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महू के आंबेडकर विवि में पहली बार 14 अप्रैल का कार्यक्रम रद्द, चंद्रशेखर ने दी बंद की चेतावनी

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भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद आंबेडकर जयंती के मौके पर उनके जन्मस्थान मध्‍यप्रदेश के इंदौर स्थित महू में थे। उनका कार्यक्रम बेहद गुप्त रखा गया था और पुलिस-प्रशासन को भी इसकी खबर आखिर तक नहीं मिल सकी। इसके बाद वे महू के ही बाबा साहेब आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय में पहुंचे। यहां उन्होंने कई छात्रों से बातचीत की जिन्होंने अपनी परेशानियां उन्हें बताईं।

छात्रों का मुद्दा था कि उन्हें पीएचडी में दाखिला लेने के तीन साल बाद भी अब तक गाइड नहीं मिला है। जिन शोधार्थियों को गाइड नहीं मिल रहे हैं उन्हें यहां से दूसरे विश्‍वविद्यालय मे भेजा जा रहा है। चंद्रेशखर ने अपने फेसबुक लाइव में मनोज वास्केल नाम के एक शोधार्थी को शामिल किया और उसका पूरा साथ देने का आश्वासन दिया।

विवि में आजकल एक ताज़ा विवाद चर्चा में है। दरअसल, संस्थान की शुरूआत के बाद यह पहली बार है जब यहां आंबेडकर जयंती पर कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। यहां एक अंतरराष्‍ट्रीय सेमिनार आयोजित होना था लेकिन विश्‍विद्यालय की नई कुलपति डॉ. आशा शुक्ला ने इसे रद्द कर दिया और इसकी जिम्मेदारी संयोजक डॉ. सीडी नाइक पर डाल दी। बताया जाता है कि चंद्रशेखर ने नाइक से भी मुलाकात की है। अपने फेसबुक लाइव में चंद्रशेखर ने विश्‍विद्यालय का ढर्रा न सुधरने की स्थिति में भीम आर्मी की मदद से महू और इंदौर बंद करने जैसी चेतावनी भी दी है।

सामाजिक विज्ञान से जुड़े विषयों पर शोध के लिए 1993 में यह संस्थान दिग्विजय सिंह सरकार ने स्थापित किया था और 2015 में शिवराज सरकार द्वारा इसे एक विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया। इस संस्थान में कई महत्वपूर्ण सामाजिक शोध हुए हैं लेकिन पिछले कुछ समय से नकारात्मक वजहों से विश्वविद्यालय लगातार सुर्खियों में है। यहां के छात्र कहते हैं कि सरकार ने वोट बैंक को खुश करने के लिए इस संस्थान को विश्वविद्यालय तो बना दिया लेकिन इसके बाद कुछ खास नहीं किया। हालत यह है कि पिछले दो साल में यहां से 164 शोधार्थियों ने अपनी पीएचडी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। विश्‍विद्यालय की शुरूआत में सरकार ने सभी जरूरतें पूरा करने का आश्वासन दिया था लेकिन इसके बाद केवल खानापूर्ति होती रही।

विश्‍वविद्यालय में एक बार प्रकाश आंबेडकर और एक कांग्रेस नेता आ पहुंचे थे जो भाजपा सरकार को रास नहीं आया। इसके बाद आनन-फानन में तब के कुलपति डॉ.आर.एस कुरील को हटा दिया गया, जिसके बाद इसकी जिम्मेदारी एक अधिकारी को दे दी गई। नई कुलपति डॉ. आशा शुक्ला का नाम कुलपति की दौड़ में था ही नहीं लेकिन वे अचानक कुर्सी पर बैठा दी गईं। भाजपा सरकार से उनकी नजदीकियां बताई जाती हैं हालांकि अब वे कांग्रेसी खेमें में भी खासी घुसपैठ रखती हैं। शुक्ला ने यहां आने के बाद कई परिवर्तन शुरू कर दिए हैं। उन पर सवर्ण वर्ग को ज्यादा खुश रखने के आरोप लग रहे हैं।