Exclusive- रेमडेसिवर: दवा कोरोना की? अमेरिकी अर्थव्यवस्था की या फिर सत्ता और पूंजीपतियों के गठजोड़ की! – 1

मयंक सक्सेना मयंक सक्सेना
Corona Published On :


कोरोना संकट से जूझती दुनिया में बाज़ार में अचानक एक ख़बर आती है, 1 मई को अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन – अमेरिकी फार्मा कंपनी गिलीड की एंटी वायरल दवा रेमडेसिवर को इमरजेंसी यूज़ ऑथोराइज़ेशन यानी कि चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए आपातकालीन मंज़ूरी दे देती है। किसी सामान्य समय में ये मंज़ूरी कई तरह की रिव्यू जांच के बाद ही मिलती है। लेकिन इसको कोरोना के इलाज के लिए एक अहम कदम बता कर, कोविड 19 के इलाज के लिए चिकित्सकीय इस्तेमाल की मंज़ूरी देने का एलान – अपने ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति ट्रम्प करते हैं। जब ये एलान हो रहा होता है, उस समय इसको बनाने वाली कंपनी गिलीड साइंसेज़ के सीईओ – राष्ट्रपति ट्रम्प के पास ही खड़े होते हैं।

ट्रम्प के साथ खड़े डेनियल ओ’डे

ये लाइसेंस औपचारिक नहीं है!

ख़ुद कंपनी की मानें तो दवा को जो एफडीए अप्रूवल मिला है, वह आपातकालीन है। यानी कि दवा को कोई औपचारिक लाइसेंस नहीं मिला है, फिर भी इसे चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके बाद अमेरिका समेत दुनिया भर में हल्ला मच गया कि कोरोना का इलाज इस दवा की वजह से और आसान हो जाएगा। जबकि सच ये है कि अभी इस दवा की क्लीनिकल रिपोर्ट्स को लेकर अमेरिका जितना उत्साहित है, उतना क्लीनिकल इस्तेमाल इस दवा का अमेरिका में नहीं हुआ है। हालांकि इस घोषणा के बाद, सबसे पहला सवाल ये खड़ा हुआ कि आखिर ये कैसे तय होगा कि किन अस्पतालों को ये दवा इस्तेमाल करने के लिए उपलब्ध कराई जाएगी और किन को नहीं..

दवा हमने ईजाद कर ली है, बीमारी ढूंढ लेंगे..?

इसके साथ ही दुनिया भर, खासकर हमारी अति-उत्साही मीडिया ने ये शोर मचा दिया कि कोरोना के इलाज को लेकर कोई क्रांतिकारी औषधि आ गई है। जबकि ये भी एक सच है कि रेमडेसिवर पहले से मौजूद एक एंटीवायरल है, जिसे कैलीफोर्निया की ये कंपनी गिलीड साइंसेज़ ने एक दशक पहले ही विकसित किया था। लेकिन मज़े की बात ये है कि जिस दवा के अब कोरोना वायरस संक्रमण के उपचार में इस्तेमाल का शोर मच गया है। वह इसके पहले किसी भी बीमारी के इलाज में प्रमाणित रूप से नतीजे नहीं दे सकी है। यानी कि एक ऐसी दवा, जो 10 साल पहले ईजाद हो गई थी और अभी तक किसी बीमारी की राह देख रही थी? और इस दवा का विकास या अविष्कार – दशक भर पहले हेपेटाइटिस सी और श्वसन तंत्र के सिन्टियल वायरस के इलाज के लिए हुआ था, लेकिन इसे उसका भी मार्केटिंग प्रमाणन नहीं मिल सका। इसके बाद, इस कंपनी ने इस दवा का परीक्षण ईबोला, सार्स, मर्स आदि सभी वायरस संक्रमण पर किया – लेकिन कोई ऐसा प्रमाण पेश नहीं कर सकी कि इसे लाइसेंस दिया जाए। और अब, कोरोना वायरस के इलाज के लिए इसे आपातकालीन लाइसेंस दे दिया गया है। तो क्या, अपने अविष्कार के एक दशक के बाद, एक दवा को अपनी बीमारी मिल गई है?

