मध्यप्रदेश: कोरोना ने छीने माँ-बाप… दस्तावेज़ नहीं तो पाँच अनाथ बच्चों को सरकारी मदद भी नही!

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कोरोना महामारी में होने वाली मौतों का तांडव कोई भूल नहीं सकता। इस दौरान ऑक्सीजन की कमी से अंगीनग अमीर – गरीब सभी लोगों की मौतें, श्मशान घाट के बाहर लाशों की कतारें, समंदर में तैरती लाशें, हॉस्पिटल में एक बेड पर ऑक्सीजन की कमी से तड़पते हुए 3 -3 मरीज़। कोरोना की दूसरी लहर ने न जाने कितनों के घर बर्बाद कर दिए। किसी मां ने अपने बेटे को खोया, तो किसी बेटी ने अपने मां बाप को, इसी तरह की कुछ भावुक तस्वीरें उन समय वायरल हुई, जैसे की एक बेसहारा मां रिक्शे पर अपने बेटे की लाश लेकर जा रही थी, एक बेटी ऑक्सीजन ना मिलने पर अपनी कोरोना संक्रमित मां को मुंह से ऑक्सीजन दे रही थी।

लेकिन बहुत से मामले ऐसे भी है जो उस समय तो खबरों में नही आए, लेकिन अब उनकी परेशानियों के कारण लोगो का ध्यान उनपर जा रहा है। मध्य प्रदेश में 5 बच्चे दूसरी लहर की तबाही में अनाथ हो गए और अब बिना मां-बाप के जी रहे हैं। बेसहारा 5 भाई-बहन अब जिंदगी गुजार ने के लिए सरकारी योजनाओं का सहारा देख रेह हैं।

अनाथ बच्चों के नसीब में श्मशान और भीख

मध्य प्रदेश के अमाहा गांव के अंदर एक टूटी-फूटी झोपड़ी ही इन बच्चों का सहारा है। दुख की बात यह है की जब बारिश आती है तो इन्हे पास के श्मशान घाट में जाकर रहना पड़ता हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की बच्चे श्मशान जैसी जगहों पर जाने से भी डरते है, लेकिन मजबूरी इसी का नाम है की जब कठिन परिस्थियां आए और खाने को भी कुछ न ही तो भीख मांग कर गुजरा करना पड़े, जी हां…इन मासूमों को खाने के लिए भीख तक मांगनी पड़ी है। इन पांचों भाई बहन में सबसे बड़े वाले की उम्र ही 7 साल है और सबसे छोटा वाला महीने का है। बाकी तीन लड़कियां है जिनकी उम्र 5-6 साल के आस पास है।

नहीं मिल पा रही है सरकारी मदद..

गांव में इन बच्चों के पड़ोसी कुछ मदद कर देते हैं लेकिन यहां पर भी बात वही है कि कोई कितने दिन मदद करेगा? कभी पड़ोसियों ने मदद कर दी तो कभी बच्चों को पेट भरने के लिए भीख का सहारा लिया, ऐसे में इन बच्चों को सरकारी योजनाओं का ही सहारा है लेकिन वह भी इन्हें मिल नहीं रही है। क्योंकि इनके पास वैलिड पहचान पत्र नहीं है। गांव की पंचायत के एक सदस्य ने समाचार एजेंसी को यह बात बताई।

इन पांच बच्चों के पिता का नाम राघवेंद्र बाल्मिकी था और वह रिक्शा चलाने का काम करता था। लेकिन कोरोना की चपेट में आने से वह बच नहीं सके। वहीं बच्चों की मां मई के महीने में वायरस की चपेट में आ गई और उनकी मौत हो गई। जिसके बाद मासूमों का कोई सहारा नहीं बचा। कहने को तो बच्चों के दादा है लेकिन वह उनके साथ रहते नहीं हैं। हाल ही में गांव के पास एक कार्यक्रम में आए विधायक गोविंद सिंह ने कहा था कि वह बच्चों की मदद करेंगे और उन्हें शेल्टर उपलब्ध कराएंगे। लेकिन अब तक मासूमों के लिए कोई मदद तो नही आई है।

 

ऐसे बच्चों तक कैसे पहुंचेगी सरकार?

हालांकि, 16 अगस्त को ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से COVID-19 के कारण जो भी मौतें हुई उनके परिजनों की सहायता के लिए मुआवज़ा देने के दिशानिर्देश जल्द तैयार करने और मुआवजे की रकम तय करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन यहां पर सवाल यह है की ऐसे जितने भी मासूम बच्चे है जिनके पास सही दस्तावेज़ मौजूद नहीं है उनकी मदद कैसे की जाएगी? यकीनन देश का यह सिर्फ एक ही मामला नहीं होगा, ऐसे और भी मासूम होंगे जिन्होंने कोरोना काल में अपने माता-पिता को खोया है और अब बेसहारा है उन तक सरकार कैसे पहुंचेगी? यह एक अहम सवाल है क्योंकि यह बच्चे खुद तो सरकार से मदद मांगने आ नहीं सकते।


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