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न्यायपालिका को ‘ब्राह्मण न्यायपालिक’ कहने पर डॉ.आंबेडकर की निंदा !

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डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की कहानी, अख़बारों की ज़ुबानी – 15

 

पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में डॉ.आंबेडकर को महात्मा गाँधी के बाद सबसे महान भारतीय चुना गया। भारत के लोकतंत्र को एक आधुनिक सांविधानिक स्वरूप देने में डॉ.आंबेडकर का योगदान अब एक स्थापित तथ्य है जिसे शायद ही कोई चुनौती दे सकता है। डॉ.आंबेडकर को मिले इस मुकाम के पीछे एक लंबी जद्दोजहद है। ऐसे मेंयह देखना दिलचस्प होगा कि डॉ.आंबेडकर के आंदोलन की शुरुआत में उन्हें लेकर कैसी बातें हो रही थीं। हम इस सिलसिले में हम महत्वपूर्ण  स्रोतग्रंथ  डॉ.अांबेडकर और अछूत आंदोलन  का हिंदी अनुवाद पेश कर रहे हैं। इसमें डॉ.अंबेडकर को लेकर ख़ुफ़िया और अख़बारों की रपटों को सम्मलित किया गया है। मीडिया विजिल के लिए यह महत्वपूर्ण अनुवाद प्रख्यात लेखक और समाजशास्त्री कँवल भारती कर रहे हैं जो इस वेबसाइट के सलाहकार मंडल के सम्मानित सदस्य भी हैं। प्रस्तुत है इस साप्ताहिक शृंखला की पंदरहवीं कड़ी – सम्पादक

 

126.

 

दलित वर्ग और मन्दिर प्रवेश

(दि टाइम्स आॅफ इंडिया, 14 फरवरी 1933)

 

यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि मन्दिर प्रवेश आन्दोलन की कल्पना जिन दलित वर्गों के लिए की गई है, यह उनके पक्ष में थोड़ा उत्साह पैदा करेगा। यद्यपि मि. गाॅंधी और उनके सनातनी अनुयायियों के बीच विवाद का उनका रवैया अभी तक तटस्थ रहा है, परन्तु अगर आशा है तो मि. रंगा अय्यर के बिल से है, जिसका उन्हें समर्थन करने से मना किया गया है। डा. आंबेडकर ने अपनी स्थिति को प्रेस को बयान देकर स्पष्ट कर दिया है। हिन्दू मन्दिरों में दलित वर्गों के प्रवेश के अधिकार को दिलाने के लिए विधान सभा के समक्ष बिल रखने से पहले मन्दिर क्षेत्र के अन्तर्गत नगरपालिका और स्थानीय परिषदों के दलित मतदाताओं को मन्दिरों में प्रवेश कराने की माॅंग की गई। किन्तु इससे वर्तमान स्थिति जरा भी प्रभावित नहीं होती है, क्योंकि अगर वर्तमान अनुभूति भावी प्रवृत्तियों की सूचक है, तो यह सोचना व्यर्थ है कि बहुसंख्यक वर्ग उनके मन्दिर प्रवेश के पक्ष में होगा। यह सच है कि गुरुवयूर जनमत संग्रह मि. गाॅंधी की सफलता है, परन्तु अगर उन्होंने अपने जीवन को खतरे में न डाला होता, तो मतदान का परिणाम कुछ अलग भी होता। दलित वर्ग के लोग मुख्य रूप से मन्दिर बिल से आकर्षित नहीं हुए हैं, क्योंकि यह उनकी वास्तविक स्थिति को सुधारने में कोई सहायता नहीं करता है। वर्तमान में वे सिर्फ उच्च हिन्दुओं के साथ पूजा करने का अधिकार नहीं चाहते हैं, वरन अपना सामाजिक और आर्थिक उत्थान वाहते हैं। सामाजिक अस्पृश्यता के कारण उन्हें हिन्दुओं के लाभप्रद व्यवसायों से बहिष्कृत कर दिया गया है। यदि उनके सामाजिक स्तर को ऊपर उठाना है, तो उन्हें शैक्षिक और आर्थिक अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। डा. आंबेडकर ठीक ही मन्दिर प्रवेश की अपेक्षा उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि मन्दिर-प्रवेश का य्अधिकार भले ही मिल जाए, उससे दलित वर्गों की स्थिति में सुधार नहीं होगा।

 

 

127.

