बिना सुरक्षा किट, गली-गली वसूलो बिल! – बिहार सरकार का कैसा फ़रमान?

देवेश त्रिपाठी
Corona Published On :


नीतीश सरकार के एक आदेश के बाद, अब बिजली विभाग के कॉंट्रेक्ट कर्मियों की ज़िंदगी ही ख़तरे में आ गई है। एक सरकारी आदेश में ग्रामीण व शहरी उपभोक्ताओं से बिल वसूली शुरू करने का निर्देश जारी किए गए है। सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार द्वारा शासित बिहार को लेकर अभी तक ऐसी बातें सामने आती रही हैं कि राज्य में टेस्ट बेहद कम हो रहे हैं, तीव्रता लाने की बात तो बाद में की जायेगी। अभी तक बिहार में कोरोना संक्रमण के 148 मामले सामने आये हैं, जिसमें से 2 की मौत भी हुई है। स्थानीय जानकारों का कहना है कि आंकड़े इससे कहीं ज़्यादा निकलेंगे अगर जांच की व्यवस्था दुरुस्त की जाये। राज्य में जांच कम होने की वजह से उन लोगों में डर पसरा हुआ है, जिन्हें काम पर लौटना है। ऐसे में बिहार का बिजली विभाग कोरोना को लेकर संशय और डर के माहौल से घिरा हुआ है। 22 अप्रैल को जारी हुए सरकारी आदेश में कोरोना हॉटस्पॉट वाले इलाकों को छोड़कर ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से उपभोक्ताओं से राजस्व वसूली शुरू करने का निर्देश जारी किया गया है। आदेश में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आरआरएफ (रूरल रेवेन्यू फ्रेंचाइजी) और एजेंसी के मीटर रीडरों द्वारा ई-वॉलेट/वी-वॉलेट के माध्यम से राजस्व वसूली का काम शुरू करवाया जाये।

इस आदेश को लेकर विभाग के कर्मचारियों में डर बैठ गया है। विभाग के ही एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर मीडिया विजिल को बताया कि “जब सभी लोग कोरोना के चलते घर मे बंद होने को मजबूर हैं, काम-धंधे ठप हो गये हैं, मामले बढ़ रहे हैं और अभी कोई भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि लॉकडाउन कब ख़त्म होगा। ऐसे में लोग फ़िलहाल पैसे नहीं भरना चाहेंगे। अगर कुछ लोगों ने बिल भुगतान किया भी, तो भी यह घाटे का ही सौदा साबित होगा। आप गाड़ी करेंगे, पूरे क्षेत्र में दौरा करेंगे, मान लीजिये अगर 100 में 10-12 ने बिल भुगतान किया, तो भी घाटा सरकार का ही होगा, उससे ज़्यादा का तो तेल लग जायेगा। दूसरी तरफ़, कमीशन पर काम करने वाले कर्मचारी कोरोना का रिस्क लेकर काम भी करेंगे और उन्हें कुछ मिलेगा भी नहीं। सरकार की तरफ़ से कोरोना से बचाव के लिए साधन भी उपलब्ध नहीं कराये गये हैं।”

बेहद कम पारिश्रमिक में काम करते हैं बिल वसूली करने वाले आरआरएफ 

विभाग में कार्यरत एक वरिष्ठ इंजीनियर ने भी मीडिया विजिल को नाम न बताते हुए जानकारी दी कि “मीटर रीडर और बिल बांटने वाले एक आरआरएफ कर्मचारी को एक पंचायत दे दी जाती है, जिनमें औसतन 800 से 1500 तक उपभोक्ता होते हैं। एक बिल देने पर उन्हें महज 6.39 रुपये दिये जाते हैं। बिल बांटने वाले या वसूली करने वाले कर्मचारियों को खुले विज्ञापन के तहत आवेदन द्वारा संविदा पर रखा जाता है, और एक साल के बाद उनके काम की समीक्षा की जाती है। अगर कर्मचारी ने उपभोक्ता से 100 रुपये वसूले हैं, तो उसे 3 रुपये बतौर कमीशन दिये जाते हैं। वसूली के लिए एक पंचायत का चक्कर लगभग महीने भर में पूरा होता है। सबसे बेहतर वसूली कर लेने वाले आरआरएफ का भी पूरे महीने का कमीशन ज़्यादा से ज़्यादा 15-20 हज़ार का बन पाता है। अमूमन यह आरआरएफ कर्मचारी छोटे-मोटे काम करने वाले, मज़दूर या वो बेरोज़गार लोग होते हैं जो इन स्थितियों में भी इसलिए काम करते हैं ताकि गांव-समाज में बता पायें कि वे कुछ करते हैं। यह सब कोरोना को लेकर डरे हुए हैं।”

कोरोना की मार के बीच इन आरआरएफ कर्मचारियों को ग्रामीण क्षेत्रों में काम पर लगा दिया गया है। देश में जगह-जगह घट रही मारपीट की घटनाओं से उनमें इस बात का भी डर बैठा हुआ है कि कोरोना के माहौल में ग्रामीण लोग किस तरह का व्यवहार करेंगे इसका अंदाज़ा भी लगाना मुश्किल है, कहीं उनके साथ भी मारपीट न हो जाये। मतलब, कोरोना का रिस्क भी पालो, न्यायोचित पारिश्रमिक के बगैर काम करो और ऊपर से ‘सामाजिक दूरी’ के बदलते अर्थों के बीच मार खाने का डर भी बना रहे।

बिजली की लाइन ठीक करने वाले मिस्त्री-मज़दूर भी मुश्किल हालात में काम करने को मज़बूर

विभाग के ही एक अन्य कर्मचारी ने मीडिया विजिल से बातचीत में बताया कि “अक्सर बिजली की लाइन ख़राब हो जाती, तार टूट जाते हैं। मज़दूर-मिस्त्री को तो कभी-भी काम पर जाना पड़ता है। गर्मी शुरू हो गयी है और लोड बढ़ने की वजह से ज़्यादा फाल्ट आना शुरू हो जाता है, और मिस्त्रियों व लाइन बनाने वाले मज़दूरों को ठीक करने के लिए भागकर जाना पड़ता है। ये भी संविदा पर काम करते हैं और इन्हें 5-6 हज़ार ही महीने के पारिश्रमिक के रूप में दिया जाता है। एक तो पारिश्रमिक पहले ही बहुत कम है, वह भी कई बार 6-6 महीने तक लटका रहता है। कोरोना से संकट के बीच इन्हें सरकार की तरफ़ से मदद के नाम पर बस एक बार 10 किलो राशन बांट दिया गया था। सुरक्षा के साधन भी नहीं उपलब्ध करवाये गये।”

भारत मे कोरोना के केस तेज़ी से बढ़ रहे हैं और 3 मई तक लॉकडाउन लागू है। पूरे देश में चर्चा छिड़ी हुई है कि कोविड-19 की जांच तेज़ की जाये। वहीं, देश की बिगड़ी हुई आर्थिकी के चलते 20 अप्रैल से कुछ राज्यों में सरकारी-गैरसरकारी काम-काज को लेकर ढील दी जा रही है। बिहार भी इन राज्यों में शामिल है। ऐसे में इन कर्मचारियों को न केवल काम पर लौटने को कहा जा रहा है, बल्कि इनको किसी तरह का कोई प्रोटेक्टिव गीयर न देकर इन पर वसूली के लिए ज़बर्दस्ती करना, इनको जानते-बूझते कोरोना के मुंह में धकेलना है।


Related