लेकिन दरअसल इस दवा से जुड़े सवाल सिर्फ दवा और उसके आपके शरीर या बीमारी पर असर भर के नहीं हैं। मामला ग्लोबल इकॉनमी का भी है, जहां अब अमेरिका सुपरपावर नहीं रहा है। शक़ की स्थिति कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट यानी कि किसी ख़ास पूंजीपति को लाभ पहुंचाने में भी है – ये कहानी हम आपको आगे बताते हैं।

इस दवा का अब तक कोई औपचारिक मकसद नहीं सिद्ध हुआ था

जिस कंपनी पर केस किया, उसी पर इतना भरोसा 

7 नवंबर, 2019 यानी कि ठीक 6 महीने पहले ही अमेरिकी सरकार ने इसी कम्पनी गिलीड साइंसेज़ पर मुकदमा किया था। ये मुकदमा इस कंपनी और फेडरल सरकार के बीच हुए एचआईवी उन्मूलन कार्यक्रम पर कांट्रैक्ट को लेकर था। सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज़ का आरोप था कि गिलीड साइंसेज़, एक ऐसी दवा को मनमानी कीमत पर बाज़ार में बेच रही है – जिसके अविष्कार और विकास में लाखों टैक्स पेयर्स का सरकारी फंड का पैसा लगा है। इस दवा का नाम है ट्रुवाडा और इसे गिलीड साइंसेज़ के अब तक के इतिहास की सबसे अहम दवा माना जा रहा था। मज़े की बात ये है कि केवल 2 हफ्ते पहले ही गिलीड साइंसेज़ ने भी सरकार के ख़िलाफ़ कांट्रेक्ट के उल्लंघन का केस दायर कर दिया है। जबकि सरकार की ओर से फिलहाल इस केस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया साफ नहीं है, जो एक सरकारी फंड की मदद से बनी दवा को महंगे दाम पर बेचने का गंभीर मामला था।

जिस पर मामला, उसी पर मीटिंग में बलिहारी ट्रम्प

मज़ेदार बात ये है कि जिस कंपनी पर एचआईवी की दवा को लेकर, ट्रम्प सरकार केस दायर करती है – उसी के सीईओ से कोरोना टास्क फोर्स के साथ फार्मा कंपनियों की बैठक में, मार्च 2020 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, सबसे ज़्यादा दोस्ताना ही नहीं दिखते। एड्स नियंत्रण और उन्मूलन को लेकर वह उसी बैठक में डेनियल ओ’डे जो कि गिलीड साइंसेज़ के सीईओ हैं, उनसे ट्रम्प देश में एचआईवी उन्मूलन को लेकर चर्चा करते हैं और उनकी तारीफ करते हैं कि इसी कंपनी के साथ मिलकर अमेरिका से वो एचआईवी को ख़त्म कर देंगे। इसका बातचीत का पूरा ब्यौरा व्हाइट हाउस की ओर से सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है। अद्भुत ये है कि अभी भी गिलीड साइंसेज़ का दावा है कि ट्रुवाडा पर अमेरिकी सरकार का पेटेंट अवैध है।

इसी बैठक में तैयार हो गई थी, इस दवा को मंज़ूरी की रूपरेखा?

इसी बैठक में डोनाल्ड ट्रम्प (हालांकि सबसे ज़्यादा संवाद वो गिलीड के सीईओ से ही करते हैं), गिलीड के सीईओ से पूछते हैं कि क्या वो किसी दवा पर काम कर रहे हैं? इसके जवाब में डेनियल ओ’डे (गिलीड के सीईओ) कहते हैं, “हमारे पास एक दवा है, हम उसका टेस्ट कर रहे हैं। कई क्लीनिकल ट्रायल हो गए हैं, बस अंतिम चरण बाकी है” ट्रम्प इस पर हैरानी जताते हैं कि क्या उनके पास पहले से दवा है? इसके जवाब में डेनियल हामी भरते हैं और ट्रम्प कहते हैं कि फिर कल से बाज़ार में इसे आ जाना चाहिए। इसको बड़े पैमाने पर वो कब तक बना सकते हैं? (स्रोत – व्हाइट हाउस) इसके जवाब में डेनियल ओ’डे कहते हैं कि अप्रैल के अंत तक ये परीक्षण पूरे हो जाएंगे। हालांकि हैरानी की बात ये होनी चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति को इस बात पर हैरानी होना, हैरानी की बात है – क्योंकि बिना सरकारी अनुमति और राष्ट्रपति या टास्क फोर्स की जानकारी के, सरकारी विभागों के साथ मिलकर रेमडेसिवर के परीक्षण हो ही नहीं सकते थे। ख़ैर, ये बातचीत भविष्यदृष्टा साबित हुई, 1 मई को ही रेमडेसिवर को आपातकालीन लाइसेंस मिल गया। इसके बाद डेनियल ओ’डे ने सरकार और क्लीनिकल ट्रायल्स में सरकारी सहयोग के लिए आभार प्रकट किया। दुनिया में धूम मचने लगी थी।