 

केवल एक शुरुआत

(दि बाम्बे क्रानिकल, 14 फरवरी 1933)

 

हमें डा. आंबेडकर के इस निष्कर्ष के तर्क को समझना थोड़ा मुश्किल लगता है कि दलित वर्गों के लोग मित्र सी. एस. रंगा अय्यर के मन्दिर-प्रवेश बिल के वर्तमान प्रारूप का समर्थन नहीं करेंगे। उनका निष्कर्ष या तो गलतफहमी पर आधारित प्रतीत होता है, या बिल की उपलब्धि को लेकर प्रचार की असफलता पर; जो मद्रास कौंसिल में प्रस्तुत बिल को नामन्जूर करने वाली सरकारी सूचना में इसे गलत ढंग से दुराग्रही विचार के रूप में लिया गया है। बिल के प्रारूपकार और प्रायोजक भी यह दावा नहीं करते हैं कि मन्दिर-प्रवेश से सम्पूर्ण समस्या या अस्पृश्यता हल हो जायेगी या यह उसमें सहायक बनेगा। डा. आंबेडकर इस बिल को कदाचित एक क्रान्तिकारी बिल के रूप में नहीं देखते हैं, हालांकि इसके निरूपण में उनकी सोच काफी आगे की है। एक अर्थ में यह बिल, अगर कानून बन जाता है, जिसकी सारी सम्भावनाएॅं हैं, तो क्रान्तिकारी बदलाव ला सकता है, इसीलिए इसके समर्थक दलित वर्गों के लिए मन्दिरों के उन दरवाजों को, जो अब बन्द हैं, खुल जाने की आशा करते हैं। अतः यह कहना सही नहीं है कि यह बिल दलित वर्गों के लिए मन्दिर-प्रवेश के दिन को जल्दी नहीं ला सकता।

 

बहुसंख्यक मत

 

ऐसा समझा जा सकता है कि यह बिल अगर कानून बन गया, तो निष्फल साबित हो जायेगा, हालाॅंकि यह सोचना दूर की सम्भावना है। डा. आंबेडकर इस विचार को अस्वीकार करते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं का बहुमत किसी क्षेत्र विशेष में मन्दिर-प्रवेश के पक्ष में मतदान करेगा। वे घोषणा करते हैं कि अगर कोई भ्रम का शिकार नहीं हुआ है, तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि किसी भी स्थिति में बहुमत का मतदान मन्दिर के पक्ष में बहुत कम होगा। गुरुवयूर जनमत के लिए जिन लोगों का वोट लिया गया है, उसे वे उन लोगों की वास्तविक भावना नहीं मानते हैं, क्योंकि इसमें महात्मा के जीवन के मुद्दे ने काम किया है। अगर महात्मा जी ने इसके लिए अनशन नहीं किया होता, तो निस्सन्देह इसका परिणाम काफी अलग होता। डा. आंबेडकर को धैर्य रखना चाहिए, हम कट्टर सनातनवादियों को कह चुके हैं कि वे उन लोगों के अनुभवों को और खास तौर से उनके, जो अस्पृश्यता दूर करने के लिए काम कर रहे हैं, महसूस करें, जिससे पता चलता है कि इस प्रश्न पर हिन्दू समुदाय में भावना की मजबूत लहर व्यापक हो रही है, और पुराने पूर्वाग्रहों को तोड़ दिया गया है। यह इस धारणा का समर्थन है कि, यदि मौजूदा कानूनी प्रतिबन्ध, जो बहुमत के प्रबल होने के दृष्टिकोण को असम्भव बनाता है, हटा दिया जाता है और बहुमत की इच्छा को ज्ञात करने के लिए साधन प्रदान किए जाते हैं, तो जहाॅं तक मन्दिर प्रवेश का सम्बन्ध है, हिन्दू बहुमत बाधाओं को दूर करने के पक्ष में होगा।

 

झूठी उपमाएॅं

 

