Home काॅलम “पॉलिटिक्स ने बर्बाद कर दिया वरना कश्मीर में हिन्दू-मुसलमान का फ़र्क़ नहीं...

“पॉलिटिक्स ने बर्बाद कर दिया वरना कश्मीर में हिन्दू-मुसलमान का फ़र्क़ नहीं होता!”

SHARE

‘कश्मीरनामा:इतिास और समकाल’ हाल में प्रकाशित हिंदी के सबसे चर्चित किताब मानी गई है। कश्मीर के बारे में हिंदी में ऐसा दस्तावेज़ी प्रयास पहले नहीं हुआ था। इस किताब को लिखा हैं कवि-लेखक अशोक कुमार पाण्डेय ने। वे इन दिनों कश्मीर में हैं। घूमने से ज़्यादा ब़ड़ा मक़सद शायद कश्मीर पर एक और किताब की तैयारी है। मीडिया विजिल ने उनसे अनुरोध किया कि वे अपने अनुभव को लिखते जाएँ ताकि हिंदीभाषी लोग  ज़मीन की वह तस्वीर भी देख पाएँ जो कथित मुख्यधारा मीडिया में कश्मीर के नाम पर होने वाली दैनिक गोलाबारी में ग़ायब है। यानी कश्मीर की ग्राउंड रिपोर्ट। अभारी हैं कि वे मान गए, गोकि लिखने के लिए मोबाइल ही है, और यह तक़लीफ़देह होगा। तस्वीरें भी उन्होंने ही भेजी हैं। पेश है, इस सिलसिले की दूसरी किस्त-संपादक

 

 अशोक कुमार पाण्डेय

गुलमर्ग के बस स्टैंड के सामने एक छोटा सा शिव मंदिर है। पीछे पहाड़ और देवदार के वृक्ष चारो तरफ हरी घास। मुख्य सड़क से कोई डेढ़ सौ सीढ़ियाँ पार करके जा सकते हैं आप वहाँ। हमारे स्थानीय मित्र और गाइड मोहम्मद रफ़ीक़ बताते हैं कि वहाँ राजेश खन्ना की फ़िल्म आपकी क़सम की शूटिंग हुई थी। याद करता हूँ तो कहीं पढ़ा याद आता है कि इसे आख़िरी डोगरा शासक हरि सिंह ने अपनी महारानी के लिए बनवाया था और इसे महारानी मंदिर के नाम से जाना जाता है। मैं पूछता हूँ, ‘लोग पूजा करने आते हैं यहाँ या सिर्फ़ टूरिस्ट प्लेस जैसा रह गया है?’  रफ़ीक़ के चेहरे पर जो भाव आता है वह बार बार अलग अलग जगहों पर अलग अलग लोगों के चेहरे पर दिखा। फिर जैसे ख़ुद को सम्भालता हुआ बोला, ‘शिवरात्रि को बहुत भीड़ लगती है यहाँ अशोक भाई। बाक़ी दिन भी आते हैं लोग। टूरिस्ट तो आते ही हैं साथ में आसपास भी हैं पंडित परिवार। पॉलिटिक्स ने सब बर्बाद कर दिया वरना हमारे गाँवों में आज भी हिन्दू-मुसलमान का कोई फ़र्क़ नहीं होता।’ मैं पथरीले चेहरे से मुस्कुराता हूँ। यह एक ऐसी बात है जो आपको कश्मीर में हर किसी से सुनने को मिलेगी- ‘पॉलिटिक्स ने सब बर्बाद कर दिया।’

तनमर्ग से निकलते हुए मुश्किल हालात से गुज़रते दक्षिण कश्मीर जाने के पहले हमने कुछ मंदिर देखने का निश्चय किया या यों कहें मंदिरों के खण्डहर। रात पहलगाम में रुकने के बाद अगले दिन पुलवामा जाना था जहाँ मित्र निदा नवाज़ ने कई स्थानीय लोगों से बातचीत का इंतज़ाम किया था। बता दूँ कि पुलवामा शोपियाँ के बाद सबसे तनावपूर्ण क्षेत्र है।

पहला पड़ाव अवंतीपुरा तय किया गया तो नए बने श्रीनगर पहलगाम बाई पास रोड की जगह पाम्पोर वाली अपेक्षाकृत भीड़भाड़ वाली सड़क चुनी गई। इस सड़क पर ही पाम्पोर के आगे वह इलाक़ा आता है जहाँ केसर (ज़ाफ़रान) की खेती होती है। इसके अलावा पूरे कश्मीर में केसर कहीं नहीं होता। सड़क के दोनों तरफ़ लंबे मैदान जो दूर से देखने पर घास के मैदान लगते हैं। इस इलाके में केसर की खेती चौदहवीं सदी के मध्य से ही शुरू हो गई थी। आमतौर पर कश्मीर में केसर की खेती शुरू करने का श्रेय ईरान और खुरासान से आये सूफ़ियों को दिया जाता है। बडशाह यानी ज़ैनुलआब्दीन के समय इसे ख़ूब बढ़ावा मिला और तबसे यहाँ पारंपरिक रूप से केसर होता है। इस समय उसमें लाल फूल खिलने शुरू हो गए हैं।

(केसर के खेत)

हम इन खेतों को पार करके ज़रा आगे बढ़े थे कि अचानक झुग्गियों के समूह दिखाई दिए। यहाँ झाड़ू बन रहे थे। औरतें मर्द और बच्चे। कोई बीसेक परिवार। बात की तो पता चला कि राजस्थान के भीलवाड़ा, उदयपुर और दीगर इलाक़ों से आये बाघरी समाज के आदिवासी परिवार हैं। बस रोज़गार की तलाश में भटकते जम्मू होते हुए यहाँ आ गए हैं। पूछा ‘कोई परेशान तो नहीं करता?’  मर्दों से पहले एक अधेड़ महिला ने हँस कर कहा, ‘हमें क्या परेशान करेगा कोई साहब? मेहनत करते हैं कमाते खाते हैं।’ जाने क्या सूझी कि मैने पूछ लिया, ‘पूजापाठ कहाँ करते हो? मंदिर है कोई आसपास?’ इस बार हँसी और गहरी थी – हमारे देवता हमारे साथ रहते हैं। जहाँ हम जाते हैं देवता भी। इसी झुग्गी में हम भी रहते हैं और हमारे देवता भी।

मैं बच्चों का स्कूल पूछना चाहता था। हिम्मत नहीं हुई। ये, जिनके पास न कोई आधार न आधार कॉर्ड… क्या है इनकी नागरिकता? मंदिर वहीं बनाएँगे के बासी होकर भी बासी होने से इनकार करते कर्णभेदी नारों के बीच एक सच इनका है जो आपको किसी शहर किसी क़स्बे में दिख जाएँगे, बेघर बेआसरा। न सरकार के लिए इतने ज़रूरी कि ध्यान दे, न आज़ादी और पाकिस्तान के बीच झूलते मुजाहिदीन के लिए ही ये कोई कंसर्न हैं। विषयांतर नहीं होगा अगर यहाँ हम जान लें कि पूरे कश्मीर में आपको बिहार, यूपी और नेपाल के हज़ारों मज़दूर मिल जाएंगे। ख़ासतौर से मकान, सड़कें और इस तरह के निर्माण में और कहीं कहीं खेती के क्षेत्र में भी। समोसे, चाट, जलेबी, गोलगप्पे बेचते तो मिल ही जाएँगे। ये चिल्ला (दिसम्बर से फरवरी) में घर चले जाते हैं और फिर पूरे साल यहीं। कश्मीर में एक आम कंस्ट्रक्शन मज़दूर की मजदूरी है 500 रुपये रोज़ तो मिस्त्री की 800 से 1000 रुपए तक। साथ में सुबह की चाय और नाश्ता, दोपहर का भोजन ही नहीं रात का खाना पैक करके डेरे पर पहुंचाया जाता है। छुआछूत है नहीं और 2004 में 7 मज़दूरों की एक दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद कोई ऐसी ख़बर सुनी नहीं गई। हमारे ड्राइवर बशीर भाई हँस के बताते हैं, ‘इनके बिना कश्मीर का काम नहीं चलेगा साहब। इन्हें कोई क्यों परेशान करेगा।’

अवंतीपुरा आ चुका था। कश्मीर में पुरा की स्पेलिंग ‘O’ से होती है। सड़क के बाईँ ओर पहले अवंतीश्वर का मंदिर पड़ता है। हम अंदर जाते हैं तो पीछे से एक अधेड़ सरदार जी साथ हो लेते हैं। बताना शुरू करते हैं कि अवन्तिवर्मन उड़ीसा से आया था और उसने यह मंदिर बनवाया था। मैं रोकता हूँ उन्हें। कश्मीर का इतिहास बताता है कि कार्कोट वंश के अन्तिम शासक उत्पलपीड को की अय्याशी से तंग आकर दरबारियों ने 855 ईसवी में उसे हटाकर ललितादित्य की एक पत्नी जयादेवी के भाई उत्पल के पौत्र अवन्तिवर्मन को शासक बना दिया था। वह कश्मीर के सबसे योग्य शासकों में गिना जाता है। उसी ने अपनी तत्कालीन राजधानी अवंतिपुर में यह शिव मंदिर बनवाया था। इसके अलावा इससे थोड़ी ही दूर पर एक विष्णु मंदिर ( अवन्तिस्वामी) भी है, जो कश्मीर का इकलौता विष्णु मंदिर है। भूकम्प और बाढ़ में टूटफूट चुके इन मंदिरों को आर्कियोलॉजी विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया है। मंदिरों के बारे में विस्तार से फिर कभी।

यहाँ से आगे हमें मट्टन जाना है। मट्टन नाम शायद मार्तंड का ही अपभ्रंश है। पूरा रास्ता अमरनाथ यात्रा का मार्ग है तो रास्ते भर उसके निशानात दिखते हैं। यात्रियों का स्वागत करते एक बैटरी कंपनी के पोस्टर्स। शुद्ध वैष्णो होटल। भगवा झंडे। शिव की तस्वीरें। मट्टन अनंतनाग से थोड़ा आगे एक छोटा सा क़स्बा है। अनन्तनाग का किस्सा अपने आप में मज़ेदार है। डोगरा राज में इसका नाम इस्लामाबाद से बदलकर अनन्तनाग कर दिया गया है। जिन्होंने “हैदर” देखी है जिसके आरंभिक दृश्य में नायक से पूछताछ में जब उसका घर पूछा जाता है तो वह इस्लामाबाद बताता है। स्थानीय नागरिकों के बीच इन नामों के खेल अब भी अपनी समस्त विडम्बनाओं के साथ उपस्थित हैं। ख़ैर, मट्टन पहुंचकर हम वहाँ के सूर्य मंदिर में जाते हैं। एक बड़े से कैम्पस में मंदिर है और साथ में गुरुद्वारा भी। दक्षिण कश्मीर का यह इलाक़ा कश्मीरी पंडितों का गढ़ था। नब्बे में उनमें से काफी के पलायन के बाद भी यहाँ काफी कश्मीरी पंडितों के घर हैं। गाँव में घूमिये तो कई खाली घर दिख जाते हैं। उजाड़ वीरान जहाँ पिछले तीसेक सालों में कोई नहीं गया। पंडितों के जाने के बाद उनके घर अधिकांश वैसे ही पड़े हैं। धीरे धीरे खंडहर में बदलते। एक घर के साथ लगा निजी मंदिर दिखा हमें, घर जैसे ही वीरान होता। वहीं थोड़ी दूर पर मुख्य सड़क पर ही रैना जनरल स्टोर। हम रुके थोड़ी सी बात हुई। कुछ पुरानी यादें और वही “सब पोलिटिकल तमाशा है।” हम और बात करना चाहते थे लेकिन समझ आ गया था कि वह अधिक कुछ बताने के मूड में नहीं।

 

