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Exclusive: “मैं नब्‍बे से ज्‍यादा नहीं जीना चाहता”– नामवर से अनकट और अंतरंग बातचीत!

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आज से करीब पाँच साल पहले, 2013 के अंत में, जब नामवर सिंह 88 साल के थे, उस वक्‍त मीडियाविजिल के संस्‍थापक संपादक डॉ. पंकज श्रीवास्‍तव ने उनसे लंबी अंतरंग बातचीत की थी। नामवर ने उस वक्‍त कहा था कि वे जीवन से एक-चौथाई असंतुष्‍ट हैं लेकिन उन्‍हें दो बरस से ज्‍यादा जीने की चाह नहीं है। इन्‍हीं दो बरसों में वे कुछ बेहतर लिख देना चाहेंगे।

इस साक्षात्कार में उन्होंने आज़ादी के पहले की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों से लेकर आज़ाद भारत की महत्वपूर्ण घटनाओं पर चर्चा की है। साथ ही साहित्य और आलोचना पर भी गंभीर टिप्पणियाँ की हैं। यह इंटरव्यू एक बड़े कार्यक्रम के लिए लिया गया था लेकिन किसी वजह से वह परियोजना स्थगित हो गई। उन्होंने इस इंटरव्यू में कुछ ख़ास बातें ये कहीं थीं–

क्रांति चंद्रमा की तरह आधा-तीहा नहीं होती, सूरज होती है क्रांति। इसलिए क्रांति को संपूर्ण कहना ही अजीब था। संपूर्ण क्रांति धोखे की टट्टी थी।

आरएसएस बहुत ही खतरनाक संगठन है..इसकी पूरी मनोवृत्ति फासिस्ट है। संगठन के अंदर भी तानाशाही है।

रचना बनाम आलोचना की बहस गलत है। जैसे आदमी की दो आंख होती है। वैसे ही एक आंख रचना है. दूसरी आलोचना। दोनों आंखें नहीं होगी तो साहित्य मुकम्मल नहीं होगा।

इतिहास के मूक नायकों ने हिंदी साहित्य में दस्तक दी है। दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक हिंदी में लिख रहे हैं। स्त्रियों की बड़ी संख्या हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास लिख रही हैं उच्च कोटि का साहित्य है उनका। दलित भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य अब केवल सवर्णो का साहित्य नहीं है। मूक नायक अब मुखर नायक हो गया है। पुरुषों से ज्यादा स्त्रियाँ अच्छा लिख रहे हैं। सवर्ण से ज्यादा अच्छा दलित लिख रहे हैं। कुछ बातें वही लिख सकते हैं। अपने दुख वही ला सकते थे। ऐसा हिंदी साहित्य में बहुत कम रहा है। दलित साहित्य क्रांतिकारी साहित्य है। मिमियाने या घिघियाने वाले नहीं है। दलित साहित्य दया या करुणा का नहीं तेजस्वी साहित्य है

जो क्षमता है मुझमें, योजना बनाकर उतना कर नहीं पाया। तीन चौथाई ही संतुष्ट हूँ जीवन से

मैं साहित्य और आलोचना के जरिये ही टैक्स देता हूँ.

संदेश है युवा रचनाकारों को- प्रेमा पुमर्थो महान ! .प्रेम नहीं प्रेमा कहा गया है, उच्च स्तर का। सबसे बड़ा पुरुषार्थ प्रेम है। जबकि चार पुरुषार्थों में यह नहीं है..धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।

करम फूटै जो अंतय जाए—बनारस के आदमी का बस चले तो कहीं न जाएँ.. लेकिन भैरों का सोंटा लगा और दिल्ल चला आया..बीएचयू में कुछ लोग थे जो नहीं चाहते थे कि मैं वहाँ रहूँ…दिल्ली कोई रहने की जगह है…मिलने की जगह तक नहीं बचीं.

आखिरी सवाल—ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास है आपको ?

नामवर जी का जवाब–संदेह नहीं है उसके बारे में, इतना ही कह सकता हूँ। अपने में अगर विश्वास है तो ईश्वर पर विश्वास है। ‘ईश्वर’ तो सीमित है। उपनिषदों में इसीलिए ब्रह्म कहा गया है।

इस साक्षात्‍कार को बिलकुल संपादित नहीं किया गया है, यह देखकर समझ में आएगा। देखिए मीडियाविजिल की यह एक्‍सक्‍लूसिव प्रस्‍तुति।  

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