अगर हम मान लें कि डा. आंबेडकर सही हैं और मन्दिर प्रवेश के पक्ष में बहुमत के मतदान की आशा कम ही होगी, तो भी हम उनके इस तर्क से सहमत नहीं हो सकते कि दलित वर्गों के लोग बिल का समर्थन नहीं करेंगे। प्रसंगवश, हम इस मामले में दलित वर्गों के लिए इतने आधिकारिक रूप से बोलने के डा. आंबेडकर के दावे पर सन्देह करने के लिए मजबूर हैं। वे हमेशा उस बिशप की तरह बोलते हैं, जो अपने शब्दों को ही अन्तिम समझता है। इसलिए वे समझते हैं कि सम्पूर्ण समुदाय के विचारों का विश्लेषण करने का अधिकार सिर्फ उनको ही है। लेकिन अपने विचार व्यक्त करने के लिए उनके पद और अपने समुदाय की ओर से किए गए उनके महान प्रयासों को स्वीकार करते हुए हमें सन्देह होता है कि क्या वे दलित प्रश्न पर और अन्य प्रश्नों पर भी बोलने के लिए उतने ही योग्य हैं, जितने महात्मा गाॅंधी और बहुत से अन्य लोग हैं, जो अस्पृश्यता का कलंक मिटाने के लिए कार्य कर रहे हैं। यह सोचना तर्कसंगत नहीं है कि मि. रंगा अय्यर का बिल व्यवहार में असफल हो जायेगा, इसलिए उसका समर्थन नहीं करना है। ऐसे आत्मसंयम की शिक्षा देने वाले सुधारक की कोई उपयोगिता नहीं है। ऐसे सुधारक कई तरह के होते हैं। कुछ सुधारक शराब बेचने पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करेंगे, तो कुछ उसके स्थानीय विकल्प की बात करेंगे, जबकि दूसरे सुधारक पूर्ण निषेध चाहते हैं। पर हमने ऐसे संयत सुधारक के बारे में कभी नहीं सुना, जिसने शराबखोरी की बुराइयों को कम करने के लिए उसके उपायों का समर्थन करने से इसलिए मना कर दिया हो, क्योंकि वह उसका पूर्ण निषेध नहीं कर सकता। और इस तरह, इस आधार पर मन्दिर-प्रवेश के बिल का विरोध करने का भी कोई कारण नजर नहीं आता है कि यह अस्पृश्यता का सम्पूर्ण अन्त करने नहीं जा रहा है।

 

केवल एक शुरुआत

 

डा. आंबेडकर का दृष्टिकोण और, हमें कहना चाहिए, उनका तर्क चातुर्वर्ण के सिद्धान्त के प्रति उनकी घृणा में छिपा हुआ प्रतीत होता है। हालाॅंकि जाहिरा तौर पर वे कानून के द्वारा ही हिन्दू धर्म में सुधार की आशा करते हैं। उनकी शिकायत से कोई भी यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि यह बिल अस्पृश्यता को पाप घोषित नहीं करता है, बल्कि एक सामाजिक बुराई मानता है। वास्तव में, यह बिल इसे केवल एक सामाजिक बुराई नहीं मानता है, क्योंकि इसका उद्देश्य कानून के द्वारा धार्मिक प्रथा में महान परिवर्तन लाना है, बल्कि यह हिन्दू धर्म का वह अभिशाप मानता है, जो एक धार्मिक पाप, या एक सामाजिक बुराई या राजनीतिक विकलांगता, और वस्तुतः तीनों है। यह बिल केवल कानूनी बाधाएॅं दूर कर सकता है, जो हिन्दूधर्म या अन्य धार्मिक सुधार के मार्ग में खड़ी हैं। और यही इस बिल का उद्देश्य भी है।

हमें आशा है कि वह दिन जल्दी आयेगा, जब धार्मिक उत्पीड़न के लिए कानून का संरक्षण पूरी तरह से हटा  दिया जायेगा। किन्तु विधाई हस्ताक्षेप उससे आगे नहीं जा सकता। बाकी काम हिन्दू सुधारकों को स्वयं ही करना है। हम इस बात से सहमत हैं कि यह बिल केवल एक छोटी चीज है। लेकिन यह कम से कम एक शुरुआत है और इस शुरुआत से इसके समर्थकों को एक बड़ी लड़ाई के लिए बड़ी चीजों की आशा है, जो पूरे देश की भावी भलाई के लिए धार्मिक और सामाजिक दोनों उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए अभी आरम्भिक चरणों में हैं।

 

 

128.

