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मोदी उस इस्राइल को गले लगा रहे हैं जिसने नेहरू की हत्या की कोशिश की !

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पंकज चतुर्वेदी

 

आखिर राहुल गांधी इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेटयन्नहाऊ से क्यों नहीं मिले? आखिर आरएसएस के लोगों को इस्राइल पर इतना प्यार क्यों आता है?

असल में इसके मूल में पंडित नेहरू हैं। 1948 में खुद को यहूदी राष्ट्र घोषित करते ही गाज़ा इलाके में तनाव शुरू हो गया था। सन 50 में इस्राइल को एक देश के तौर पर नेहरू ने मान्यता तो दी लेकिन राजनयिक सम्बन्ध नहीं रखे। जब अरब जगत और इस्राइल के बीच तनाव बढ़ गया तो यू एन के निर्देश पर शांति सेना भेजी गई जिसमें बड़ा भारतीय सैनिकों का था। हमारी सेना की कर्मठता निष्पक्षता के सामने इस्राइल की एक न चली। यही नहीं नेहरू स्वयम भारतीय सैनिकों से मिलने गाज़ा गए (ऊपर की मुख्य तस्वीर में नेहरू वहीं भारतीय सैनिकों से मिलते दिख रहे हैं-संपादक)। यह वाकया सन 60 का है। जब उनका विमान गाज़ा से बैरुत के लिए उड़ रहा था तब इस्राइली सेना के दो फाइटर ने उनका पीछा किया। 1 अगस्त 60 को नेहरू ने संसद में बताया था कि किस तरह इस्राइल ने उनकी हत्या का प्रयास किया था।

सनद रहे उस दौर में इस्राइल ने कई ऐसे हत्याकॉन्ड कभी ज़ाहिरा तो कभी मोसाद के माध्यम से अंजाम दिए थे।

नेहरू का इस्राइल के प्रति नज़रिया ही संघ के प्रेम का कारण है और राहुल का ना मिलने का भी।

भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजरायल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में से एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा. आइंस्टाइन नेहरू के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे. नेहरू भी उनका बहुत सम्मान करते थे. 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टाइन ने नेहरू को लिखा-प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में है, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं. उन्हें न्याय और समानता चाहिए.

इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था. इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए. नेहरू ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया. फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा- मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानुभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है. मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है. आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए. वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगें मानने के लिए विवश करना चाहते हैं.जहां फिलीस्तीनी अरब और यहूदी जनता धर्मनिरपेक्ष देश में साथ-साथ रहें — के पक्ष में दलील देते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के विभाजन की योजना के विरोध में मतदान किया था। स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में इस्राइल और फिलीस्तीन के गठन को मंजूरी को मिले बहुमत ने भारत के मत को नामंजूर कर दिया था। (विभाजन की योजना को दो-तिहायी बहुमत मिला: इसके पक्ष में 33 और विपक्ष में 13 मत पड़े, ब्रिटेन सहित 10 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया।)

आखिरकार, 17 सितम्बर 1950 को भारत ने इस्राइल राष्ट्र को आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की, हालांकि उसके साथ भारत के राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इस्राइल के साथ कूटनीतिक संबंध शुरू करने को मंजूरी दी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )