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संसद चर्चा : संसदीय बहस में 4D और ऑरवेल के एनिमल फार्म का हिंदू स्‍वप्‍न!

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राजेश कुमार

मामला बहुत पुराना नहीं है। केवल दो महीने बीते हैं, जब राज्यसभा ने सत्तारूढ गठबंधन के घटक जनता दल-यू के हरिवंश को उपाध्यक्ष चुना था और प्रधानमंत्री सदन में उन्हें इस निर्वाचन पर औपचारिक बधाई दे रहे थे।

कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से 2014 में पहली बार संसद पहुंचे हरिवंश ने एक कडे मुकाबले में विपक्ष के साझा उम्मीदवार कांग्रेस के बी.के. हरिप्रसाद को हरा दिया था और दोनों प्रतिद्वंद्वियों के नामों में ‘हरि’ की मौजूदगी ने अलंकार-चतुर प्रधानमंत्री की मेधा को पंख दे दिये थे। प्रधानमंत्री की शान में गुस्ताखी न माना जाये तो कह देना चाहिये कि आलंकारिक वाक्पटुता का अभ्यास बारहा कुतर्कों का आवरण होता है और अक्सर ‘‘मैं कहूंगा, मगर पहले मुझे पाने दो ऐसी भाषा, जिसके दो अर्थ न हों’’ के संकल्प से उलट, जिसका मूल हेतु ही सत्य को धुंधला करना होता है और ऐसी भाषा की तलाश भी जो द्विअर्थी हों। इसके अभ्यासी अक्सर असत्य और अतिकथन के उस्ताद होते हैं। चार-साढे चार साल की पिछली अवधि में प्रधानमंत्री की सैकडों जनसभाओं, रैलियों, रोड शो में ही नहीं, संसद के दोनों सदनों में उनके बमुश्किल दस-बारह संबोधनों में भी उनकी वाग्मिता में आप इस अलंकार-चातुर्य का करिश्मा लक्ष्य कर सकते हैं।

उस दिन हुआ केवल इतना था कि विपक्ष की मलामत करते हुये उन्होंने बी.के. का ऐसा उल्था किया कि राजद सदस्य मनोज झा के कडे एतराज पर अध्यक्ष वेंकैया नायडू को वह शब्द कार्यवाही से बाहर निकालना पडा था। संसद में तू-तू मैं-मैं, झडपें, विरोधियों के लिये अशोभन-असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल और कार्यवाहियों से इन्हें ‘एक्सपंज’ किये जाने की घटनायें पहले भी होती रही हैं, लेकिन आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी भी सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रधानमंत्री की किसी टिप्पणी को असंसदीय मानकर कार्यवाही से उसे ‘एक्सपंज’ करना पडा था।

दरअसल हमारी संसद पिछली करीब चौथाई सदी में शासन-प्रशासन के लिये कानून और विधान बनाने के दायित्व को छोड़ अपनी शेष दो निर्धारित जिम्मेदारियों से काफी दूर छिटक आयी है। राष्ट्रीय महत्व के और अवाम के हित के मुद्दों पर बहस और संवाद 1970 के दशक से ही पटरी से उतरने लगा था और भूमंडलीकरण के दौर ने तो संसद को मानो पूरी आर्थिक रीति-नीति के नये दौर-दौरे में एक बडी अड़चन ही मान लिया। नये निजाम में हुआ केवल यह कि पूंजी, मुनाफे और उससे नाभिनालबद्ध दलीय हित ने इस प्रक्रिया को शिखरों पर पहुंचा दिया है। संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के सबसे बडे अस्त्र को निस्तेज कर देने का जिक्र संसद चर्चा की इस श्रृंखला की पहली कड़ी में ही किया जा चुका है। याद कीजिये कि कैसे कावेरी विवाद और आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा देने जैसी कुछ मांगों को लेकर कुछ तटस्थ या सरकार समर्थक प्रादेशिक दलों के सदस्यों का ‘वेल’ में आ जमना और उनकी अनिच्छुक सी नारेबाजी को सदन में ‘व्यवस्था नहीं होना’ बता कर करीब महीने भर तक अविश्वास प्रस्तावों पर विचार और मतदान टाले रखा गया। मानना चाहिये कि भविष्य की कोई भी सरकार अल्पमत में आ जाने पर भी कुछ चुनिंदा सदस्यों और दलों के जरिये सदन में ऐसी अव्यवस्था निर्मित कर अविश्वास प्रस्तावों से बचने के इस नजीर का फायदा उठा सकेगी।

