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इस बार गांधी जयन्ती पर क्या आप सादगी के पक्ष में खड़े होंगे?

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गांधीजी की 150वीं वर्षगांठ पर इससे बड़ा क्रूर मजाक क्या होगा कि गांधी विचार की समाप्ति करने वाला व्यक्ति साबरमती आश्रम में जाएगा और उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने की बात करेगा? सुनने में आया है कि साबरमती आश्रम के ट्रस्टी भी इसे स्वीकार कर रहे हैं। अफसोस!

सरदार पटेल का भद्दा इस्तेमाल करने के बाद अब गांधी की 150वीं वर्षगांठ को भी अपने मकसद के लिए या कहिये अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को एक तरफ करते हुए गांधी की झाड़ू को देशभर में नचाने के बाद, अब गांधी की झाड़ू का झंडा बिल गेट्स के पुरुस्कार के तमगे से बांधा गया है। राष्ट्रवाद का ढोल पीटने वाले पश्चिमी जगत से खुद को स्वच्छता का प्रतीक और राष्ट्रपिता घोषित करवा रहे हैं।

प्रश्न गांधी के स्थापित नामलेवाओं और संस्थाओं से है कि इस बार भी 2 अक्टूबर को क्या सिर्फ फूल−माला ही चढ़ेंगे? चरखे से कताई होगी? मीटिंग, सेमिनार और अच्छी-अच्छी बातें होंगी? कुछ सरकार की बुराई के साथ कुछ गांधीजी की आदर्शों पर चलने की कसमें खाई जाएंगी?

क्या 2 अक्टूबर पर कहीं कोई धरना होगा? कहीं लोग सड़क पर बैठेंगे? कहीं इस बात पर धरना होगा कि हजारों हजार दलित सफाईकर्मी नालियों में कीड़ों की तरह मर जाते हैं? कि बेटियों का बलात्कार करने वाले जेल में न जाकर अस्पतालों में आराम फरमा रहे हैं? कि गांधी होते तो क्या करते और उससे अलग, आज हम क्या करेंगे?

क्या यह बात ललकार कर कही जाएगी कि सरकार झूठा राष्ट्रवाद फैला रही है? गांधी का राष्ट्रवाद सत्य और अहिंसा पर था और आज देश की सरकार पूरी तरह असत्य पर खड़ी है। न केवल सरकार बल्कि सरकार की पीछे के आरएसएस जैसे संगठन जो 2014 के बाद अति साधन संपन्न और शक्तिशाली हुए, वे देश के युवाओं को आक्रामक व हिंसक बना रहे हैं। हम गांधी में विश्वास रखते हुए इसका पूरा विरोध करते हैं, निषेध करते हैं और संविधान की पालना के संघर्ष का संकल्प लेते हैं।

मैं यहां उन आंदोलनों की, उन संगठनों की बात नहीं कर रहा जो रोज सड़कों पर उतरे हुए हैं। मैं उनकी बात कर रहा हूं जो गांधी का नाम लेते रहे हैं मगर बरसों से चुप हैं जबकि बड़ी-बड़ी कंपनियां एक व्यक्ति को पाखाना बनाने से संसार बनाने तक के लिए महान बना रही हैं।

जो काम महात्मा गांधी, भगत सिंह, बाबासाहब, सुभाष चंद्र बोस, अशफाकउल्ला खान, श्री देव सुमन सरीखे लोग जिंदगी देकर कर पाए, उस पूरे विचार और संविधान को यह व्यक्ति जड़ें खोद−खोद कर खत्म कर रहा है।

यह व्यक्ति जिस विचारधारा का पुत्र है, उस विचारधारा ने आज देश को कुतर्की भक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले वर्षों में पंचायत चुनाव से लेकर उच्च चुनाव तक एक ही व्यक्ति का नाम प्रचारित किया गया है।

देश के कानूनों में जनहित विरोधी बदलाव, मनचाही व्यवस्था लाने के लिए व शक्ति का विस्तार करने के लिए नियम और कायदों का उल्लंघन भी 2014 से आम बात हो गई है। एक तरफ हिंदुत्ववादियों को खुश करने के लिए बजट की प्रस्तुति भी लाल कपड़े में तो दूसरी तरफ कानूनों को ताक पर रखकर हवाई जहाज से पानी पर उतरना, सरदार सरोवर जैसी परियोजनाओं का उद्घाटन करना, मन की बात, मेरी बात, मैं और सिर्फ मैं। ताजा नौटंकी 1.24 लाख करोड़ रुपये, भारतीय करदाताओं के पैसे से अंतर्राष्ट्रीय नाटक में हाउडी मोदी का मतलब भारत में सब ठीक है कहना अहंकार की पराकाष्ठा है। ऐसे ही सब ठीक तो कश्मीर में क्यों दैनिक जीवन पर पर ताले हैं?

