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प्रेस क्‍लब के चुनाव में संघ की व्‍यवस्थित घुसपैठ को कैसे पत्रकारों ने किया खारिज, पूरी कहानी

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प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में आधी रात जीत के बाद पत्रकारों के खुशनुमा चेहरे

प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया के सालाना चुनाव में इस बार भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस समर्थित पत्रकारों की ओर से साम, दाम, दंड, भेद की तमाम नीतियां औंधे मुंह गिर गई हैं। रविवार रात ढाई बजे के करीब नतीजों की आधिकारिक घोषणा के मुताबिक निवर्तमान प्रबंधन कमेटी और उसके पदाधिकारियों की भारी मतों के अंतर से जीत हुई है। कुल 21 पदों में से 20 पद मौजूदा कमेटी ने बचा लिए हैं और केवल एक प्रत्‍याशी की प्रबंधन कमेटी के सदस्‍य पद क लिए हार हुई है।

दो दिन पहले 25 नवंबर को हुए प्रेस क्‍लब चुनाव की गिनती रविवार को दिन में शुरू हुई। कुल 1750 वोटों की गिनती में पहले दौर के 500 वोटों का रुझान ही चौंकाने वाला था जिसमें मौजूदा गौतम-विनय पैनल के सभी 21 प्रत्‍याशी भारी मतों से आगे चल रहे थे। आखिरी वक्‍त तक यही रुझान कायम रहा और कुल 20 प्रत्‍याशियों की जीत हुई। अकेले अनीता चौधरी विपक्षी बादशाह पैनल से प्रबंधन कमेटी में जीत कर आने में कामयाब रही हैं।

प्रेस क्‍लब द्वारा जारी अंतिम वोट सूची नीचे देखें:

संघ के दखल की शुरुआत

देश में पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्‍था प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया पर पिछले दो साल से कब्‍ज़े की लड़ाई चल रही थी। अब तक भाजपा और संघ परदे के पीछे से भूमिका निभाते आए थे और प्रत्‍यक्ष रूप से किसी भी पैनल पर संघ की मुहर नहीं दिखती थी। यहां तक कि पिछले साल भी जब चुनाव हुए, तो वैचारिक धुंधलका इतना था कि कुल पांच पैनल खड़े हुए थे जिसमें माना जा रहा था कि तीन प्रमुख पैनलों में से एक पैनल भाजपा/संघ समर्थित है और दो पैनल उसके विरोधी। इस साल हालांकि परिदृश्‍य बिलकुल ब्‍लैक एंड वाइट था।

इस चुनाव में पत्रकारों के बीच वैचारिक स्‍तर पर जो दो फाड़ दिख, उसकी शुरुआत एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के यहां छापे की घटना से हुई। प्रणय रॉय के समर्थन में प्रेस क्‍लब की ओर से एक जबरदस्‍त कार्यक्रम हुआ जिसमें पत्रकारों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं सभी ने हिस्‍सा लिया था। इस आयोजन पर दो कारणों से सवाल उठे थे। एक तो यह पूछा गया कि यह कार्यक्रम अगर विशुद्ध पत्रकारों का था तो इसमें एक्टिविस्‍ट क्‍या कर रहे थे। इस सवाल के पीछे जेएनयू की छात्र नेता शहला राशिद और एक अंग्रेज़ी चैनल के संवाददाता के बीच हुई झड़प थी जिस पर पत्रकारों की ओर से नाराज़गी जाहिर की गई कि किसी पत्रकार को प्रेस क्‍लब में घुसने से कैसे कोई एक्टिविस्‍ट रोक सकता है।

इसी प्रतिक्रिया का फायदा उठाते हुए आरएसएस समर्थित कुछ पत्रकारों ने इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय कला केंद्र के अध्‍यक्ष और वरिष्‍ठ पत्रकार रामबहादुर राय की सदारत में प्रेस क्‍लब के प्रांगण में ही एक आयोजन कर डाला जिसका असली मुद्दा यह था कि आम पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर प्रेस क्‍लब क्‍यों नहीं बोलता। इस गुट का मानना था कि प्रणय रॉय मीडिया मालिक हैं इसलिए उनकी अभिव्‍यक्ति के लिए आवाज़ उठा रहे लोग पत्रकारीय हित के साथ नहीं हैं।

