क्या दलित विमर्शकार सचमुच ब्राह्मणवाद का ख़ात्मा चाहते हैं?


मैंने आजतक नहीं सुना कि दलितों के नेताओं ने कभी कहीं बाबा साहब अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं का सामूहिक पाठ आयोजित किया हो। मैंने ऐसे भी किसी परिवार के बारे में नहीं सुना जो परिवार में ही ऐसे सामूहिक पाठ करते हों। हाँ, ब्राह्मणों को गाली देने वाले बहुतेरे मिलेंगे।


सलमान अरशद सलमान अरशद
जात न जात Published On :


दलित राजनीति के इर्द गिर्द न सिर्फ सियासत बल्कि कला और साहित्य में भी खूब काम हुआ/हो रहा है। इस विमर्श के केंद्र में ब्राह्मणवाद का खात्मा, एक मकसद के रूप में दिखाई देता है, पर क्या सच में ये विमर्शकार ब्राह्मणवाद का खात्मा चाहते हैं ?

ये एक ऐसा सवाल है जिस पर दलित विमर्श के पुरोधा भी मुझे शक के दायरे में नज़र आते हैं। सबसे पहले तो ये समझने की ज़रूरत है कि ब्राह्मणवाद है क्या? सरल शब्दों में कहें तो श्रेष्ठताबोध पर आधारित समाज का बँटवारा, जिसमें निम्न से उच्च या उच्च से निम्न का एक श्रेणीक्रम है। इस क्रम में जो सबसे ऊपर वो श्रेष्ठ, आदरणीय और पूजनीय लेकिन जो सबसे नीचे है वो निकृष्ट व घृणित। इसके साथ ही इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कर्मकांडों की एक अंतहीन श्रृंखला। यानि कि जातिव्यवस्था और धार्मिक कर्मकांड ही ब्राह्मणवाद की आधारशिला है।

इस व्यवस्था की ताक़त का अंदाज़ा लगाइये, बुद्ध, महावीर और गुरू नानक देव तीनों ही इसके खिलाफ थे बावजूद इसके जैन, बौद्ध और सिक्ख तीनों में ही जाति व्यवस्था है। ईसाई और इस्लाम अरब की धरती पर पैदा हुए, दोनों के धार्मिक ग्रंथों में जातिवाद का तसव्वुर भी नहीं है, फिर भी इनमें जातिवाद है। हिन्दुओं के जातिवाद में जो छुआछूत है वो बाकियों में नहीं है लेकिन भेदभाव और श्रेष्ठताबोध पर आधारित श्रेणीक्रम सभी में है।

जाति व्यवस्था में हर जातीय समूह के पास ये सुविधा है कि वो किसी दूसरे जातीय समूह को अपने से निम्नतर माने।

श्रेष्ठताबोध नामक बीमारी किसी न किसी रूप में दुनिया के हर विकसित या अविकसित समाज में मौजूद है। इसके साथ ही इस बीमारी की मुख़ालफ़त भी लगभग हर देश व समाज में हो रहा है। हर इंसान समान है, जाति, नस्ल या रंग के आधार पर उनके बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता। ये वाक्य भले ही महज़ एक जुमला लगे फिर भी दुनिया भर में हज़ारों लोगों के संघर्ष के लिए ये प्रेणास्रोत भी है और लक्ष्य भी।

अब लौटते हैं दलित विमर्श और विमर्शकारों पर। सभी दलित जातियाँ बिना ब्राह्मणवादी कर्मकांड के अंतरजातीय विवाह करें तो उन्हें रोकने वाला कौन है ? इसके साथ ही ये भी एक बड़ा सवाल है कि जो लोग दलित होने के साथ दलित विमर्श के भी बड़े हस्ताक्षर हैं, क्या उन्होंने ऐसे किसी अभियान की ज़रूरत महसूस की ?

अगर आपको ब्राह्मणवाद से तकलीफ़ है तो जन्म से लेकर मृत्यु तक और मृत्य के बाद भी होने वाले तमाम कर्मकांड बन्द कर दें तो क्या कोई ज़बरदस्ती आपसे ये कर्मकांड करवा सकता है ? धोबी चमार के घर, चमार दुसाध के घर, नाई पासी के घर और पासी कुम्हार के घर शपथपूर्वक बिना किसी कर्मकांड के शादी करना शुरू कर दे तो क्या समाज में बड़े बदलाव नहीं होंगे?

फ़ेसबुक पर एक शादी के बारे में पढ़ा था जिसमें दो लोगों ने संबिधान की शपथ लेकर शादी की थी। एक और शादी के बारे में जानकारी मिली जिसमें लड़का और लड़की दोनों सवर्ण पृष्ठभूमि से हैं, उन्होंने मित्रों की मदद से शपथपत्र तैयार किया और उसी के आधार पर शादी की। ऐसे उपाय करने में फिलहाल आज कोई बाधा नहीं है।

अब थोड़ी कड़वी बातें। हमने देखा कि घोड़ी पर चढ़ने वाले दूल्हे को पीटा गया, मूँछ रखने वाले भाई पीटे गए, होटल में सवर्णों की बराबरी करने पर भी पिटाई हुई। अब जरा विचार कीजिये, कमर में तलवार लटकाए घोड़े पर सवार दूल्हा किस बात का प्रतीक है ? लम्बी मूँछ के पीछे का असली भाव क्या है ?

आप शादी में अपना जीवन साथी लेने जा रहे हैं, एक और परिवार को अपने जीवन का हिस्सा बनाने जा रहे हैं, ऐसे में युद्ध की भेशभूषा क्यों ? हलांकि घोड़ी पर बैठना और मूँछ रखना आपका जनतांत्रिक अधिकार है और आपके इस अधिकार के लिए आपके संघर्ष में मैं साथ रहूंगा। लेकिन इससे जातिवाद या ब्राह्मणवाद का क्या बिगड़ने वाला है? फेरे, जयमाला और कर्मकांड तो वही मूल्य हैं न जिनसे आप मुक्त होना चाहते हैं !

मैंने आजतक नहीं सुना कि दलितों के नेताओं ने कभी कहीं बाबा साहब अम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं का सामूहिक पाठ आयोजित किया हो। मैंने ऐसे भी किसी परिवार के बारे में नहीं सुना जो परिवार में ही ऐसे सामूहिक पाठ करते हों। हाँ, ब्राह्मणों को गाली देने वाले बहुतेरे मिलेंगे।

आज जाति व्यवस्था का उन्मूलन इतना कठिन नहीं है जितना अभी कुछ सदी पहले था। जो जातीय समूह अब तक तिरष्कृत रहा है वो अपने ही जैसे दूसरे जातीय समूहों से सुख दुख और रोटी बेटी का रिश्ता जोड़े, संबिधान और बाबा साहब की शिक्षाओं को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाए तो आधा भारत ब्राह्मणवाद से मुक्त हो जायेगा। ये मार्ग कठिन है लेकिन तभी तक जब तक कि पहला कदम उठा नहीं लिया जाता।

 

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


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