म्यूटेशन का पता लगाने वाली जीनोम सीक्वेंसिंग में भारी कमी, जबकि डेल्टा का ख़तरा बरक़रार

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भारत में जीनोम सीक्वेंसिंग के जरिए कोरोना के नए-नए वैरिएंट की पहचान की जाती है। अब तक 72931 सैंपल की जीनोम सीक्वेंसिंग हुई है, जिनमें से 30230 में कोरोना के गंभीर वैरिएंट मिल चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा 20324 सैंपल में डेल्टा वैरिएंट मिला है। एक तरफ कोरोना वायरस में लगातार नए-नए म्यूटेशन हो रहे है। गंभीर वैरिएंट भारत सहित पूरी दुनिया में फैल रहे हैं। वहीं वायरस में म्यूटेशन के बाद जो नए वैरिएंट बन रहे है उसका पता लगाने के लिए एकमात्र विकल्प जीनोम सीक्वेंसिंग ही है लेकिन अब इसमें तेजी से गिरावट आ रही है।

राज्यों को इस नियम की परवाह नहीं..

दरअसल,नवंबर 2020 में जब जीनोम सीक्वेंसिंग शुरू हुई तो एक नियम बनाया गया कि हर राज्य से कम से कम 5% सैंपल की जांच जरूरी है। इस टेस्ट की शुरुआत हुए लगभग 8 महीने हो गए गाय है, लेकिन 8 महीने बाद भी किसी को इस नियम की परवाह नहीं है। बता दें की देश में 50 करोड़ से अधिक नमूनों (samples) का परीक्षण किया जा चुका है, लेकिन इतने सारे सैंपल में से जीनोम सीक्वेंसिंग की जांच एक लाख को भी पार नहीं कर पाई है।

जुलाई में सब से कम सीक्वेंसिंग..

जीनोम सीक्वेंसिंग जांच की स्थिति में गिरावट की बात करे तो अप्रैल-मई की तुलना में जुलाई में 95% कम सैंपल की सीक्वेसिंग हुई है। इन्साकॉग से के मुताबिक जब इस वर्ष अप्रैल में देश दूसरी लहर का सामना कर रहा था। तब से अब तक इस प्रकार सीक्वेंसिंग में गिरावट आई।

  • अप्रैल – 15,546 सैंपल की जीनोम सीक्वेसिंग हुई।
  • मई – 13,142 सैंपल की जीनोम सीक्वेसिंग हुई।
  • जून – 4381 सैंपल की जांच ही हुई।
  • जुलाई – 735 सैंपल की सीक्वेंसिंग।

जुलाई में हुए 735 सैंपल सीक्वेंसिंग में से 626 सैंपल में डेल्टा वैरिएंट मिला जिसे लेकर वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते आ रहे हैं।

जून व जुलाई में दिल्ली से कोई जांच नही..

अकेले दिल्ली की बात करे तो जून व जुलाई में दिल्ली से एक भी सैंपल की जीनोम सीक्वेसिंग नहीं हुई है। अब तक दिल्ली से आए मात्र 5353 सैंपल की ही सीक्वेसिंग हुई है। वहीं दिल्ली सरकार के अनुसार जुलाई तक 5752 सैंपल की जीनोम सीक्वेसिंग हो चुकी है, जिनमें से 1689 में डेल्टा वैरिएंट मिल चुका है।

महाराष्ट्र में डेल्टा वैरिएंट ज्यादा क्यों?

वहीं, देश में महाराष्ट्र अकेले सबसे अधिक 11 हजार से भी ज्यादा सैंपल की सीक्वेसिंग कराने वाला राज्य है। दूसरे स्थान पर केरल है जहां 8 हजार से अधिक सीक्वेसिंग हो चुकी है। इनके बाद अन्य सभी राज्यों की स्थिति बहुत ही कमजोर है। आंकड़ों को देखें को इससे साफ होता है की डेल्टा वैरिएंट के सबसे ज्यादा मामलों का पता महाराष्ट्र और केरल से इसी लिए आ रहे हैं क्योंकि सीक्वेसिंग टेस्ट भी यहां अब तक सबसे अधिक हुए हैं। वहीं इससे यह भी अंदाजा लगाया जा सकता की जिन राज्यों में डेल्टा वैरिएंट के मामले बिल्कुल नही हैं वहां सीक्वेसिंग जांच भी कमजोर होगी।


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