इस आयोजन में रामबहादुर राय ने एक पत्रकार सुरक्षा बिल की बात की और कहा कि वे सरकार को इसका एक मसौदा पेश कर के मामले को आगे बढ़ाएंगे। यह पहला आयोजन था जिसमें साफ़ दिख रहा था कि प्रेस क्‍लब को निशाना बनाकर यहां सरकार के लिए जगह बनाने की कोशिश की जा रही है। बात यहीं नहीं रुकी। जब गौरी लंकेश की हत्‍या हुई, तो स्‍वाभाविक रूप से प्रेस क्‍लब में सैकड़ों की संख्‍या में पत्रकार और एक्टिविस्‍ट विरोध में जुट आए। इसकी प्रतिक्रिया में एक बार फिर संघ समर्थित पत्रकारों ने कुछ दिनों बाद समानांतर आयोजन प्रेस क्‍लब में ही कर दिया जिसकी सदारत विजय क्रांति ने की।

इस आयोजन में गौरी लंकेश पर कोई बात नहीं हुई, बल्कि बार-बार यह कहा गया कि दिल्‍ली के पत्रकार छोटे शहरों के पत्रकारों पर आवाज़ नहीं उठाते। इसी आयोजन में आइबीएन-7 के सुमित अवस्‍थी आए थे जो तथ्‍यात्‍मक चूक कर गए और उन्‍होंने कुछ ऐसे पत्रकारों का नाम लेते हुए जिन पर हाल में हमले हुए थे, कह डाला कि प्रेस क्‍लब को उन पर भी बोलना चाहिए था। सच्‍चाई यह थी‍ कि जोगेंदर सिंह और राजदेव रंजन के मामले में भी प्रेस क्‍लब विरोध प्रदर्शन व आयोजन कर चुका था, लेकिन अवस्‍थी समेत कार्यक्रम में मौजूद बाकी पत्रकारों को इसकी जानकारी ही नहीं थी।

इन दो कार्यक्रमों ने ही प्रेस क्‍लब चुनाव में संघ समर्थित पैनल के गठन की नींव रखी।

पैनलों का अनैतिक संगम

जब पैनलों के नामों का खुलासा हुआ, तो पता चला कि पिछले साल के तमाम विपक्षी पैनलों का आपस में समागम हो चुका था और वाम-दक्षिण के तमाम वैचारिक विभाजन भुलाकर एक कॉमन पैनल बादशाह सेन की अध्‍यक्षता में बना दिया गया था जिसका कुल उद्देश्‍य प्रेस क्‍लब पर सात साल से कायम ”कब्‍ज़े” को हटाना था। किसका कब्‍ज़ा हटाना था, क्‍यों हटाना था, इन सवालों के जवाब आसमान में थे।

अंतत: बादशाह सेन की अगुवाई में जो पैनल बना, उसमें कुछ पत्रकार नरेंद्र भंडारी की अध्‍यक्षता वाले उस संगठन से लाए गए जिसकी संबद्धता सीधे तौर पर आरएसएस के मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ से थी। इन पत्रकारों की तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर केंद्रीय मंत्रियों के संग इनके आयोजन “पत्रकार महापंचायत”  में देखी जा सकती हैं। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर इस पैनल से अध्‍यक्ष पद का प्रत्‍याशी यानी बादशाह सेन कौन है। कुछ पुराने लोगों के मुताबिक बादशाह सेन उर्फ अनिकेंद्र नाथ सेन महान कम्‍युनिस्‍ट नेता माहित सेन के परिवार से थे। पिछला ज्ञात अतीत यह था कि वे दिलीप पडगांवकर के साथ टाइम्‍स ऑफ इंडिया में हुआ करते थे। सेन का पिछले दो दशक का अतीत हालांकि अज्ञात था।

मीडियाविजिल ने इस बारे में एक विस्‍तृत रिपोर्ट की। कहा जा रहा है कि ऐन चुनाव से पहले आई इस उद्घाटक रिपोर्ट का चुनाव पर काफी असर हुआ। इसके बाद सेन पैनल ने चुनाव जीतने के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाए। मसलन, चुनाव से ठीक पहले अफ़वाह उड़ायी गई कि मौजूदा पैनल अगर वापस आया तो वह छायाकारों, कैमरामैनों आदि की सदस्‍यता खत्‍म कर देगा। यह सफ़ेद झूठ और मनगढंत बात थी। चुनाव की पूर्व संध्‍या पर एक बात सोशल मीडिया में उड़ायी गई कि वरिष्‍ठ पत्रकार रामबहादुर राय की सदस्‍यता और वोटिंग अधिकार प्रेस क्‍लब ने समाप्‍त कर दिए हैं। इस मामले पर पत्रकारों को एकजुट होने का आह्वान भी किया गया और कहा गया कि रामबहादुर राय चुनाव के दिन प्रेस क्‍लब के सामने तब तक धरने पर बैठेंगे जब तक उन्‍हें वोट न देने दिया जाए।

दरअसल, यह ख़बर दो महीने पुरानी थी। प्रेस क्‍लब के नियमों में प्रावधान है कि तीन साल लगातार सदस्‍यता शुल्‍क नहीं चुकाने पर किसी भी सदस्‍य की सदस्‍यता चली जाएगी। ज़ाहिर है रामबहादुर राय अपवाद नहीं थे। वे भी इसी श्रेणी में थे। उन्‍हें प्रेस क्‍लब प्रबंधन द्वारा शुल्‍क बाकी होने के बारे में चेताया गया था, लेकिन उनकी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई। सेन का पैनल, जो अब तक खुद को भाजपा या संघ समर्थित होने से इनकार कर रहा था, उसने आखिरी मौके पर रामबहादुर राय का मुद्दा उठाकर अपने पैर में कुल्‍हाड़ी मार ली।

अव्‍वल तो यह मुद्दा ही गड़बड़ था क्‍योंकि नियमों के दायरे में राय भी बंधे थे, उन्‍हें रियायत नहीं थी। दूसरे उसने अपनी प्रच्‍छन्‍न पहचान राय के बहाने ज़ाहिर कर दी और वह बात जो अब तक हवा में थी, ज़मीन पर आ गई कि बादशाह सेन के पैनल को भाजपा-संघ की शह प्राप्‍त है। आखिरी मौके तक रामबहादुर राय के नाम पर माहौल को पोलराइज़ करने की कोशिश की गई। चुनाव के दिन रामबहादुर राय, जो तीन साल से वोट नहीं डाले थे, वरिष्‍ठ पत्रकार एनके सिंह के साथ क्‍लब पहुंचे। उनके साथ निजी सुरक्षाकर्मी भी थे। क्‍लब के बाहर वे कुर्सी पर बैठे, तो बादशाह सेन के पैनल ने बाकायदे वीडियो से प्रचारित किया कि वे धरने पर बैठे हैं जबकि वे अपनी फीस के जमा होने का इंतज़ार कर रहे थे। आखिरकार वे वोट डालने गए और उन्‍हें ससम्‍मान ले जाया गया। इस सामान्‍य प्रक्रिया को सेन पैनल मतदान के बीचोबीच अपनी जीत बता रहा था लेकिन पत्रकारों को अब तक सब कुछ समझ में आ चुका था।

जिस किस्‍म के नतीजे आए हैं, वे दिखाते हैं कि दोनों पैनलों के पदाधिकारियों के वोटों में भारी अंतर है। तकरीबन दोगुने मतों के अंतर से गौतम-विनय पैनल की जीत हुई है। एक सिरे से संघ के पैनल को पत्रकारों ने खारिज कर दिया है। हर किस्‍म की अफ़वाह, झूठ, जोर, प्रचार के बावजूद पत्रकारों ने प्रेस क्‍लब का मौजूदा चरित्र बरकरार रखा है और आरएसएस की एंट्री को फिलहाल रोक दिया है।