 

डा. आंबेडकर उलझन में

(दि बाम्बे क्रानिकल, 14 फरवरी 1933)़

 

डा. आंबेडकर न्यायपालिका पर ‘ब्राह्मण न्यायपालिका’ के रूप में प्रहार करके विधान परिषद में सभी पार्टियों की निंदा के पात्र बन गए हैं। निस्सन्देह ‘ब्राह्मण न्यायपालिका’ जैसी कोई संस्था नहीं है, किन्तु यह शब्द न्यायपालिका के उन सदस्यों के लिए, जो ब्राह्मण हैं, गलत ढंग से प्रयोग किया गया है। न्यायपालिका पर यह हमला संसदीय कार्यप्रणाली की आचार-संहिता का गम्भीर उल्लंघन है, किन्तु डा. आंबेडकर स्वयं में एक कानून बनना पसन्द करते हैं। अजीब बात यह है कि उनकी यह टिप्पणी सभापति द्वारा नोटिस के बिना ही पारित कर दी गई थी। और किसी ने भी व्यवस्था का सवाल नहीं उठाया था। हालाॅंकि जब अगले दिन इस विषय को उठाया गया, तो हरेक ने डा. आंबेडकर की इस गलतबयानी की निदा की। नेता-सदन ने स्वीकार किया कि न तो वे और न ही उनका कोई मित्र उस समय उनको सुन रहा था, केवल यह माना जा सकता है कि सदन के बाकी लोग, जिनमें सभापति भी शामिल थे, लापरवाही के मूड में थे, क्योंकि किसी ने भी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि जजों पर जो अपमानजनक आरोप लगाया गया है, उसकी निदा करने के लिए अगले दिन तक प्रतीक्षा नहीं की जायेगी।

 

 

129.

 

डा. आंबेडकर की अध्यक्षता में गैरब्राह्मण युवा सम्मेलन

(दि बाम्बे क्रानिकल, 2 मार्च 1933)़

 

बम्बई प्रान्त के ‘नाॅन-ब्राह्मण यूथ काॅंफ्रेन्स’ की स्वागत समिति ने इसी 19 मार्च को रविवार के दिन अपना पहला अधिवेशन बम्बई में करने का निश्चय किया है।

उसके अध्यक्ष के रूप में सर्वसम्मति से डा. आंबेडकर, बार-एट-लाॅ, एम. एल. सी. को चुना गया है।

विस्तृत विवरण ‘नाॅन-ब्राह्मण यूथ काॅंफ्रेन्स’, बम्बई-12 की स्वागत समिति के सचिव से प्राप्त की जा सकती है।

 

 

130.

 

दलित कौन हैं?

(दि बाम्बे क्रानिकल, 22 अप्रैल 1933)़

 

दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में कारपोरेशन स्कूल कमेटी के लिए डा. पी. जी. सोलंकी के चुनाव के बावत की गई आपत्ति में वस्तुगत और महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं, जिन पर गम्भीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। उस कमेटी की सीट के लिए डा. सोलंकी की योग्यता पर चर्चा करने का कुछ लाभ नहीं है। क्योंकि यदि वह अछूत समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं, तो वह उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए एकमात्र उपलब्ध व्यक्ति हैं, और उनका चुनाव योग्यता को आधार बनाए बिना ही हो जाना चाहिए। किन्तु क्या वह वास्तव में दलित वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं? केवल इस आधार पर कि सरकार ने उन्हें कारपोरेशन और विधान परिषद में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व नियुक्त किया है, कोई कानूनी मुद्दा नहीं बनता है। डा. सोलंकी के दावे पर सरकार की स्वीकृति से हटकर अन्य आधार पर विचार किया जाना चाहिए।

 

मुद्दे

 

