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घाट घाट का पानी : बस एक डीवीडी ने कैसे फेमिनिस्‍ट पोर्न की समझ साफ़ कर दी!

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उस दुकान का नाम है फ़ाम फ़ाताल, फ़्रांसीसी भाषा के इस शब्द का अर्थ कुछ भयानक नारी सा है. अक्सर उसके सामने से गुज़रता था, कभी अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई. इसी तरह एकबार उस सड़क से गुज़र रहा था, अचानक बारिश शुरू हो गई. इससे पहले कि कुछ सोचता, मैं दुकान के अंदर था.

“क्या चाहिये तुम्हें? “ – एक कड़ी जनानी आवाज़ ने सवाल किया.

मैंने मोहतरमा को देखा. उम्र कोई पैंतालीस से पचास के बीच. छरहरा बदन, देखने से ही लगता है कि रोज़ कम से कम एक घंटा कसरत करने में बिताती है. शायद मेरे जैसे शोहदों से निपटने के लिये– मैंने सोचा.

“कुछ ख़ास नहीं. आपकी दुकान को रोज़ देखता था. उत्सुकता होती थी. आज पानी बरसने लगा, सो अंदर चला आया.“ – मैंने ईमानदारी से जवाब दिया.

“ठीक है, देखो. पता है ना, यह फ़ेमिनिस्ट शॉप है?“

“जी, इस वजह से भी मैं उत्सुक था.“

फ़ेमिनिज़्म के दायरे में जो भी आ सकता है, वहां मौजूद था. किताबें थीं, हर फ़ैशन को दुत्कारते हुए फ़ेमिनिस्ट ड्रेस थे, फ़ेमिनिस्ट प्रसाधन सामग्रियां, लेसबियन पोस्टर, फ़ेमिनिस्ट चॉकलेट– मैं घूम-घूम कर देखने लगा.

और तभी मैंने देखा कि कांच के दरवाज़े के पीछे कमरे में किताबें और डीवीडी हैं. मैं दरवाज़ा खोलकर अंदर जाने लगा.

“वह फ़ेमिनिस्ट पोर्न का सेक्शन है.“ – मोहतरमा ने फ़रमाया.

मैंने तय कर लिया था कि आज सब कुछ देखकर जाना है. “मैं भी फ़ेमिनिस्ट हूं.“ – अपना पक्ष मज़बूत करने के लिये पूरे विश्वास के साथ मैंने कहा.

“हुंह… ठीक है, आये हो तो देख लो.“

और इस तरह फ़ेमिनिस्ट पोर्न से मेरा पहला सामना हुआ. किताबें थी, ज़्यादातर लेसबियन पाठकों के लिये. कुछ किताबों में कैसे अपने व्यक्तित्व को बनाये रखते हुए पुरुषों से निपटा जा सकता है, इसकी बारीक हिदायतें थीं. मुझे कुछ ख़ास दिलचस्प नहीं लगी. एक डीवीडी उठाकर मैं काउंटर तक पहुंचा.

“हुंह, अपनी पोर्नोग्राफ़ी से अब मन नहीं भरता है?“ – हिकारत भरे लहजे में मोहतरमा ने पूछा. “ले जाओ, लेकिन तुम्हारा मन नहीं भरेगा.“

“आपको कैसे पता?“

“मैं जानता हूं तुम लोगों को.“

बिना बात बढ़ाये मैंने पैसे चुका दिये. डीवीडी बैग में रखकर निकल आया. पानी बरसना बंद हो चुका था. घर लौटकर सबसे पहले उसे देखना शुरू किया.

…..

फ़िल्म की कहानी थोड़ी अलग सी लगी. 25-26 साल की एक महिला पत्रकार जेल के अंदर की हालत के बारे में रिपोर्ट तैयार करना चाहती है लेकिन उसे जेल अधिकारियों से इजाज़त नहीं मिलती है. वह छिपकर जेल के अंदर घुसती है… एक पाइप से फ़िसलकर आगे बढ़ते हुए, जो बाहर से अंदर तक गई हुई है. मैं सोचने लगा कि ज़रूर आगे जाकर फ़ंस जाएगी, पाइप का दूसरा मुंह क़ायदे से बंद होगा, वर्ना कैदी उसका इस्तेमाल करते हुए जेल से भागने लगते.

ऐसा कुछ नहीं हुआ. कई मिनट तक कैमरा उस पत्रकार युवती पर ठहरा रहा. वह देह से सटी हुई काले रंग की लैटेक्स की पोशाक में थी, जिसमें से हर पेशी की उभार दिख रही थी. मैं सोच रहा था, पाइप के अंदर इतनी रोशनी कहां से आई कि युवती के जिस्म का ज़र्रा-ज़र्रा इतना साफ़ दिख रहा है?

बहरहाल, पाइप के दूसरे सिरे पर लोहे की जाली लगी थी. युवती उसे खोलने की कोशिश करने लगी. लेकिन बाहर को ओर से दो मज़बूत हाथ आए और जाली को उठा लिया गया. एक हाथ युवती की ओर बढ़ा और उसे पकड़कर युवती बाहर निकल आई.