अब संसदीय चर्चाओं को सड़क की फ्रीस्टाइल बहसबाजियों में बदल देने के उपक्रम में शीर्ष नेतृत्व की संलिप्तता, जनहित के मुद्दों पर नीति-निर्माण में जन-प्रतिनिधियों की सामूहिक भागीदारी के संविधान-निर्माताओं के आह्वान का विध्वंस है। यह पक्ष और विपक्ष के बीच समझ, सहिष्णुता और शालीन पारस्परिकता की साझा शब्दावली के आत्यंतिक विलोप का संकेत है। अंग्रेजी उपन्यासकार जार्ज ऑरवेल ने सार्वजनिक भाषा के ध्वंस को या जिसे आम भाषा में वाक्पटुता, वाग्मिता आदि कहते हैं, को कहीं लोकतंत्र की असफलता, स्वतंत्रता के स्पेस का संकुचन, नागरिक कलह और कुल मिलाकर निरंकुश शासन के आगमन का भी संकेत बताया था।

विडम्बना यह कि दोनों सदनों में ‘एक्सपंक्शन के प्रावधानों’ के अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा क्या था, यह रिपोर्ट भी नहीं किया जा सकता। संवैधानिक व्यवस्था यह है कि जब तक संसद कानून बनाकर अपनी शक्तियों, विशेषाधिकारों और छूटों को परिभाषित नहीं कर देती है, तब तक ये शक्तियां, विशेषाधिकार और छूट वही होंगे, जो 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होते वक्त ब्रिटेन के हाउस आफ कामन्स, उसके सदस्यों और कमेटियों को उपलब्ध थे। संविधान का अनुच्छेद 105/3 संसद को और 194/3 राज्य विधानमंडलों को ऐसे कानून बनाने के अधिकार देता है लेकिन भारतीय संसद ने 68 साल बीत जाने के बाद भी अब तक ऐसा कानून बनाया नहीं है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होते वक्त तो सदन की बहसों और कार्यवाहियों की सच्ची और विश्वसनीय रिपोर्ट तक का प्रकाशन रोकना हाउस आफ कामन्स की शक्तियों और विशेषाधिकारों के अधीन था, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने 1958 में बहुमत से दिये गये एक फैसले में कह दिया था कि किसी सांसद के भाषण का कोई हिस्सा सदन की कार्यवाही से निकालने का आदेश देने का स्पीकर/पीठासीन अधिकारी का कानूनी अधिकार निहायत निरर्थक और गैर-जरूरी है। और बाद में संसदीय विशेषाधिकार पर हाउस आफ कॉमन्स की सेलेक्ट कमेटी ने सच्ची और विश्वसनीय रिपोर्ट तक का प्रकाशन रोकने की पुरानी रवायत छोडने का ऐलान कर 1958 के सुप्रीम कोर्ट के इस मंतव्य को भी अप्रासंगिक कर दिया। ऐसे में कह सकते हैं कि लोकसभा और राज्यसभा के स्पीकर, अध्यक्ष और पीठासीन अधिकारी दशकों से, कार्यवाही से किसी शब्द या हिस्से को निकालने और प्रेस को उनकी रिपोर्टिंग करने से रोकने तक की ऐसी विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल करते रहे हैं, जो उनके अधिकार-क्षेत्र में ही नहीं है। फिर भी संसद के दोनों सदनों में ‘एक्सपंकशन’ के अपने-अपने प्रावधान हैं और वे बाकायदा लागू हैं तो इसे परम्परा ही मानना चाहिये।