सामान्य तौर पर ये मुद्दे उठाए गए हैं कि कौन से समुदाय विशेष प्रतिनिधित्व के लिए दलित वर्गों में आते हैं? और, दूसरे, यदि अछूत समुदाय में जन्मा व्यक्ति, उस धर्म में धर्मान्तरण कर लेता है, जो अस्पृश्यता को स्वीकृति नहीं देता है, और बाद में फिर एक और धर्म अपना लेता है, जो जातिव्यवस्था की निंदा करता है, तो क्या उसे फिर भी कानूनी रूप से दलित वर्ग का सदस्य माना जा सकता है? क्या दलित वर्गों को सामान्यतः एक धार्मिक हिन्दू समुदाय के समूह के रूप में माना जाता है, या उन्हें केवल विभिन्न धर्मों से सम्बन्धित एक सामाजिक विभाजन के रूप में माना जाता है? स्पष्ट रूप से ये वे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जो हिन्दू समाज और भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डालते हैं और जो डा. सोलंकी के मामले में प्रत्यक्ष रूप से उठाए गए हैं।

पहले मुद्दे के सम्बन्ध में, कुछ लोगों के द्वारा कहा जाता है क़ि वास्तव में डा. सोलंकी का जन्म जिस समुदाय में हुआ है, वह अछूत समुदाय नहीं हैं, हालाॅंकि वह पिछड़े समुदाय में आता है। यदि यह सत्य है, तो विशेष प्रतिनिधित्व के के मकसद से अछूत होने का दावा करने के लिए उस समुदाय के लोगों पर दया करनी होगी, क्योंकि ऐसा करके उन्होंने अपने आप को सामाजिक रूप से नीचे गिरा दिया है। अब उनकी स्थिति उनके दावे के जवाब में निश्चित ही बदतर हो जायेगी। सरकार को दलित वर्गों में उनके सम्पूर्ण समुदाय को शामिल करना चाहिए था। कोई भी इन विचारों से दलित वर्गों के लिए आरक्षित विशेष सीटों के दुखद परिणाम की कल्पना आसानी से कर सकता है। ़

 

एक बुरी व्यवस्था

 

दूसरा मुद्दा और भी पेचीदा है। आम धारणा है कि जिस क्षण एक हिन्दू दूसरे धर्म को अपनाता है, तो उसी क्षण वह अपनी पिछली जाति के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। और उसकी स्थिति अपरिवर्तनीय हो जायेगी, अगर वह बाद में ‘ब्रह्म समाजी’ हो जाता है। पर यह अभी भी एक विवादित प्रश्न है कि वह अगर फिर से हिन्दू हो जाता है, तो क्या होगा। किन्तु अगर वह हिन्दू हो भी जाता है, तो वह ब्रह्म समाज के रूप में, जो जाति को नहीं मानता है, एक विशेष जाति का होने का दावा नहीं कर सकता। अगर सरकार मनमाने नियमों से उन्हें अछूतों में शामिल करती है, जो आमतौर पर इस परिपाटी को कदाचित नहीं माना जा सकता, तो वह उस समुदाय की सहायता करने के नाम पर हिन्दू समाज की बहुत बड़ी क्षति कर रही है। स्वयं दलित वर्गों के सम्बन्ध में, जितनी जल्दी हो सके, सीटों के आरक्षण की व्यवस्था से छुटकारा पाने के लिए उनके हित में उन्हें उचित सलाह दी जानी चाहिए। यह स्वयंसिद्ध है कि जब तक आरक्षण जारी रहता है, तब तक अस्पृश्यता समाप्त नहीं हो सकती।

 

पिछली कड़ियाँ–

 

14. मन्दिर प्रवेश पर्याप्त नहीं, जाति का उन्मूलन ज़रूरी-डॉ.आंबेडकर

13. गाँधी जी से मिलकर आश्चर्य हुआ कि हममें बहुत ज़्यादा समानता है- डॉ.आंबेडकर

 12.‘पृथक निर्वाचन मंडल’ पर गाँधीजी का अनशन और डॉ.आंबेडकर के तर्क

11. हम अंतरजातीय भोज नहीं, सरकारी नौकरियाँ चाहते हैं-डॉ.आंबेडकर

10.पृथक निर्वाचन मंडल की माँग पर डॉक्टर अांबेडकर का स्वागत और विरोध!

9. डॉ.आंबेडकर ने मुसलमानों से हाथ मिलाया!

8. जब अछूतों ने कहा- हमें आंबेडकर नहीं, गाँधी पर भरोसा!



कँवल भारती : महत्‍वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक चिंतक, पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत। दलित विषयों पर तीखी टिप्‍पणियों के लिए विख्‍यात। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। चर्चित स्तंभकार। मीडिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य।

 



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