सामने खड़ा था एक लंबा-चौड़ा, ख़ूबसूरत, गोरा, खूंखार अपराधी.

“हल्लो, मेरा नाम स्मिथ है.“ – उस ख़ूंखार अपराधी ने कहा.

“हाय, मैं काटरिना हूं.“ – हमारी युवती ने कहा.

मैं समझ गया कि यह फ़ेमिनिस्ट पोर्नोग्राफ़ी है. तभी उस ख़ूंखार अपराधी ने उस पर कूद पड़ने के बदले सबसे पहले सभ्य तरीके से अपना परिचय दिया. इसमें एक राजनीतिक मेसेज है, कि सेक्स में भी पारस्परिक सम्मान दिखाना पड़ेगा, भले ही वह पोर्नोग्राफ़ी हो.

लेकिन उसके बाद वही सब कुछ हुआ, जो पोर्नोग्राफ़ी में होना था. भाषा में भी लगातार सभ्य शब्दों के दायरे से उन्मुक्त होकर विकास होता गया. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि एपिसोड ख़त्म होने के बाद वह ख़ूंखार अपराधी ज़मीन पर लोटा हुआ हांफ़ रहा था और हमारी पत्रकार युवती बड़ी ही फ़ुर्ती के साथ फिर अपने लैटेक्स लिबास में आ चुकी थी. वह फिर से पाइप के अंदर सरकने लगी तो ख़ूंखार अपराधी ने अब तक की भाषा छोड़कर सभ्य ढंग से उससे विदा ली. युवती पाइप के अंदर घुसकर सरकते हुए आगे बढ़ने लगी. फिर पाइप के अंदर तेज़ रोशनी, जिसमें उसके बदन की उभार का ज़र्रा-ज़र्रा दिखने लगा.

सरकते हुए पत्रकार युवती अगले कमरे तक पहुंची. यहां भी पाइप के दूसरे सिरे पर लोहे की जाली लगी थी. युवती उसे खोलने की कोशिश करने लगी. लेकिन बाहर को ओर से दो मज़बूत हाथ आए और जाली को उठा लिया गया. एक हाथ युवती की ओर बढ़ा और उसे पकड़कर युवती बाहर निकल आई.

सामने खड़ा था एक लंबा-चौड़ा, ख़ूबसूरत, कोयले की तरह काला, एक खूंखार अपराधी.

“हैल्लो, मेरा नाम सैमुएल है.“ – कहते हुए काले ख़ूंखार अपराधी ने कुछ इस तरह अपना हाथ बढ़ाया, मानो पाइप से किसी युवती का बाहर निकलना उसके लिए आम बात हो. बहरहाल, उसके बाद वही किस्सा दोहराया गया. युवती फिर पाइप के अंदर सरकने लगी.

अगला पड़ाव था जेल का किचेन. यहां दो लोग मौजूद थे. एक पचास-पचपन की उम्र का लंबा-चौड़ा, गठीला, दाढ़ीवाला, गोरा ख़ूंखार अपराधी. दूसरा उन्नीस-बीस साल का दुबला-पतला, ख़ूबसूरत, मामूली कद का शर्मीला, गोरा, ख़ूंखार अपराधी. द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय आयाम में कहानी कुछ दिलचस्प हो गई. इसके अलावा मैंने सोचा भी न था कि जेल में इतनी सारी ताज़ी सब्ज़ियों का इस्तेमाल किया जाता है. बैंगन, मूली, खीरा– सब कुछ वहां मौजूद थे. खैर, अंत में युवती फिर पाइप में उतर पड़ी. दोनों ने सभ्य भाषा में उससे विदा ली. पाइप के अंदर रोशनी, लैटेक्स, ज़र्रा-ज़र्रा, वगैरह-वगैरह.

इस बार युवती सीधे जेलर के कमरे में पहुंच चुकी थी. और जेलर…

जेलर एक महिला थी. उम्र कोई पचास साल. लंबी-चौड़ी. हमारी युवती को देखते ही एक मीठी, मोहक मुस्कान के साथ उसने पूछा: “हैलो स्वीटी, तुम यहां कैसे आ गई?“

इसके बाद दोनों एक-दूसरे के साथ मसरूफ़ हो गए. लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं हो गई. जेलर ने गोरे ख़ूंखार अपराधी को बुलवाया. फिर काले ख़ूंखार अपराधी को बुलाया, किचेन से दाढ़ीवाला ख़ूंखार अपराधी आया, मासूम शर्मीला ख़ूंखार अपराधी आया, एक चपटे सीने की चालीस साल की मोहतरमा आई, एक भयानक सीने वाली चालीस साल की मोहतरमा आई, एक बिल्कुल कमसिन, लेकिन 18 साल की वैधानिक उम्र से अधिक की युवती आई, तरह-तरह के शोर होने लगे, कहानी मेरी समझ के दायरे से बाहर खिसकने लगी थी, इतने में…

इतने में एक दोस्त का फ़ोन आ गया. डीवीडी बंद करके मैं उससे बात करने लगा.

लेकिन अब मुझे पता है कि फ़ेमिनिस्ट पोर्नोग्राफ़ी किसे कहते हैं.


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