ऑफिस ऑफ प्रॉफिट – पद का लाभ – कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट

जिसे भारत में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट कहते हैं, उसको अमेरिकी प्रशासन में कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट के नाम से ज़्यादा जाना जाता है। अब सवाल ये है कि आखिर इस मामले में कोई कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट था कि नहीं। यानी कि क्या ट्रम्प प्रशासन के अंदर कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद था, जो गिलीड साइंसेज़ का लाभार्थी, करीबी या भागीदार रहा हो। मज़ेदार बात ये है कि ये कोई राज़ भी नहीं है, हालांकि अभी इसके बारे में ख़ास बात नहीं हो रही है। डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद से, लगातार अपने व्हाइट हाउस के करीबी स्टाफ में अतीत में फार्मा सेक्टर से जुड़े लोगों की वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति की है। इसमें एक नाम है जोसेफ ग्रेगॉन का, जो इस समय ट्रम्प प्रशासन के सबसे प्रभावशाली लोगों में से हैं। वो डोनाल्ड ट्र्म्प के डोमेस्टिक पॉलिसी काउंसिल यानी कि घरेलू नीति समूह के डायरेक्टर हैं, उनको जनवरी, 2020 में कोरोना वायरस टास्क फोर्स में शामिल किया गया और अब 24 अप्रैल को उन्होंने ट्रम्प प्रशासन से इस्तीफ़ा दे दिया है। 24 मई उनका ट्रम्प सरकार में आख़िरी दिन होगा। तो इसमें ऑफिस ऑफ प्रॉफिट या एथिकल कन्फ्लिक्ट या कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट क्या है? तो हम आपको बताना चाहते हैं कि ट्रम्प प्रशासन का हिस्सा बनने के ठीक पहले ग्रेग़ॉन क्या कर रहे थे…वे एक बड़ी फार्मा कंपनी के आधिकारिक लॉबीइस्ट थे, जिसका नाम था – गिलीड साइंसेज़। उम्मीद है कि आप अब तक इस कंपनी का नाम पहचान चुके होंगे।

जोसेफ ग्रेगॉन – ट्रम्प प्रशासन की एक बैठक में

जोसेफ ग्रेगॉन – प्यार से लोग इन्हें जो ग्रेगॉन बुलाते हैं

जोसेफ ग्रेगॉन या सरकारी और सार्वजनिक हलकों में ‘जो’ के नाम से पुकारे जाने वाला ये फार्मा लॉबीइस्ट जितनी जल्दी प्रशासन में ऊपर चढ़ा है, कम ही लोग चढ़ते हैं। 2017 में इनको ट्रम्प प्रशासन ने ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट में हेल्थकेयर अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया। इसके ठीक पहले ये इस दवा रेमडेसिवर को बनाने वाली कंपनी गिलीड साइंसेज़ के लॉबीइस्ट के तौर पर काम कर रहे थे। ट्रम्प प्रशासन में आने के बाद, इनको ज़िम्मेदारी मिली दवाओं के मूल्य तय करने वाली काउंसिल की। इस नियुक्ति और रेमडेसिवर को मंज़ूरी मिलने के बीच में काफी कुछ हो चुका था। ग्रेगॉन को लेकर कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट के गंभीर आरोप लगाए जा चुके थे और बाक़ायदा इनके ख़िलाफ़ जांच की मांग की जा रही थी। ये मामला भी गिलीड साइंसेज़ से ही जुड़ा हुआ। इस मामले में ग्रेगॉन की ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के एसोसिएट डायरेक्टर रहते हुए, कैंसर के इलाज को लेकर नीतियों के ज़रिए अपने पूर्व नियोक्ता गिलीड साइंसेज़ को फ़ायदा पहुंचाने का आरोप ही नहीं था – ये आरोप भी था कि उन्होंने कंपनी से अपने रिश्तों को लेकर सार्वजनिक जानकारी देर में दायर की, जिसको दरअसल ख़ुद ट्रम्प प्रशासन के बनाए नियमों के मुताबिक ऑफिस ज्वाइन करते ही किया जाना चाहिए था। मामले की शिकायत पब्लिक सिटीज़न नाम की एक उपभोक्ता अधिकारों की पैरोकारी करने वाली ग़ैर सरकारी – नॉन प्रॉफिट संस्था ने ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के एथिक्स ऑफिसर से की। इस शिकायत में ग्रेगॉन पर पद का लाभ गिलीड को पहुंचाने का शक़ जताया गया था। इस बारे में हम इस स्टोरी के भाग 2 में विस्तार से बात करेंगे।

