Home पड़ताल बिहार में बाढ़ की विभीषिका इंजीनियरिंग और भ्रष्टाचार का कॉकटेल है

बिहार में बाढ़ की विभीषिका इंजीनियरिंग और भ्रष्टाचार का कॉकटेल है

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Photo Pushya Mitra

बिहार में बाढ़ से भीषण तबाही मच रही है। आम लोगों की राय में इस बार की बाढ़ भयावह है। देश के कई हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका साफ दिखाई पड़ रही है। मायानगरी मुंबई सहित सैकड़ों जिले बाढ़ से प्रभावित हैं और सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। सवाल उठता है कि बाढ़ की यह विभीषिका नैसर्गिक है या मानव निर्मित? देश में हर साल बाढ़ की विभीषिका बढ़ती ही जा रही है, वह भी तब जब देश में मानसून सामान्य से कमजोर है और वर्षा की दर भी कम ही है।

बिहार देश में सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित राज्यों में से एक है। इस बार वहां बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या करीब 90 लाख तक हो गई है। नेपाल से लाखों क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है और बिना बरसात दर्जनों जिला बाढ़ग्रस्त हो गए। नीतीश कुमार के सुशासन का हाल बाढ़ पीडि़तों से पूछना चाहिए। चंपारण से लेकर सुपौल तक हालात बिगड़े हैं। और यह तब है, जब सभी चीजों के बाद बिहार में आपदा प्रबंधन विभाग ने मई के पहले सप्ताह में ही सभी बाढ़ प्रभावित जिलों के डीएम को स्पष्ट कहा था कि बाढ़ की आशका को देखते हुए तैयारी कर लें। इन तैयारियों में तटबंध को मजबूत करने से लेकर एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की तैनाती, नावों की व्यवस्था, गोताखोरों की बहाली, राहत शिविर, कंट्रोल रूम से हर तरह की व्यवस्था करनी थी।

सरकार ने खतरे वाले इलाके को खाली कराने का भी आदेश जारी किया था। नेपाल से पानी छूटते ही कमला, कोसी, गंडक, बागमती, महानंदा के बाढ़ग्रस्त इलाकों के हालात खराब होते जा रहे हैं। कमला पर बने तटबंध के दस जगह से टूटने की खबर है। हालांकि, सरकार के जल संसाधन विभाग ने अपने कार्यपालक अभियंता, प्रभारी केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष (सिंचाई भवन), पटना के जरिए स्पष्ट तौर पर 13 जुलाई को कहा कि बिहार के सभी सुरक्षात्मक तटबंध सुरक्षित हैं। हवाई सर्वे शुरू हो चुका है। बाढ़ राहत के नाम पर करोड़ों अरबों की बंदरबांट शुरू होने वाली है। तटबंध और बांध निर्माण व मरम्मतीकरण के नाम पर अरबों रुपए की बंदरबांट होती रही है।

बाढ़ अधिकारियों और सरकारों के लिए धन-संपत्ति अर्जित करने का उत्सव है। आमतौर पर नीतीश कुमार के खास लोग ही जल संसाधन विभाग संभालते रहे हैं, और यह सभी के संज्ञान में है कि यह विभाग कितना मालदार है।

बहरहाल, आजादी के बाद राज्य में बाढ़ की समस्या का एक बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण समाधान बांध और तटबंध को माना गया। लेकिन ऐसी क्या वजह रही कि जैसे-जैसे बांध और तटबंध की लंबाई बढ़ती गई, वैसे-वैसे बिहार में बाढ़ की विभीषिका बढ़ती चली गई। इस मॉडल का खामियाजा लगभग पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। बिहार से संबंधित कुछ आंकड़े इस समस्या से निपटने के इंजीनियरिंग समाधान पर प्रश्‍नचिह्न खड़ा करते हैं।

यहां वर्ष 1953 में 0.97 मेगाहेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित थी, जबकि 1974 में यह बढ़कर 2.5 मेगाहेक्टेयर हो गई। 1998 में 6.4 मेगाहेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई। बावजूद इसके सरकार और प्रशासन की नजर में इस समस्या का समाधान बांध में ही देखा गया और बड़े पैमाने पर बांध व तटबंध के निर्माण पर जोर दिया गया। बिहार में 1954 में तटबंध की लंबाई केवल 160 किलोमीटर थी और सदी के अंत तक आते-आते यह बढ़कर 3465 किलोमीटर हो गई थी। इस तरह से हर साल नदियों को बांध के पीछे रोकने की कवायद होती रही जबकि बाढ़ और भी भयावह होती गई।

गौरतलब है कि इस संकट के लिए देश में हुए अव्यवस्थित विकास की अहम भूमिका है। प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम को खत्म कर दिया गया, वहीं तालाबों और आहरों का अस्तित्व भी खतरे में है। इस तरह से जो पानी इनमें जमा होता था और ड्रेनेज सिस्टम से वर्षा का पानी शहर-गांव से बाहर निकल जाता था, वह अब नहीं हो पाता है। यह अलग बात है पटना में 72 एकड़ का गुणसागर तालाब अब संदलपुर कॉलोनी में बदल चुका है। इसी तरह से नालंदा मेडिकल कॉलेज का डायग्नोस्टिक सेंटर तालाब को भरकर बनाया गया। इसका उद्घाटन नीतीश कुमार ने किया। यह अलग बात है कि बिहार विधानमंडल में नीतीश कुमार भर दिए गए तालाबों और आहरों को पाताल से खोज कर निकालने का दावा करते हैं।

बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि बांध और तटबंध को अब खारिज किया जा रहा है। 1937 में पटना में हुए बाढ़ सम्मेलन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रेलवे और सड़कों के निर्माण की वजह से जलनिकासी की बाधा पर चिंता जताई थी। इसी सम्मेलन में ब्रिटिश इंजीनियर जीएफ हाल ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि जैसे-जैसे बाढ़ों के बारे में मेरी जानकारी बढ़ती जा रही है, बांधों की उपयोगिता पर शक होने लगा है और बाढ़ नियंत्रण न केवल अवांछनीय है बल्कि तटबंध ही बाढ़ की विभीषिका का मूल कारण है। जाहिर है, आजादी से बहुत पहले ही बांध और तटबंध को खारिज कर दिया गया था। इस चिंता के बावजूद 1954 में बांध आधारित बाढ़ नीति अपनाई गई। उस समय यह समझ बनी थी कि बाढ़ पर करीब डेढ़ दशक के भीतर ही पूर्णतः काबू पा लिया जाएगा, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो सका।

बाढ़ की दूसरी मुख्य वजह नदियों के तल का उथला होना है। इस उथलेपन की वजह से नदियों की जल संग्रहण क्षमता घटी है और आस-पास के क्षेत्रों पर पानी का दबाव लगातार बढ़ रहा है। शहरों के विस्तार और इसमें गिरने वाले नालों व कचरे ने नदी के अस्तित्व पर ही हमला कर दिया है। वहीं बांध और तटबंध की वजह से भी नदी का तल ऊंचा हो रहा है। नेपाल और बांग्लादेश से आने वाली नदियों में बहुत वेग होता है। वे अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती हैं। पहले यह गाद खेतों में फैल जाता था और खेतों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती थी, लेकिन जब से बांध और तटबंध बने हैं, गाद बांध की तलहटी में जमा होने लगा, जिससे बांध की जलसंग्रहण क्षमता घटती चली गई।

इस गाद को हटाने के लिए नदी उड़ाही कार्यक्रम चलाने की सरकारी पहलें होती रही हैं लेकिन इनमें भी भ्रष्‍टाचार पर्याप्‍त दिखता है। कुछ इंच उड़ाही कर के कुछ फुट दिखा देना और बिल काटकर सरकार से पैसे उगाह लेना बहुत आम बात है। इस वजह से नदियों की गाद साफ़ नहीं हो पाती है लेकिन गाद के नाम पर ठेकेदारों और अफसरों-नेताओं की जेब ज़रूर मोटी होती जाती है।

कोसी नदी पर बने तटबंध से 182000 हेक्टेयर जमीन बेकार हो गई है। उधर इन सबके बावजूद राजनीतिक दलों के नेता, इंजीनियर और प्रशासन की तिकड़ी इस समस्या का समाधान इसी में देखती है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। नीतीश कुमार का इकबाल लगातार कमजोर पड़ रहा है। वह सिर्फ सत्ता के केंद्र में रहना चाहते हैं, लेकिन अपने 14 साल के शासन में करोड़ों लोगों की नियति आगे भी बाढ़ के इर्द-गिर्द की रहने वाली है। आगे भी सहरसा रेलवे को पलायन से होने वाले रेवेन्यू की कमाई देता रहेगा।

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