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चुनाव चर्चा : मीडिया के लिए पूर्वोत्तर में चुनाव का मतलब सिर्फ़ मोदी जी का भाषण !

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त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड चुनाव की खबरें ‘राष्ट्रीय ‘ मीडिया में कम क्यों हैं ?

चंद्र प्रकाश झा 

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के तीन राज्यों , त्रिपुरा , मेघालय और नगालैंड की विधानसभा के चुनाव के निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार उन सबके परिणाम एकसाथ तीन मार्च को निकलने वाले हैं। तीनों
विधानसभा की 60-60 सीटें हैं। मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त अचल कुमार ज्‍योति ने इनके चुनाव कार्यक्रम की विधिवत घोषणा 18 जनवरी को ही कर दी थी. फिर भी इनके चुनाव के बारे में राष्ट्रीय मीडिया में खबरें देश के तथाकथित ‘ मुख्य भाग ‘ के राज्यों में होते रहे चुनाव की तुलना में कम ही है। इसके सही कारण ढूंढें जाने चाहिए।

पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव में पहले चरण में त्रिपुरा में मतदान 18 फरवरी को हो चुका है। इसमें  कमोबेश पिछले विधानसभा चुनाव की तरह ही करीब 89 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया. दूसरे चरण में मेघालय और नगालैंड में भी 27 फरवरी को मतदान होना है।  त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सरकार है। अन्य दोनों  राज्‍यों में कांग्रेस  की सरकारें हैं। भाजपा अपना आधार बनाने की कोशिश में  जी -जान से लगी नज़र आई।


राष्ट्रीय मीडिया ने पूर्वोत्तर राज्यों की विधानसभा के चुनाव की ख़बरों से कहीं ज्यादा खबरेँ  ,राजस्थान में लोकसभा की अजमेर और अलवर सीट एवं विधानसभा की मंडलगढ़ सीट तथा बंगाल की उलूबेरिया लोकसभा सीट और नोआपाड़ा विधानसभा सीट पर उपचुनाव की दी थी जिनके एक फरवरी को घोषित परिणाम राजस्थान में विपक्षी कांग्रेस और बंगाल  में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में गए। राजस्थान की अगली विधानसभा के लिए इसी वर्ष मध्य प्रदेश  कर्नाटक जैसे कुछेक राज्यों  के विधान सभा के चुनाव के साथ ही इसी वर्ष निर्धारित  है।

यह भी तय -सा लगता  है कि “राष्ट्रीय” मीडिया उपरोक्त उपचुनावों  की ही तरह उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर के साथ ही बिहार की अररिया लोकसभा सीट और जहानाबाद एवं भभुआ विधानसभा सीटों पर 11 मार्च को होने वाले उपचुनाव की ख़बरों को  तरजीह देगा। उन आगामी उपचुनावों की चर्चा हम भी करेंगे लेकिन अलग से। मीडिया विजिल के स्तम्भ,  ‘चुनाव चर्चा’ , की  इस तीसरी किस्त में  हम पूर्वोत्तर क्षेत्र के तीन राज्यों , त्रिपुरा
मेघालय और नगालैंड की विधानसभा के चुनाव की ही चर्चा करें तो बेहतर होगा क्योंकि इस स्तम्भ का उद्देश्य  चुनावी खबरें देने और यथोचित रूप से न देने की मीडिया की प्रवृर्तियों पर भी नजर रखना है।

पूर्वोत्तर के राज्यों में चुनाव के पहले चरण में 18 फरवरी को त्रिपुरा में 59 सीट पर मतदान संपन्न हो चुका है. एक सीट पर चुनाव राज्य में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा का नेतृत्व कर रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा ) के प्रत्याशी के निधन के कारण स्थगित कर दिया गया।  त्रिपुरा चुनाव परिणामों को लेकर अखबारों में कयासबाजी की कुछ खबरें  और पोल्स्टरों के ऐसे कम्प्यूटरी विश्लेषण भी मिलने शुरू हो गए है जो सही साबित हुए तो तीर माने जाएंगे और सही ना निकले तो तुक्का।  उनकी सेहत पर क्या फर्क पडेगा? मीडिया के  इन तीर-तुक्केबाजों की खाल बहुत मोटी है.पूर्वोत्तर के इन चुनावों के बारे में अंग्रेजी , हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की मीडिया ने खबरें दी हैं पर उतनी नहीं जितनी अपेक्षित रही।

नागालैंड और मेघालय चुनाव की चर्चा भी  हम विस्तार से बाद में करेंगे.