मार्च से गिलीड के शेयर्स की बढ़त

ग्रेगॉन का कद बढ़ा, गिलीड के शेयर?

हालांकि ये बिल्कुल प्रत्यक्ष तो नहीं, लेकिन सारा खेल बेहद दिलचस्प है। एक ओर जनवरी 2019 के बाद जोसेफ ग्रेगॉन का ऐसे आरोपों के बावजूद प्रमोशन कर दिया जाता है। वे ट्रम्प की डोमेस्टिक पॉलिसी काउंसिल के डायरेक्टर बना दिए जाते हैं। कहा जाता है कि उनके आने के बाद, इस दफ्तर का कद अचानक से बहुत बड़ा हो गया है। उधर ट्रम्प सरकार का ही हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज़ विभाग, गिलीड साइंसेज़ के ख़िलाफ़, 2019 के बीतते-बीतते केस दर्ज कराता है। गिलीड साइंसेज़ की ओर से भी इसका करारा विरोध होता दिखता है। जनवरी 2020 में व्हाइट हाउस कोरोना टास्क फोर्ल में जोसेफ ग्रेगॉन को एंट्री मिलती है और मार्च में डोनाल्ड ट्रम्प कोरोना के इलाज को लेकर की जा रही बैठक में गिलीड के सीईओ से दोस्ताना से भी कुछ ज़्यादा बर्ताव करते सुनाई देते हैं। इस बीच गिलीड साइंसेज़ के नीचे गिरते शेयर के दाम, मार्च में ऊपर उठने लगते हैं और अप्रैल के बाद से लगातार ऊपर उठते हैं। 1 मई को रेमडेसिवर को इस्तेमाल करने का एलान हो जाता है और गिलीड के शेयर के दाम, अब धीरे-धीरे वहां आ रहे हैं, जहां इस वक़्त में कोई भी कंपनी चाहेगी। 

राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ ग्रेगॉन

ग्रेगॉन और गिलीड और कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट?

तो क्या ये दरअसल किसी तरह के एथिकल करप्शन का मामला है? क्या ये ऑफिस ऑफ प्रॉफिट या कन्फ्लिट ऑफ इंटरेस्ट का मामला है कि जोसेफ ग्रेगॉन को हेल्थकेयर की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है, जबकि वे एक फार्मा कंपनी के लॉबीइस़्ट रहे हैं और वे इसको सार्वजनिक तौर पर भी देर में ही स्वीकारते हैं? अमेरिकी पत्रकार शेरॉन लर्नर से एक लेख के लिए बातचीत में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सा और बायोएथिक्स के प्रोफेसर रॉबर्ट क्लिट्ज़मैन कहते हैं, “हां, ये कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का सीधा मामला है। गिलीड इसके ज़रिए सरकारी प्रस्तावों और अनुरोधों का मसौदा अपने मनमाफ़िक डिज़ाइन करवा सकती है, जिससे उसको अवैध फ़ायदा मिले…”

ग्रेगॉन का इस्तीफ़ा, वो भी संकट के समय में?