अलहदा तथ्य यह कि ‘एक्सपंक्शन’ की इस परम्परा के भी ध्वंस की चर्चाएं हैं।

मार्क्सवादी सीताराम येचुरी की मानें तो मामला साजिशी है और संसदीय कार्यवाही की रिकार्डिंग के तौर-तरीकों को संदिग्ध बनाता है। उन्होंने यह सवाल राज्यसभा के बारे में उठाया था। पिछले साल 11 अगस्त को मानसून सत्र की समाप्ति तक दो कार्यकाल उन्होंने वहीं बिताये थे और पिछले साल ही फरवरी में उन्होंने कहा था कि सदस्यों की, मोदी सरकार के प्रति आलोचनात्मक टिप्पणियां सदन की वेबसाइट पर पोस्टेड ‘वर्बेटिम या असंशोधित डीबेट’ में संपादित कर दी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि 6 फरवरी 2017 को वह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भाग ले रहे थे। संसद में यह उनका ऐसा भाषण था, जिसमें शायद सबसे कम टोकाटाकी हुई थी- न किसी ओर से कोई आपत्ति, न किसी असंसदीय शब्द के इस्तेमाल और ‘एक्सपंक्शन’ का चेयर का कोई फैसला। लेकिन उन्होंने सदन की वेबसाइट पर ‘वर्बेटिम डीबेट’ देखी तो पाया कि उनके भाषण के मूल पाठ से ‘डिसेप्शन’, ‘डिसरप्शन’, ‘डायवर्जन’ और ‘डायबोलिक एजेंडा’ जैसे वे शब्द लापता थे, जो नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना में कहे गये थे। अंग्रेजी के उनके भाषण में ये ‘फोर डी’ ही सरकार की उनकी आलोचना के ‘की वर्ड्स’ थे। ‘वर्बेटिम डीबेट’ में आज आप इसे देख सकते हैं- येचुरी ने अपने उस भाषण में भक्ति आंदोलन के प्रणेता रामानुजाचार्य और पंच-ककारों में कृपाण को ‘धर्म, जाति और पंथ के अत्याचार सहित तमाम किस्म के उत्पीडनों से गरीबों-वंचितों की रक्षा का अस्त्र बताने वाले सिखों के दसवें गुरू- गुरू गोबिंद सिंह- के उल्लेख को राष्ट्रपति और उनकी जुबान में पेश सरकार के अभिभाषण का ‘डिसेप्शन’, उसका छल बताया था। छल यह कि वैष्णव होने के कारण रामानुजाचार्य को गायब करवा देनेवाले चोल साम्राज्य के शैव मतावलंबी राजा कुलोटुंगा की तरह ‘अगर हमारा ईश्वर, आपका ईश्वर नहीं है, अगर आप हमसे सहमत नहीं हैं तो आप भारतीय नहीं हैं, आप देशभक्त नहीं हैं’ का सिद्धांत लागू कर रही सरकार सम्राट कुलोटुंगा का नहीं, रामानुजाचार्य का नामोल्लेख कर रही है। छल यह कि राष्ट्रपति अभिभाषण में, पिछले एक साल में दलितो-वंचितों के शोषण, दमन और उन पर अत्याचार में इजाफा बताते हैं और गुरू गोबिंद सिंह का नामोल्लेख भी।