दलितों-मुसलमानों-आदिवासियों के हक में आवाज उठाने पर पाबंदी, खुलकर हगने पर हत्या, बलात्कारी मंत्रियों को संरक्षण। यह सभी कुछ एक व्यक्ति की छत्रछाया में ही हो रहा है। रोहित वेमुला की मां को भारत माता कहकर टसुवे बहाने वाला व्यक्ति, झारखंड को मोब लिंचिंग के लिए बदनाम न करने की अपील करता है। कश्मीरी कैदखाने की आवाज़ों को कश्मीर की आर्थिकी के साथ कब्र में दफन करने के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की एकता का ढोल बजाता है।

भक्तों की पूरी टीम है, जिसमें एक श्री श्री रविशंकर महाराज ने जमुना के किनारे पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर अंतर्राष्ट्रीय नाच गाने का कार्यक्रम किया। अदालतों की भी परवाह नहीं की। आज तक पांच करोड़ रुपए का जुर्माना जिसने अदा नहीं किया उसे पदम विभूषण से नवाजा गया। यह एक उदाहरण है। ऐसे अनेक हैं। जिसने जितनी चापलूसी और प्रचार में मदद की उसे उतना बड़ा पुरस्कार। इसरो के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक ने जब अंबानी से जुड़ी कंपनियों को सैटेलाइट निर्माण कार्य देने पर आपत्ति उठाई तो उनसे सभी काम छीन लिए गए तथा उन्हे कंधे पर आंसू बहाने वाले इसरो चीफ सीवन के पूरी तरह अधीन कर दिया गया। जिस आईएएस ने आवाज उठाई या सत्ता से अलग हुआ, ऐसे कश्मीर के आईएएस अधिकारी शाह फैसल को कैद किया। गुजरात के आईएएस कन्नगोपिनाथन ने कश्मीर की बुरी स्थिति के कारण इस्तीफा दिया तो उसे पाबंदियों में धकेला।

मगर बात यह भी सही है कि यह व्यक्ति जिस विचारधारा का पोषक है उस विचारधारा को मानने वाले देश की आज़ादी में कहीं नहीं थे। इसलिए इस व्यक्ति को अरबों के खर्च के बाद, गांधी के समकक्ष खड़ा करने के लिए, एक महिला विरोधी गोरे से फादर ऑफ इंडिया कहलवाना पड़ रहा है। एक झूठा ही सही मगर आरएसएस को कम से कम कहने भर के लिए कोई प्रतीक मिल जाए, अमेरिका से लौटने पर जो सत्कार किया गया वह भी इसीलिए था।

झूठी शान के लिए सरदार सरोवर में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले पुनर्वास के चिखलदा गांव को गांधीजी की मूर्ति सहित डुबाया गया। जिंदाबाद है नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथियों को जिन्होंने उसे दोबारा पानी से निकालकर स्थापित किया और संघर्ष का नारा फिर बुलंद किया।

आइए! गांधी की 150वीं जयंती पर इस बड़े खतरनाक खतरे के खिलाफ खड़े हों। गांधी हमेशा सादगी के लिए काम करते रहे हैं। गांधी ने हमेशा इस तरह की फिजूलखर्ची वाले नाटकों का विरोध किया है और सत्य के पक्ष में खड़े हुए हैं। भले ही वे अकेले रह गए। इस बार मैं किसी समाधि पर नहीं जाऊंगा। मगर लोगों से यही बात करूंगा। कम से कम गांधी के 150वीं जन्मदिन पर मैं केक खा कर अपना मुंह बंद नहीं रखूंगा।


लेखक एनएपीएम से जुड़े हैं 

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