मट्टन से कोई पाँच-छह किलोमीटर आगे चढ़ाई पर है मार्तंड का सूर्य मंदिर। पूरे कश्मीर में आपको शिव के मंदिर मिलेंगे। लेकिन शैव धर्म के केंद्र में सूर्य का यह इकलौता मंदिर है। कार्कोट वंश के महान शासक ललितादित्य मुक्तपीड का महान शाहकार। अपने समय में यह विश्व के सबसे बड़े स्ट्रक्चर्स में से एक था। चूने के पत्थरों की चौकोर ईंटों से बना। नियमित अंतरालों पर 84 स्तम्भ और उनके बीचोबीच भव्य मंदिर। शिखर पर सूर्य की किरणों के प्रवेश के लिए झरोखा। बताते हैं कि मंदिर ऐसा बना था कि किरणे सूर्य की प्रतिमा से परावर्तित हो पूरे इलाके को रौशन कर देती थीं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर साल के 364 दिनों के लिए 364 देवी देवताओं की मूर्तियाँ। सामने गंगा यमुना सरस्वती और विष्णु की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर के सामने एक कुण्ड जिसमें जल एकत्र होता था और साथ में हवनकुण्ड। हमारे गाइड साहिल श्रीनगर में इतिहास के छात्र हैं। वह बताते हैं कि अब भी कश्मीरी पंडित वहाँ साल में एक बार हवन करते हैं। मंदिर आर्कियोलॉजी विभाग के पास है और रिनोवेशन का काम चल रहा है। वहीं पास में एक खम्भे पर कश्मीरी भाषा की सारदा लिपि में कुछ लिखा है। साहिल बताते हैं कि यह मंदिर का इतिहास है। आठवी सदी का यह मंदिर भूकम्प का शिकार होकर खण्डहर में तब्दील हो चुका है लेकिन इसकी भव्यता अब भी दूर से ही महसूस की जा सकती है।

 

वहां से निकलकर सामने बगल के सेब के बागीचों में टहलते हुए साहिल से पूछता हूँ, ‘कोई और मंदिर है आसपास? ऐसा जिसमें पूजा होती हो।’ वह हंसकर ऊपर की एक पहाड़ी की ओर इशारा करता है, वहाँ एक मंदिर है और पास में ही एक मस्जिद। दोनों में इबादत होती है। गाँव मे कई पंडित परिवार हैं जो मुलाज़मत करते हैं और खेती भी। उनका मंदिर भी है। सब वैसा नहीं है यहाँ जैसा इंडियन मीडिया दिखाता है। कभी आराम से समय लेकर आइये आपको आसपास के इलाके घुमाऊंगा। सब देखियेगा ख़ुद।

(ऐशमुक़ाम दरगाह)

लौटना ज़रूरी था। रास्ते में ऐशमुक़ाम दरगाह पर चढ़ने वाले हलवे और पराठे की बहुत तारीफ़ सुनी थी। थोड़ी ऊंचाई पर स्थित दरगाह को हिन्दी फिल्मों के दर्शक बजरंगी भाईजान की शूटिंग लोकेशन के रूप में याद कर सकते हैं। नुन्द ऋषि के शिष्य सूफी ज़ैनुद्दीन वली की इस दरगाह पर पराठा हलवा ख़रीदते वर्तमान कश्मीर की एक बड़ी विडंबना सामने आती है। टोपी दाढ़ी वाला एक मुल्ला सीधे चंदे की रसीद खोलकर कहता है मदरसे के लिए चंदा दीजिए। उसकी भाषा पश्चिमी उत्तरप्रदेश वाली हिन्दी है। मैने पूछा कि कश्मीरी तो हो नहीं आप तो एक अजीब सी निगाह से घूरते हुए चला गया। एक रात पहले बातचीत में एक मित्र ने कहा था, ‘कश्मीर जैसे इस्लाम का प्लेग्राउंड बन गया है। जाने कहाँ कहाँ से आकर ऐसे मुल्ले फैल गए हैं जिन्हें न कश्मीर की परंपरा पता है न यहाँ का इतिहास। उन्हें बस अपना वाला इस्लाम फैलाना है।’

हमारा पड़ाव पहलगाम से कोई छह किलोमीटर पहले लिद्दर नदी के किनारे बसा गाँव महोरा है। सुबह पुलवामा के लिए निकलना है लेकिन दोपहर में वहाँ मुठभेड़ की ख़बर आ चुकी है। रात तक कश्मीर बन्द की ख़बर आ गई। निदा भाई की आवाज़ में हमारी चिंता है और मैं उनके कहे वाक्य –‘यहाँ तो हफ्ते में एक बार हो ही जाता है कुछ न कुछ – में उलझा हूँ।’

( ये न समझें कि पत्थर पर सर पटक रहा है कश्मीरनामा का लेखक….)

 

पिछली कड़ी–

 

इंडिया जानता है कि कश्मीर में क्या चाहता है?