो।

बताने से ज़्यादा छिपाने का यह खेल मीडिया रोज़ खेलता है। लेकिन आज का ‘खेल’ बताता है कि क्यों फ्राँस से तुलना एक बेहूदा मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं है।

स्वाभाविक है कि आज पहले पन्ने पर फुटबॉल विश्वकप प्रतियोगिता में फ्राँस की जीत की ख़बर है। ऊर्जा से लबरेज़ फ्राँसीसी खिलाड़ियों की तस्वीरों से अख़बार पटे पड़े हैं। पर इन तस्वीरों को ध्यान से देखने पर ‘युरोपीय माने गोरा’ की भारतीय अवधारणा दरक सकती है। यह एक ‘मल्टीएथनिक टीम’ है जिसमें सिर्फ़ गोरी चमड़ी नहीं, अफ्रीकी मूल का ‘अश्वेत सौंदर्य’ भी दमक रहा है। ऐसा लगता है कि हर दूसरा खिलाड़ी अश्वेत है। मैदान में इन खिलाड़ियों के कमाल के पीछे साथ बहाया गया वह पसीना है जिसने मिलकर एक ख़ास गंध पैदा की है, जिसे दुनिया ‘फ्रेंच प्राइड’ कहकर संबोधित कर रही है।

 

हाँ, ये सब अब सिर्फ़ फ्राँसीसी हैं। जिन अश्वेतों के पुरखों को सैकड़ों साल तक ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़े रखा गया वे आज फ्राँस के गौरव के आधार हैं। शोषण की दर्दनाक कहानियाँ लिखने वाले श्वेत आतताइयों के वंशजों के साथ। जिनके निगाह में भविष्य होता है, वे स्मृति के साथ-साथ विस्मृति के महत्व को भी समझते हैं।

यह आसान नहीं था। इसके लिए लंबी लड़ाई हुई। 1789 की फ्राँसीसी क्रांति ने तो दुनिया को प्रभावित किया था, फिर भी सतह पर इसे उतार पाना आसान नहीं था। कई बार क्रांतियाँ झटके में संभव हो जाती हैं, लेकिन मानस बदलने में सदियों लग जाते हैं। बराबरी का क़ानून बन जाए तो भी, दिल से उसे स्वीकार करना आसान नहीं होता! ख़ासतौर पर अगर दिमाग़ श्रेष्ठताबोध से बीमार हो।

भारत में भी कहाँ मान लिया गया! संघर्ष यहाँ भी जारी है मगर यह संघर्ष जिस पायदान पर है, वह बताता है कि क्यों फ्राँस को पीछे छोड़ने का दावा सिर्फ़ हास्यास्पद नहीं, एक विडंबनापूर्ण मज़ाक है।

वरना फ्राँस के विश्वविजेता बनने की ख़बर के साथ-साथ संजय जाटव की शादी की ख़बर भी पहले पन्ने पर होती।

हिंदी के चार बड़े अख़बारों (दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान और अमर उजाला के दिल्ली संस्करण) के पहले पन्ने पर आज संजय जाटव की बारात निकलने की ख़बर कहीं नहीं है, और यह संयोग नहीं है। मीडिया भारत में पुनर्जागरण की किसी भी कोशिश का वाहक नहीं, उसकी राह का रोड़ा है।ख़ासतौर पर कॉरपोरेट मीडिया।

संजय जाटव की 15 जुलाई को शादी थी। मास्को के स्टेडियम से उठ रही फ्रेंच गंध से मदहोश फ्राँस के राष्ट्रपति जब दर्शक दीर्घा में उछल रहे थे, ठीक उसी वक़्त कासगंज से करीब 15 किलोमीटर दूर बसई गाँव में दूल्हा संजय, बग्घी में बैठकर नाचते-गाते लोगों के हुजूम के साथ दूल्हन शीतल के घर पहुँच रहा था। गाँव में यह बिलकुल नई गंध का आगमन था।

तो..? भारत में न जाने कितनी दूल्हे रोज़ नागिन डांस करते-कराते बारातियों के साथ बग्घी या घोड़ी पर बैठ दुल्हन के दरवाज़े पहुँचते हैं…इसमें ख़ास बात क्या है ? – आप पूछ सकते हैं।

पर ख़ास बात है हुज़ूर। ज़रा इस तस्वीर को ग़ौर से देखिए। बग्धी पर बैठे इतराते दूल्हा संजय जाटव को ही मत देखिए। उसके साथ चल रहे पुलिस वालों को भी देखिए।

 

 

संजय कोई वीआईपी नहीं है। वह एक आम दलित नौजवान है और वह अपनी बारात बग्घी पर बैठकर निकाल सके, यह सहजता से संभव नहीं था। इसके लिए हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस के करीब ढाई सौ जवान और अफ़सर गाँव में किसी अनहोनी को रोकने के मौजूद थे।