लेकिन राष्ट्रपति के चहेते, जोसेफ ग्रेगॉन इस्तीफ़ा दे देते हैं, सिर्फ डोमेस्टिक पॉलिसी काउंसिल से ही नहीं, ट्रम्प प्रशासन से भी। उनके इस्तीफ़े के पीछे की कोई वजह नहीं पता, न ही उनका किसी तरह का राष्ट्रपति और उनके ऑफिस में मनमुटाव ही दिखाई देता है। लेकिन उनके इस्तीफ़े का वक़्त एक घटनाक्रम से मेल खाता है, उनका इस्तीफ़ा लगभग उसी वक़्त आता है, जब गिलीड साइंसेज़, अमेरिकी सरकार के ख़िलाफ़ इसी अप्रैल 2020 में एक केस फाइल करती है। ये केस 2019 के नवंबर में उसके ख़िलाफ़ फाइल किए गए केस के जवाब में होता है। इसके 1 हफ्ते के अंदर गिलीड को एक अन्य दवा के लिए एफडीए का आपातकालीन लाइसेंस मिलता है और उसी समय ग्रेगॉन के ट्रम्प के दफ्तर में काम करने की आख़िरी तारीख सामने होती है, 24 मई…यानी कि कोरोना संकट के बीच…

हालांकि ये नहीं पता कि ग्रेगॉन अब क्या करने वाले हैं, लेकिन सरकारी दफ्तरों से निकल कर, बड़ी कंपनियों को ज्वाइन करने वाले या वहां से कोई बड़ा पद तोहफ़े में मिलने की कहानियां पुरानी नहीं हुई हैं।

कहानी अभी जारी है…शेष अगली किस्त में

(इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रियाएं हमको mediavigilindia@gmail.com पर भेजें)

Disclaimer –इस रिपोर्ट का मकसद किसी भी तरह ये दावा करना नहीं है कि ये दवा कारगर है या नहीं। लेकिन सिर्फ वो तथ्य साझा करना है, जो इसको बनाने वाली कंपनी, इस दवा, इस कंपनी के अन्य मामलों और सीधे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दफ्तर में एक ऊंचे ओहदे पर बैठे आदमी के बारे में हमको मिले..


हमारी ख़बरें Telegram पर पाने के लिए हमारी ब्रॉडकास्ट सूची में, नीचे दिए गए लिंक के ज़रिए आप शामिल हो सकते हैं। ये एक आसान तरीका है, जिससे आप लगातार अपने मोबाइल पर हमारी ख़बरें पा सकते हैं।  

इस लिंक पर क्लिक करें
प्रिय साथियों,
हम सब कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहे हैं और अपने घरों में बंद रहने को मज़बूर हैं। इस आसन्न संकट ने समाज की गैर-बराबरी को भी सतह पर ला दिया है। पूरे देश में जगह-जगह मज़दूर फंसे हुए हैं। पहले उन्हें पैदल हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हुए अपने गांव की ओर बढ़ते देखा गया था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले ही चौपट हो चुकी है, फसलें खेतों में खड़ी सड़ रही हैं। लेकिन लॉकडाउन के कारण दूर दराज के इलाकों से कोई ग्राउंड रिपोर्ट्स नहीं आ पा रहीं। सत्ता को साष्टांग मीडिया को तो फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन हम चाहते हैं कि मुश्किलों का सामना कर रहा ग्रामीण भारत बहस के केंद्र में होना चाहिए। 
हमारी अपील आप लेखकों, पत्रकारों और सजग नागरिकों से है कि अपने-अपने गांवों में लोगों से बात करें, हर समुदाय की स्थितियां देखें और जो समझ आये उसकी रिपोर्ट बनाकर हमें mediavigilindia@gmail.com भेजें। कोशिश करें कि मोबाइल फोन से गांव की तस्वीरें खींचकर भी भेजें। इन रिपोर्ट्स को हम अपने फेसबुक पेज़ पर साझा करेंगे और जो रिपोर्ट्स हमें बेहतर लगेंगी उन्हें मीडिया विजिल की वेबसाइट पर भी जगह दी जायेगी। 

 


मीडिया विजिल जनता के दम पर चलने वाली वेबसाइट है। आज़ाद पत्रकारिता दमदार हो सके, इसलिए दिल खोलकर मदद कीजिए। अपनी पसंद की राशि पर क्लिक करके मीडिया विजिल ट्रस्ट के अकाउंट में सीधे आर्थिक मदद भेजें।

Related



मीडिया विजिल से जुड़ने के लिए शुक्रिया। जनता के सहयोग से जनता का मीडिया बनाने के अभियान में कृपया हमारी आर्थिक मदद करें।