कोविड वैक्सीन का एक ही विकल्प है- वेंटिलेटर!

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सत्या सागर

 

“मैं इस सप्ताह कोविड का टीका लगवाने की योजना बना रहा हूं”, मैंने अपने एक प्रिय जर्मन मित्र को एक दिन फोन पर कहा।

“नहीं, ऐसा मत करना!’’ उसकी प्रतिक्रिया तुरन्त आई।

“क्यों?’’ मैंने पूछा।

“वे तुम्हारी रक्तधरा में ‘नैनोबाॅट्स(Nanobots)  (बहुत सूक्ष्म रोबाॅट, जिससे कोई भी कार्य करवाया जा सकता है) घुसा देंगे” उसने बहुत निष्कपट ढंग से, और मेरी बेहतरी की वास्तविक चिंता से कहा।

मुझे तुरन्त एहसास हो गया कि मैं एक ऐसे व्यक्ति से बात कर रहा था, जिसके बारे में मुझे लगता था मैं भली भांति जानता हूं, पर, ज़ाहिर है, ऐसा न था। मैंने कठोर अनुभव से यह भी समझा कि वह जो काल्पनिक कहानी सुना रहा था, उसका मुकाबला तथ्यों से नहीं किया जा सकता-मुझे अपनी कल्पना के घोड़े को उससे भी तेज़ दौड़ना होगा। “वाह, नैनोबाॅट्स तो काफी मस्त लगते हैं! अभी तो मेरे पास एक भी नहीं है। मुझे ऐतराज़ नहीं होगा यदि कुछ मेरे अंदर आ जाएं”, मैंने कहा।

“पागल हो क्या? उनका प्रयोग तुम्हें जीवनपर्यन्त नियंत्रित करने के लिये किया जाएगा,”उसने कहा।

मैं आजकल पूरी तरह काबू से बाहर हूं और मुझे निर्देशित करने वाले नैनोबाॅट्स का होना अच्छा ही रहेगा!’’ मैंने उत्साह के साथ कहा।

यह वार्तालाप तब समाप्त हुआ जब मैंने अपने मित्र से कहा कि दरअसल मैं वैक्सीन के लिए इसलिए इच्छुक था कि मैंने वाॅट्सऐप में पढ़ा था कि उससे मुझे अपने बाल वापस उगाने में मदद मिलेगी!

मुझे मालूम है कि यह सब ऐसा सुनाई पड़ रहा है जैसे कि मैं किसी का इसलिए मज़ाक उड़ा रहा हूं कि वह वैक्सीन को लेकर संशय पालता है और षडयंत्र-सिद्धान्तकार भी है। आइये हम स्पष्ट कर दें-मैं ऐसा व्यक्ति हूं जो हर किस्म के संशयकारियों के प्रति अत्यन्त सहानुभूतिपूर्ण रुख रखता है-इस बात से परे कि वे किस बात पर सवाल कर रहे हैं।

मैं सचमुच सोचता हूं कि जो लोग संशय करते हैं, वे मानवता की अधिक सेवा करते हैं, बजाए उनके जो अंधभक्ति में सबकुछ स्वीकार कर लेते हैं।

और, जब वैक्सीन की बात आती है, आपकी नसों में रहस्यमय पदार्थ वाले किसी अजीब द्रव्य को इंजेक्ट करने को लेकर संशय करना पूरी तरह न्यायसंगत है। एक आक्रामक प्रक्रिया और उससे संबंधित भय के अलावा बिग फार्मा द्वारा गोलियों और द्रव्यों में मिलावट करके भारी मुनाफा कमाने का रिकार्ड काफी लम्बा और घिनौना है।

60 के दशक के आरंभ के थैलिडोमाइड कांड से लेकर एक फ्रेंच फारमा कम्पनी पर हाल मंे लगे अभियोग-कि उसने जानबूझकर अपने वजन-घटाने वाली औषधि, मीडिएटर, को बाज़ार में लाया, जबकि उसके साइड-इफेक्ट के कारण मौत तक हो सकती थी-पैसों की भूखी दवा कम्पनियां सफेद झूठ बोलने से लेकर नरसंहार तक के दोषी पाई गई हैं। टीकों का इतिहास भी ऐसे कांडों से भरा पड़ा है, जिनमें सबसे कुख्यात था 1955 का कटर कांड, जब जनता को दिये गए पोलियों के टीकों के कुछ बैचों में जीवित पोलियो वायरस पाए गए थे। यह तब, जबकि वे आवश्यक सुरक्षा टेस्टिंग पार कर चुके थे। जांचों ने जहरीले वैक्सीन को ट्रेस किया तो वे एक खास कम्पनी के पाए गए-कटर लैब्स, और यह पाया गया कि 40,000 पोलियो केस हुए थे, जिनमें 200 बच्चों को अलग-अलग स्तर का लकवा हो चुका था और 10 बच्चे मर चुके थे। यद्यपि वैक्सीन को वापस ले लिया गया, इससे विश्व भर में अधिक कठोर वैक्सीन नियम लागू किया गया।