दूसरा ‘डी’ – डिसरप्शन के मुतल्लिक था। वह नोटबंदी से देश में, देश की अर्थव्यवस्था में और अवाम के जीवन में पड़े सबसे बडे खलल, विशाल आबादी के रोटी-रोजगार की सबसे बड़ी तबाही, लगभग शत-प्रतिशत नकदी पर आधारित और कुल रोजगार का 80 प्रतिशत पैदा करने वाले अनौपचारिक क्षेत्र की बर्बादी, औपचारिक क्षेत्र में भी भारी गिरावट और ’जाब लॉस’ और लोगों की क्रय-शक्ति बढाने, घरेलू मांग प्रोत्साहित करने की आर्थिक सर्वेक्षण की तजवीज से उलट प्रत्यक्ष कर राजस्व कम कर सम्पन्न तबकों को राहत तथा अप्रत्यक्ष कर राजस्व बढाकर आम लोगों पर बोझ डालने की सरकार की नीति की आलोचना कर रहे थे। तीसरा ‘डी’ – डायवर्जन था, बालीवुड के मशहूर निर्देशक मनमोहन देसाई की तरह लोगों को शुरू से अंत तक लगातार ‘नॉन थिंकिंग मोड’ में रखने के लिये ‘एक जुमले से दूसरे, तीसरे, चौथे जुमले तक की अनंत कूद – उज्‍ज्‍वला, मुद्रा, जन-औषधि, फसल बीमा आदि जैसी 12 तो प्रधानमंत्री योजनाएं ही हैं। और इस सबका असली मकसद – चौथा ‘डी’- धर्मनिरपेक्ष भारत को धर्म आधारित हिन्दू राष्ट्र में बदलने की साजिश, संविधान शासित देश को धर्मशास्त्र संचालित देश बनाने का ‘डायबोलिक एजेंडा’।

राज्यसभा की वेबसाइट में वर्बेटिम डीबेट में ‘फोर डी’ की बहाली हो चुकी है, लेकिन यह बहाली तब हुई, जब उन्होंने पीठासीन अधिकारियों और राज्यसभा सचिवालय से अपने भाषण से ये शब्द और छह छोटे-छोटे अंश सम्पादित कर दिये जाने की लिखित शिकायत की। लोकसभा में भी, माकपा के सदस्य एम.बी. राजेश 2016 में कन्हैया प्रकरण और रोहित वेमुला की आत्महत्या के खास संदर्भ में उच्चतर शिक्षण संस्थानों के हालात पर निचले सदन में अपने भाषण को लेकर ऐसी ही शिकायत कर चुके हैं। एम.बी. राजेश ने जब लोकसभा सचिवालय से इसकी शिकायत की तो पहले तो उन्हें बताया गया कि उनके भाषण के कुछ अंश ठीक से सुन सकने लायक नहीं होने के कारण छोड दिये गये, लेकिन जब इस दलील का प्रतिवाद करते हुये उन्होंने अपने भाषण की ‘लाइव रिकार्डिंग’ जमा करा दी तो संपादित अंशों को बहाल कर दिया गया।

दोनों सदनों के कई अन्य सदस्य भी पीठासीन अधिकारियों की किसी रूलिंग के बिना ही अपने भाषणों के हिस्से संपादित कर दिये जाने की बातें करते रहे हैं, लेकिन उनकी बातें भुनभुनाहटों तक ही रहीं। अलबत्ता तथाकथित मुख्यधारा के अखबारों, समाचार चैनलों और अन्य माध्यमों से मौजूदा सरकार को लेकर आलोचनात्मक खबरों और आवाजों की विदाई अगर वर्तमान को जकड़बंदी में लेने की कवायद है तो आनेवाली पीढियों के लिये सुरक्षित संसदीय रिकाडों में अनधिकृत छेडछाड को आगत या भविष्य को भी आयत्त कर लेने का प्रयास कह सकते हैं। विगत चार सालों में अखबारों-चैनलों को विज्ञापनों के मद में 4,800 करोड रुपये देने की सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड की सूचना से वर्तमान की सफायी की प्रक्रिया समझी जा सकती है। राज्यवर्धन ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में गत 30 जुलाई को राज्यसभा को यह सूचना दी थी, लेकिन भविष्य को भी जकड़ में लेने के इस प्रयास को कैसे समझें? कहीं इसका भी ताल्लुक निरंकुश शासन के आगमन के उसी संकेत से तो नहीं है, जिसका जिक्र ‘एनिमल फार्म’ के लेखक के हवाले से पहले किया जा चुका है?

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