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भय के माहौल में 40 फीसदी किशोरियां पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हैं : अम्बरीष राय

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कुल 40 प्रतिशत स्कूल जाने वाली 15-8 वर्ष की किशोरियां सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल के अभाव में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर होती है. लड़कियां सिर्फ घर के बाहर ही नहीं,बल्कि घर के भीतर भी भय और असुरक्षा के माहौल में जीतीं हैं. लिहाजा शिक्षा पाने का उनका सपना अधूरा रह जाने को अभिशप्त होता है.

ये बात भी अत्यंत शोचनीय है कि आज सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल में मौलिक संवैधानिक अधिकार के बतौर सभी बच्चों को शिक्षा की गारंटी देने वाले ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून 2009 का सिर्फ मखौल ही नहीं उड़ाया जा रहा, बल्कि उसे कमजोर करने के निरंतर प्रयास हो रहे हैं. इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि देश के मात्र 12.7 प्रतिशत स्कूलों में ‘शिक्षा का अधिकार’ कानूनके प्रावधानों का पालन होता है.

ये बातें विभिन्न विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने “सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल में लड़कियों की शिक्षा” विषय पर राईट टू एजुकेशन फोरम द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय परिचर्चा के दौरान कही. यह परिचर्चा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (एनेक्स) में 30 सितम्बर, 2019 को आयोजित की गई थी.
परिचर्चा को संबोधित करते हुए कुख्यात दिल्ली बलात्कार कांड की शिकार निर्भया की मां और निर्भया ज्योति ट्रस्ट की अध्यक्ष आशा देवी ने कहा, “लड़कियां न सिर्फ घर के बाहर असुरक्षित माहौल से गुजरती हैं बल्कि घर के भीतर का माहौल भी उनके लिए उतना ही असुरक्षा से भरा है. घटना-दर-घटना से यह बात साबित हुई है कि समस्या ने विकराल रूप ले लिया है. और अगर इसपर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थितियां नियंत्रण से बाहर चली जायेंगी. इस समस्या से कारगर तरीके से निपटने का सबसे उपयुक्त माध्यम शिक्षा है. अगर हम लड़कियों को शिक्षा के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल नहीं उपलब्ध करा पाये, तो यह उनके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी होगी.”

उन्होंने आगे कहा कि यह तथ्य बार–बार सामने आया है कि सुरक्षा के प्रश्न ने लड़कियों के भविष्य, खासकर उनकी शिक्षा, को अधर में डाला है. आशा देवी ने कहा, “मां–बाप या अभिभावक के तौर पर हम हमेशा यही सोचते हैं कि लड़कियों को पढ़ाकर क्या फायदा क्योंकि उन्हें शादी के बाद पराये घर जाना है. लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि शादी के बाद हमसे अलग होकर दूसरे घर जाने पर यही शिक्षा ही हमारी लड़कियों को सही राह दिखायेगी और अपनी हिफाजत करने में सहायक होगी. शिक्षित लड़कियां ही अपने बेटों या भाईयों या पतियों को लैंगिक समानता और स्त्रियों के सम्मान के प्रति संवेदनशील बनायेगी.”

इससे पहले परिचर्चा में शामिल होने वाले प्रतिभागियों एवं अन्य मेहमानों का स्वागत करते हुए राइट टू एजुकेशन फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीष राय ने कहा, “आज़ादी के 72 वर्षों बाद भी हम अपने बच्चियों को शैक्षिक संस्थानों में सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल नहीं सुनिश्चित करा पाये हैं. और स्कूल जाने वाली 15–18 वर्ष की 40 प्रतिशत किशोरियों द्वारा बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ने की यही सबसे बड़ी वजह है. एक राष्ट्र के तौर पर यह हमारे के लिए बेहद शर्मनाक है.”

श्री राय ने यह भी कहा कि देश के मात्र 12.7 प्रतिशत स्कूलों में ही सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल में सभी बच्चों को शिक्षा की गारंटी देने वाले ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून के प्रावधानों का पालन किया जा रहा है. यह बेहद ही दुखद है कि इस महत्वपूर्ण कानून को कमजोर करने के लिए तरह – तरह के दांव आजमाये जा रहे हैं. निजीकरण और बाजारीकरण की प्रक्रिया हमारी शिक्षा को बर्बादी के कगार पर पहुंचा देगी. इससे तत्कालरोकना होगा.
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने, अपने संबोधन में, यह स्वीकार किया कि लड़कियों को सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल में शिक्षा उपलब्ध कराना हम सबका दायित्व है. उन्होंने कहा, “हम इस जिम्मेदारी से कतई मुकर नहीं सकते. लड़कियों को सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल में शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में माता – पिता, विद्यालय प्रबंध समिति के सदस्यों एवं सरकार के अधिकारियों को मिलजुलकर सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा.”

परिचर्चा को काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के अध्यक्ष डॉ. अशोक पंकज, जामिया मिलिया इस्लामिया की प्रो. गीता मेनन, अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष डॉ. आर. सी. डबास, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. अनीता रामपाल, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के प्रो. आर. गोविंदा, शिक्षा विशेषज्ञ सुनीता शर्मा और जानी – मानी लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता अनीता भारतीने भी संबोधित किया.


मित्र रंजन,मीडिया समन्वयक,आरटीई फोरम द्वारा जारी

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