1976 में, जब स्वाइन फ्लू का प्रकोप आया था, यूएस में तकरीबन 4 करोड़ लोगों को टीका दिया गया था। बाद में पता चला कि ये एक गिलेन बार सिंड्रोम ( Guillain Barrè Syndrome or GBS), एक गंभीर न्यूरोलाॅजिकल बीमारी के बढ़े हुए खतरे के लिए जिम्मेदार थे। इस खुलासे के बाद टीकाकरण तुरंत रोक दिया गया।

आधुनिक औषधि शास्त्र के विकास में, अक्षमता ही एकमात्र समस्या नहीं रही, यद्यपि उसे जानबूझकर धोखाधड़ी और नस्लभेद के साथ ‘विज्ञान’ के रूप में परोसा गया। जबकि फारमास्यिुटिकल उतपादों के विकास के लिए बहुत से नियम-कानून बने हैं, काफी सारा शोध तो बिना सहमति के होता है, बिना निगरानी के और बिना उन लोगों को सज़ा के, जो साक्ष्यों को तोड़ते-मरोड़ते हैं।

इसलिये, यदि कोई कहता है कि वह टीका नहीं लेना चाहता है, वह भी, उस समय जब महामारी ज़ोरों पर थी, रिकार्ड स्पीड से निर्मित, और बिना उसकी अहानिकारकता को साबित करने के लिए दीर्घकालिक डाटा प्रस्तुत किये, मुझे उससे तुरंत सहानुभूति हो जाती है।

भले ही आप यह न मानें कि बिल गेट्स पूरे ग्रह को ‘रीसेट’ करने जा रहा है, आपके पास पूरा अधिकार है कि आप इस बात की चिंता करें कि टीका आपको अब से पांच साल में क्या नुक्सान पहुंचाएगा।

मुझे यह भी लगता है कि वैक्सीन पर शंका करने वालों को किसी भी तरह से तंग करना बहुत ही बेहूदा बात है, और उसकी अभिव्यक्ति की आज़ादी व स्वतंत्र ढंग से जीने के बुनियादी अधिकार का हनन है। उनकी पसंद- नापसंद का सम्मान किया जाना चाहिये और किसी भी व्यक्ति को, जो टीका नहीं लेना चाहता है, ज़बरदस्ती टीका नहीं लगाना चाहिये। (मास्क न लगाने वालों की श्रेणी पूर्णतया भिन्न है, क्योंकि वे औरों के लिये खतरा पैदा कर सकते हैं।)

जो लोग वैक्सीन-शंकालु हैं, उनसे मुझे एक ही समस्या है, वह यह कि उनमें से अधिकतर मेरे मित्र हैं, और मैं उनकी हिफ़ाज़त को लेकर चिंतित हूं। उनके लिए मेरा सिर्फ एक सवाल है-जबकि औषधियों और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक स्वस्थ संशय ठीक है, क्यों हम यही शंका उन ढेर सारी गतिविधियों के बारे में नहीं रखते, जिनमें हम रोज़ हिस्सा लेते हैं?

क्या इतनी अधिक सावधानी को केवल टीका और औषधियों तक सीमित रखना चाहिये? या फिर इसे हर उस चीज़ पर लागू किया जाना चाहिये जो हम अपने शरीर के भीतर लेते हैं और जो तनिक भी हानि पहुंचा सकती है? यदि हम इस दृष्टिकोण को अपनाएं, तो क्या हमें खाद्य पदार्थों, हवा, पानी आदि की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लागाना पड़ेगा, जिसका सेवन हम रोज़ करते हैं, बिना यह सोचे कि उसमें क्या है और वह हम पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं?

यदि किसी को हर उस पदार्थ का, जो हम लेते हैं, और हर बार जो हम लेते हैं, सचमुच एक पक्का हानि-लाभ यानि रिस्क-बेनिफिट विश्लेषण करना हो, तो मुझे शक है कि हम कुछ भी खा-पी सकेंगे। हम सब, और हममें वैक्सीन शंकालु भी शामिल हैं, हर समय ऐसे निर्णय लेते रहते हैं जो अपूर्ण सूचनाओं पर आधारित होते हैं क्योंकि वह हमारे अस्तित्व के स्वभाव में अंतरनिहित होते हैं।

उदाहरण के लिए, अब तक मैंने नहीं सुना है कि वैक्सीन-शंकालू  इस ग्रह पर ‘नाश्ता खाने की दुविधा(breakfast hesitancy) या ‘सांस लेने की दुविधा’ (breathing hesitancy) प्रकट कर रहे हों, और इसकी वजह से विलुप्त हो जाएं। जरूर कुछ लोग अन्य लोगों के बनिस्पत अधिक मीन-मेख करते हैं, पर अंत में वे जीवन में आगे बढ़ते रहते हैं-सांस लते हुए और अपना पैक किया हुआ नाश्ता खाते हुए।