ग़ौर कीजिए, ऐसा इस गाँव में पहली बार हुआ।

इक्कीसवीं सदी के अठारहवें साल में भी इस गाँव के ठाकुरों को बरदाश्त नहीं कि कोई दलित दूल्हा बग्घी या घोड़ी पर बैठकर उनके सामने से गुज़रे। उन्होंने ऐसा न होने देने के लिए पूरी ताक़त लगा दी थी। हद तो ये कि ज़िला प्रशासन ने भी उनका साथ दिया। लेकिन संजय जाटव लगातार जूझता रहा और छह महीने बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश और ढाई सौ पुलिस वालों की सुरक्षा में अपनी मँगेतर से किया वादा पूरा करने में क़ामयाब हुआ। वादा था कि उसके घर बग्घी में बैठकर आएगा।

इक्कीसवीं सदी के अठारहवें साल में  शान से ‘फ्रेँच’ कहलाने वाला कोई अश्वेत इस क़िस्से पर हँस सकता है क्योंकि वहाँ क़ानून लागू करने वाली संस्थाएँ किसी ठाकुर साहब से अनुनय की मुद्रा में बात नहीं कर सकतीं जैसे यहाँ महीनों पंचायतें हुईं। उन्हें मनाने की कोशिश की गई।

इसलिए संजय जाटव की शादी की ख़बर पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी क्योंकि यह भारत को वाक़ई राष्ट्र बनाने की ओर बढ़ते क़दम की आहट है। यह एक दलित के संकल्प की जद्दोजहद है जिसने संविधान के संरक्षण में पहली बार मनुष्य होने की गरिमा महसूस की है।

हाँ, यह महज़ आहट है और यह क़दम तोड़ा भी जा सकता है। आज इंडियन एक्सप्रेस के सात नंबर पेज पर शीतल के भाई बिट्टू जाटव का बयान है- ‘अभी तो कुछ नहीं होगा, लेकिन हमें डर है कि बाद में ठाकुर लोग हमारा बहिष्कार न कर दें।’

बिट्टू को याद है कि कैसे ट्यूबवेल के मालिक एक ठाकुर साहब ने उसके खेतों को पानी देने से इंकार कर दिया था। एक्सप्रेस की ख़बर में ठाकुरों की ओर से एक बेनामी बयान भी है कि ‘यह उनकी प्रतिष्ठा का मसला है।’

यानी बिट्टू का डर बेवजह नहीं है। अनहोनी की चीलें गाँव के आकाश पर मँडरा रही हैं।

‘अहा ग्राम्य जीवन’ उसी कवि की कल्पना होगी जिसके घर में ट्यूबवेल होगा और बारात में ठाकुरों ने नागिन डांस किया होगा।

फ्राँस पहले पन्ने पर दमक रहा है क्योंकि वहाँ फुटबॉल के मैदानों में कई महाद्वीपों से खिंचा हुआ ‘फ्रेंच पसीना’ गिरता है। भारत की फुटबॉल टीम को विश्वकप में जगह भी नहीं मिलती क्योंकि किसी को ‘भारतीय पसीने’ के ईजाद की फ़िक्र नहीं है। यहाँ ठाकुर पसीना से लेकर चमार पसीना तक मौजूद है जो अलग-अलग मैदानों में अलग-अलग वजहों से बहता है। कोई ऐसा सहज स्वाभाविक मैदान ऐसा नहीं है जहाँ सबका पसीना गिरे और मिलकर ‘भारतीय पसीने’ की शक्ल ले ले और एक नई गंध पैदा करे। यहाँ सबके मैदान अलग हैं और खेल भी।

इक्कीसवीं सदी के  इस अठारहवें साल में किसी दलित को घोड़ी पर सवार देखकर किसी ठाकुर की आँख में ख़ून उतर सकता है। दूल्हे की जान जा सकती है और बाराती यह सोचकर पसीने-पसीने हो सकते हैं कि उन्हें बंधक बनाकर पीटा जाएगा!

यहाँ आदमी की तुलना में घोड़ी की शान ज़्यादा मानी जाती है जिसकी पीठ पर किसी दलित का बैठना गुस्ताख़ी है। इस सबको धर्म और परंपरा की सहमति हासिल है।

तो अब कोई फ्राँस को पछाड़ने की डींग हाँके तो उसके मुँह पर पुलिस वालों से घिरे दूल्हे संजय जाटव की तस्वीर दे मारिएगा।

और सोचिएगा कि भारतीय पसीने की ख़ुशबू पाने से हम अभी कितनी सदी दूर हैं ? अगर किसी अख़बार में दलित संपादक होता तो इस ख़बर को पहले पन्ने पर छापता या नहीं ? और यह भी कि आज़ादी के 70 साल बाद कोई दलित संपादक क्यों नहीं हो सका ?

 


लेखक मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक हैं।