लेकिन पहले  त्रिपुरा की चर्चा जहाँ मतदान संपन्न हो चुके हैं। एक्सप्रेस ग्रुप के  हिंदी दैनिक जनसत्ता के मुद्रित संस्करण से अपेक्षाकृत अधिक खबरें उसके ऑनलाइन संस्करण ने दी है. उसने 18 जनवरी को अपनी रिपोर्ट में यथोचित चुनावी ब्योरा दिया। उसकी  रिपोर्ट के मुताबिक़ इन तीन पूर्वोत्तर राज्यों की  सभी  सीटों के लिए सभी जगह इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ( ईवीएम) से ही मतदान कराया जा रहा है।  इन मशीनों के साथ वीवीपीएटी भी लगी है।  इसकी बदौलत मतदाता को इसके आधिकारिक साक्ष्य के रूप में एक पर्ची मिलेगी कि उसने किसके पक्ष में मतदान किया है। पर्ची की सॉफ्ट कॉपी मशीन में ही सुरक्षित रहेगी।

 

 

भाजपा ने त्रिपुरा चुनाव में जो हथकंडे अपनाये उसकी राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा लगभग नगण्य है। उसने अलबत्ता वहाँ भाजपा के लिए प्रचार करने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह आदि राष्ट्रीय नेताओं के भाषणों की खबरें जोर -शोर से दीं। भाजपा ने कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस में चले गए उसके सभी विधायकों को केंद्रीय सत्ता और धनबल पर अपने पाले में शामिल कर लिया।  खुद को अव्वल राष्ट्रवादी और देशभक्त पार्टी होने का दम्भ भरने वाली भाजपा ने अंततः खुल्लमखुल्ला  रूप से ” इंडिजेनस पीपल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (आईपीएफटी)” जैसे अलगाववादी पार्टी से औपचारिक चुनावी  गठबंधन भी कर लिया। मीडिया में यह खबर ‘ गोल’ कर दी गई कि त्रिपुरा के चुनाव में अन्य राज्यों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पचास हज़ार कार्यकर्ता भेजे गए।  असम समेत, अगल -बगल राज्यों के भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं  ने  वहाँ लंगर डाल दिया। खुद अमित शाह  ने त्रिपुरा के अनेक चुनावी चक्कर लगाए। मोदी जी ने चुनाव प्रचार में गुजरात के विकास की गप्पें कह त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने पर रबर की खेती सब्जबाग दिखाते हुए वाम मोर्चा को सत्ता से बाहर करने की सिंह गर्जना की। उन्होंने चुनाव को  साम्प्रदायिक रंग देते हुए कहा कि त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण खतरा पैदा हो गया है जबकि गुजरात से सटा पाकिस्तान उनकी सरकार से थर्राता रहता है।

 

भाजपा की तरफ से चुनावी कुप्रचार के लिए उसके खेमा के एक सज्जन ने ‘लाल सरकार’ नाम से एक फीचर फिल्म तक बना डाली।  पद्मश्री से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता -पत्रकार तीस्ता सेटलवाद की संस्था के दैनिक द्विभाषी (अंग्रेजी -हिंदी) न्यूज़ बुलेटिन , सबरंग इंडिया ने इसका भंडाफोड़ कर बताया कि इस फिल्म का निहितार्थ,  त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की क्षवि धूमिल करना है। सबरंग इंडिया ने अपने न्यूज़ बुलेटिन
में उस प्रोपेगंडा फिल्म के वीडिओ क्लिप्स भी देकर विस्तृत विश्लेषण किया।