तो यहां जो सोच काम करती है, वह है सापेक्षिक खतरा यानि रिलेटिव रिस्क। जब जीवन में हर कुछ अपने खतरों के साथ आता है, असली चाॅयस तो उपलब्ध विकल्पों की तुलना करके और खतरे का स्तर देखकर ही किये जाते हैं।

एक और उदाहरण दें।

जब कोई भूखा शेर पीछा करे तो द्वन्द्व कैसे रह सकता है कि पेड़ पर तेजी से चढ़ जाएं या पेड़ की छांह तले खड़े होकर विचार करें कि पेड़ से क्या-क्या खतरे हो सकते हैं। ऐसी दुविधा करेंगे, तो शेर या किस्मत हमें छोड़ने वाले नहीं।

अंतिम निष्कर्ष यही निकलता है कि जो कुछ हम झेलते हैं या करते हैं, उसपर हम अंतहीन प्रश्नों की बौछार नहीं कर सकते। ऐसे तो कुछ भी नहीं किया जा सकता, तो हमें प्राथमिकताएं तय करनी होंगी-यह देखते हुए कि क्या संभव है और क्या नहीं।

हम समस्त साधारण मनुष्यों के लिए, जो समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या कुछ हो रहा है, कोविड महामारी एक द्वन्द्व पैदा करती है। हां, विश्व की जनसंखा को आधा कर देने की यह एक राक्षसी साजिश का हिस्सा हो सकता है।

सच, यह संभावना भी है कि कोविड वैक्सीन में  डीएनए परिवर्तित करने वाले एन्ज़रइम भरे हों, और जिन्होंने वैक्सीन लिया, कुछ सालों में उनके सिर पर सींगें उग आएं!

दीर्घकालिक तौर पर वैक्सीन कितना सुरक्षित है, यही असली मुद्दा बनेगा। और मेरे पास उक्त तमाम सिद्धान्तों को ठोस ढंग से गलत साबित करने का न कोई साधन है न प्रमाण।

आधिकारिक रूप से मैं जो जानता हूं वह यह है कि पिछले डेढ़ सालों में मैंने महामारी के कारण कई दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को खो दिया-जो आज ज़िन्दा होते, यदि यह मनहूस वाइरस न होता। जब पूरे विश्व में दसियों लाख लोगों की जानें गईं, बहुत लोग मेरे जैसा ही अनुभव साझा करेंगे। जो लोग कोविड संक्रमण से बचकर निकल भी आए, उनके जीवन की गुणवत्ता निश्चित ही घट गई है-‘‘लाॅन्ग कोविड” (long Covid) की वजह से, जो एक काफी भयानक  परिघटना है और कम ही समझी गई है।

इसके बरखिलाफ, मैं अबतक ऐसे किसी को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता, जो कोविड वैक्सीन से मरा हो। मैं कइयों को जानता हूं जिन्होंने विभिन्न वैक्सीनों के पूरे कोर्स लिये हैं और वे सही सलामत हैं। और ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिससे लगे कि वे निकट भविष्य में ठीक नहीं रहेंगे।

वैक्सीन लेना उसी तरह है जैसा कि भारतीय सड़कों पर दुपहिया गाड़ी चलाते समय हेल्मेट पहनना। वह आपको दुर्घटना से तो नहीं बचाएगा, न ही वह आपको तब बचा सकेगा जब आपको ट्रक ने मार दिया हो। पर यही एक सुरक्षा का उपाय है, यदि हमारा नर्म सिर किसी साधारण दुर्घटना में चोट खा जाए।

तो वैक्सीन न ही किसी बुरे षडयंत्र का हिस्सा है न ही कि कोई जादुई द्रव्य। यह अपके मास्क पहनने और सामाजिक दूरी बनाए रखने के साथ एक और सुरक्षा कवच है। यह अल्पकालिक तौर पर कोविड के एक बड़े झटके के असर को कम करने में आपकी मदद कर सकता है। कोविड की कहानी में अब तक जो सरल परिस्थितिजन्य साक्ष्य मिलते हैं, वे मेरे वैक्सीन लेने के लिए काफी हैं, क्योंकि कोविड संक्रमित हो जाने की तुलना में इसके खतरे नगण्य हैं।

दुर्भाग्य की बात यह है कि वर्तमान समय में वैक्सीन का एक ही विकल्प दिखाई पड़ता है-वेंटिलेटर। अब क्यों कोई अपने जीवन की पूरी कमाई को किसी काॅरपोरेट अस्पताल को यूं   ही दे देना चाहेगा?

 

सत्या सागर एक पत्रकार और जन-स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं। उनसे  sagarnama@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। कोविड रिस्पाॅन्स वाॅच में यह लेख छप चुका है। अनुवाद कुमुदिनी पति का है।


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