Home पड़ताल लोकसभा अध्यक्ष : समता की जगह भेदभाव वाली बात क्यों?

लोकसभा अध्यक्ष : समता की जगह भेदभाव वाली बात क्यों?

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लोकसभा के अध्यक्ष यानि महत्वपूर्ण संवैधानिक पद. भारतीय संसद के निम्न सदन ‘लोकसभा’ का सभापति एवं अधिष्ठाता होता है. कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को लोकसभा का अध्यक्ष चुना जाता है उससे अपेक्षा होती है कि वह अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा दे दे, ताकि निष्पक्षता बनी रहे. ‘निष्पक्षता’ की चाह में जिस व्यक्ति से अपने राजनीतिक दल से भी इस्तीफा दे देने की अपेक्षा की जा रही हो, उस पद पर बैठे ओम बिरला का राजस्थान के कोटा में जाति के नाम पर बने संगठन के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद जातिवाद को बढ़ावा देने वाली बात को ट्वीट करना आश्चर्यजनक लगता है.

उन्होंने ट्वीट किया कि “समाज में ब्राम्हणों का हमेशा से उच्च स्थान रहा है. यह स्थान उनकी त्याग, तपस्या का परिणाम है. यही वजह है कि ब्राम्हण समाज हमेशा से मार्गदर्शक की भूमिका में रहा है.”

लोकसभा के अध्यक्ष जब यह बता ही रहे हैं कि ब्राम्हण को समाज में उच्च स्थान प्राप्त है तो उन्हें ये भी बताना चाहिए कि समाज में वे कौन लोग हैं जिन्हें निम्न स्थान प्राप्त है? ब्राम्हण किससे उच्च हैं? क्योंकि जिस तरह पक्ष और विपक्ष दोनों विद्यमान रहतें हैं, ठीक उसी तरह ‘उच्च’ कोई तभी रह सकता है जब ‘निम्न’ की भी मौजूदगी हो.

हम इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हम चाँद तक अपनी पहुँच बनाने में कामयाब हो रहे हैं पर जातिवाद- वर्णवाद से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं.

जब हमें सामाजिक समता को बढाने के लिए अत्यधिक प्रयास करने चाहिए ऐसे वक्त में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जाति के आधार पर ऊँच- नीच होने का ‘सर्टिफिकेट’ देने वाली ये सोच हैरान करती है. लोकसभा अध्यक्ष का यह ट्वीट पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी सोच और नज़रिये को स्पष्ट करता है.
जाति विशेष के आधार पर कुछ लोगों को समाज में ‘उच्च’ बताने से समाज में भेदभाव बढ़ेगा और बंधुत्व की भावना को ठेस पहुंचेगी.

ओम बिरला के विचार यह स्पष्ट करते हैं कि वे जिस राजनीतिक दल के कार्यकर्ता रहे हैं, वो भाजपा मनुवादी विचारधारा की पोषक है. मनुवादी व्यवस्था में जाति और वर्ण को ही श्रेष्टता का आधार माना जाता है.
भाजपा के लोग भारत के संविधान की शपथ भले ही लेते हों पर उनकी आस्था आज भी संविधान से ज्यादा मनुस्मृति में ही है. संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति के बजाय वे मनुवाद व्यवस्था को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.

ओम बिरला भारत के जिस संविधान की शपथ लेकर पद पर बैठे हैं, उसके हिसाब से समाज में सबका स्थान बराबर हैं.
समानता के उद्देश्य को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में एक नागरिक और दूसरे नागरिक के बीच राज्य द्वारा किये जाने वाले सभी विभेदों को अवैध घोषित किया गया है.
भारत के संविधान के अनुसार धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता तो जाति के आधार पर कोई उच्च या निम्न कैसे हो सकता है?

हमें यह समझना चाहिए कि जाति के आधार पर कोई शोषित, वंचित और उपेक्षित तो हो सकता है लेकिन उच्च या निम्न नहीं.
संवैधानिक पद पर बैठे हुए लोगों को हमेशा यह स्मरण रहना चाहिए कि वे अपने पद पर संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बैठे हैं न कि संविधान के उद्देश्यों के खिलाफ आह्वान करने के लिए.


 

अजय कुमार कुशवाहा,  राष्ट्रीय सचिव, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (युवा)

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