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तेज बहादुर के बहाने सुनिश्चित किया जाए कि नामांकन रद्द करना नियम नहीं, अपवाद हो

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वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहने वाले सीमा सुरक्षा बल के बर्खास्त जवान तेज बहादुर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की है और इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नोटिस जारी किया जा चुका है। अखबारों ने भले इस खबर को महत्व नहीं दिया पर यह साधारण नहीं है। इंदिरा गांधी के बाद पहली बार किसी प्रधानमंत्री के चुनाव को चुनौती दी गई है और संयोग से वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में ही है। मैं नहीं जानता क्या फैसला होगा और उसके बाद क्या होगा। मैं इस मामले की तुलना राजनारायण वाले से नहीं भी करूं तो स्थितियां वैसी ही बनती लग रही हैं। प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसले की उम्मीद तब भी नहीं थी। इसलिए मामले को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इस मामले में सुनवाई 21 अगस्त को है।

वैसे भी, बलात्कार के आरोपी से लेकर दंगा और आतंकवाद फैलाने के अभियुक्त जब चुनाव लड़ते हैं और इस नाम पर सत्याग्रह का भी दावा किया गया है तो किसी को भी चुनाव लड़ने से रोकना अनुचित है। नामांकन पत्र किसी स्पष्ट कारण के बिना रद्द किया जाना बिल्कुल प्रतिबंधित होना चाहिए। नामांकन स्वीकार होने का मतलब चुनाव जीतना नहीं है पर रद्द कर दिए जाने का मतलब चुनाव हारना जरूर है। और नामांकन पर निर्णय करने वाले अधिकारियों का काम चुनाव हारना या जीतना सुनिश्चित करना नहीं है। इसलिए उन्हें ऐसी हालत में बेनीफिट ऑफ डाउट (शक का लाभ) देना चाहिए और नामांकन रद्द नहीं करना चाहिए। यही नहीं, जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट से फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर चुनाव जीतने और पांच साल सासंद रहने के बावजूद प्रमाणपत्र की वैधता की पुष्टि नहीं होने के मामले देश में हैं तो किसी का नामांकन किसी प्रमाणपत्र या दस्तावेज के अभाव में रदद करना बिल्कुल अनुचित है।

मैं नहीं जानता सीमा सुरक्षा बल के जवान तेज बहादुर के मुकदमे में ये मुद्दे हैं कि नहीं पर इस बहाने इन मुद्दों को तय जरूर किया जाना चाहिए। दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं होने पर नामांकन रद्द किए जाने की बजाय यह प्रावधान होना चाहिए कि जीत तभी वैध होगी जब दस्तावेज पेश किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होता कि खास स्थिति बनाकर चुनाव लड़ने और जीतने का लाभ एक ही व्यक्ति या सत्तारूढ़ दल ही नहीं उठा पाए। तेज बहादुर का नामांकन जिन विशेष स्थितियों में रद्द हुआ है उसमें वह चाहे नहीं जीतता टक्कर तो कड़ी और दिलचस्प होती ही। इसलिए इस शंका को दम मिलता है कि उसका नामांकन जान-बूझ कर खारिज किया गया होगा जबकि वह चुनाव लड़कर हार जाता तो इस शंका की गुंजाइश ही नहीं रहती। अब अगर चुनाव रद्द करके दोबारा चुनाव कराया जाए तो भी वैसी स्थिति नहीं बनेगी और तेज बहादुर पहले जैसी स्थिति में नहीं रहेगा।

मैं नहीं जानता तेज बहादुर की कानूनी स्थिति क्या है। फैसला अदालत को करना है। इस बार जो हो वह तेज बहादुर की किस्मत होगी पर आगे के लिए मामला तय होना चाहिए और चुनाव की गंभीरता को बनाए रखने के लिए बैतूल की पूर्व भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे के जाति प्रमाणपत्र का मामला कम से कम अब खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसी तरह चुनाव लड़ने वालों से शपथपत्र और दस्तावेज मांगने का कोई मतलब नहीं है अगर उनके फर्जी या गलत होने की शिकायतों पर स्पष्ट कार्रवाई नहीं हो और नतीजे सार्वजनिक न किए जाएं। सैकड़ों फर्जी पैन नंबर दिए जाने के मामले की जांच की भी कोई सूचना नहीं है।

कायदे से तेज बहादुर को चुनाव लड़ने देना चाहिए था। जीतता तब सोचा जाता कि मांगा गया दस्तावेज जरूरी है कि नहीं। उसके लिए जीते हुए उम्मीदवार की जीत को खारिज किया जाए कि नहीं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संविधान अधिकतम वोट पाने वाले को जीता सुनिश्चित करता है। आदर्श उम्मीदवार जैसा कुछ नहीं है। अगर कोई बर्खास्त कर्मचारी (अगर बर्खास्तगी देशद्रोह, बलात्कार या खराब मानसिक हालत जैसी स्थितियों में नहीं है) तो तेज बहादुर का ही नहीं, किसी का भी नामांकन स्वीकार किया जाना चाहिए। अगंभीर उम्मीदवारी की स्थिति में कम वोट आने पर जमानत जब्त होने का प्रावधान है वह यहां भी लागू होता। चुनाव लड़ने से वह जीत सकता था – इसके अलावा चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ना था। जब बाकायदा वोट काटने के लिए उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं तो तेज बहादुर की उम्मीदवारी किसी तरह गलत नहीं थी। ऐसे में उसका नामांकन रद्द करके उसे शिकायत का मौका तो दिया ही गया है और निष्पक्षता व ईमानदारी का तकाजा है कि उसे संतोषजनक जवाब दिया जाए। साथ ही, आगे के लिए भी सुनिश्चित किया जाए कि नामांकन रद्द करना नियम नहीं, अपवाद हो।

मेरे हिसाब से मोटे तौर पर मामला यह है कि जवान से बर्खास्तगी का कारण बताने वाला दस्तावेज मांगा गया जिसके लिए समय कम दिया गया। फिर भी उसके लोगों ने कोशिश की। पर देर हो गई या दस्तावेज नहीं मिला। उस दिन खबर थी कि इसमें जानबूझकर देरी की गई अगर इसे छोड़ भी दें तो एक असामान्य दस्तावेज के लिए सामान्य विवेक से नामांकन रद्द नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि जीत जाता तो चुनाव अवैध करने का विकल्प था ही। इसलिए नामांकन रद्द करने का मकसद हमेशा शक में रहेगा। इसलिए उसकी बात सुनी जानी चाहिए औऱ उसे संतोषजनक जबाव मिलना चाहिए।

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