दिलचस्प बात यह है कि त्रिपुरा चुनाव के ऐन पहले जिस दिन यह फिल्म वाणिज्यिक प्रर्दशन के लिए रिलीज की गई उसी दिन देश के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘ द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ ने  माणिक सरकार  सादगी पूर्ण जीवन की एक रिपोर्ट  प्रमुखता से प्रकाशित की. रिपोर्ट में उनके इस बार का चुनाव लड़ने के लिए दाखिल नामांकन -पत्र के साथ नत्थी शपथ -पत्र  के हवाले कहा गया है कि वह विधिक प्रावधानों के तहत आयकर से मुक्त है। वह देश के सबसे गरीब मुख्य मंत्री हैं. वह मुख्यमंत्री के रूप में प्राप्त सारा वेतन- भत्ता पार्टी को दान कर देते है. वह अपना खर्च अपनी पत्नी पांचाली भट्टाचार्य  की सीमित आय और माकपा पोलितब्यूरो सदस्य होने के बावजूद उसके पूर्णकालिक कार्यकर्ता बतौर मिलने वाली उतनी ही रकम के सहारे पूरा करते हैं जो पार्टी के सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ता के लिए एकसमान निर्धारित है।  जनवरी 1949 में पैदा हुए माणिक सरकार का मुख्य मंत्री पद पर यह लगातार चौथा कार्यकाल है. उनकी सादगी की बातों की चर्चा मीडिया में बहुत नहीं होती हो लेकिन त्रिपुरा के घर -घर को यह मालूम है. उनकी पत्नी , केंद्र सरकार के समाज कल्याण बोर्ड के सचिव पद से सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी पेंशन से गुजारा करती  हैं  और उसी से पति को भी भी आर्थिक सहारा भी देती हैं  माणिक सरकार की  निजी चल-अचल संपत्ति  तीन लाख रुपये से भी कम है और वह भी उन्हें अपनी  मां से मिली है। उनका  न अपना घर है, न कार। उन्हें  नृपेन चक्रवर्ती और दशरथ देब जैसे दिग्गज कम्युनिस्ट नेताओं के बाद मुख्यमंत्री पद की बागडोर सौंपी गई। वह 1968 से  माकपा सदस्य हैं।

 

मीडिया में शायद ही कभी त्रिपुरा के विविधतापूर्ण जन -जीवन की समुचित रिपोर्ट प्रकाशित हुई हो। वर्ष 2011 की पिछली जनगणना के अनुसार त्रिपुरा की आबादी करीब 37 लाख है। राज्य में लोकसभा की दो सीट हैं। त्रिपुरा ,पहले केंद्र शासित प्रदेश था। उसकी पहली विधानसभा 1972 में गठित हुई थी। उसी वर्ष भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र का नए सिरे से भौगोलिक और राजनीतिक-प्रशासनिक पुनर्गठन  किया गया था जिसके फलस्वरूप कुछे केंद्र
-शासित प्रदेशों को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दे दिया गया और कुछ नए राज्य भी कायम किये गए. यह सब 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान उस पूर्वी पाकिस्तान से लाखों शरणार्थियों के  भारत चले आने की पृष्ठभूमि में हुआ जिसका युद्ध के उपरान्त बांग्लादेश नाम से स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अभ्युदय हो गया था।  बंगाली हिन्दू शरणार्थी  के बड़ी संख्या में त्रिपुरा में बस जाने से  वहाँ के मूल आदिवासी अल्पमत में रह गए ।
आदिवासियों  के असंतोष ने वहां एक उग्र आंदोलन को जन्म दिया जिसके नेताओं के साथ समझौता करके कांग्रेस ने 1988 में एक साझा सरकार बनाई।  वहाँ 1978 से अभी तक वाम मोर्चा की ही  सरकार रही है। त्रिपुरा सुशिक्षित राज्य है पर  उद्योग धंधों का बड़ा अभाव है और इसलिए  गरीबी भी है ।

 

 



मीडियाविजिल के लिए यह विशेष श्रृंखला वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश झा लिख रहे हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है। सीपी की इस श्रृंखला की कड़ियाँ हम चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव बाद भी पेश करते रहेंगे। 



 

 

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