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NDTV छापे से ज़ी ख़ुश हुआ ! अब ‘राष्ट्रवादी’ रंगदार को पत्रकार मानिए !

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एनडीटीवी प्रमोटर पर छापे के दौरान ज़ी अजीब सी खुशी के साथ खबर चला रहा था. शायद उन्हें इस बात की शिकायत है कि जब उनकी इज्ज़त का जनाज़ा निकल रहा था तब उनका साथ किसी ने नहीं दिया. ज़ी का दर्द एक हद तक सही भी है. तब सभी ने चौधरी और अहलूवालिया का स्टिंग बिना ऐसे कुछ लिखे चलाया था कि “ये पत्रकारिता पर हमला है”.

अब ज़ी हर बार जश्न मनाता है. जब एक दिन के एनडीटीवी बैन की खबर आई तो भी.. जब छापेमारी की खबर आई तो भी. उसे लगता होगा कि कुदरत ने आज उसे हंसने का मौका दिया है तो वो क्यों ना हंसे. बावजूद इसके सच बदल नहीं सकता कि उनका मामला खबर ना दिखाने के लिए संपादकों द्वारा रंगदारी की रकम तय करने का था और ये सब एक बिज़नेसमैन की वित्तीय अनियमितता का केस है जिसमें बैंक का कर्ज़ ना लौटाना प्रमुख है. दोनों मामलों की गंभीरता की तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. ज़ी के मामले में पत्रकारिता पर हमला तब माना जाता जब कैमरे पर जिंदल का आदमी खबर रोकने के पैसे तय करता और ज़ी के संपादक खुले आम कहते कि हम बिकनेवाले नहीं. वहां ऐसा कुछ नहीं था. हां, जब जिंदल ने स्टिंग सार्वजनिक कर दिया तब ज़रूर ज़ी ने कहा कि हम तो खुद मीडिया को खरीदने की इस चाल का पर्दाफाश करनेवाले थे. हालांकि ये कभी नहीं पता चला कि कैसे ? सीबीआई ने विदेश से लौटते ही घंटों तक वर्तमान सांसद चंद्रा जी से पूछताछ की और उन्होंने सीबीआई की पूछताछ के तुरंत बाद अपने संपादकों की क्लास लेने वाले ढंग में बाइट भी दी. वो फिर अलग कहानी है कि कैसे संपादकों से मिलने के बाद चंद्रा जी हल्के पड़ते चले गए. सवाल आज भी कायम है कि क्यों ??

खैर आगे चलकर संपादकों का ना सिर्फ प्रमोशन हुआ बल्कि एक को तो जनता में अपनी छवि चमकाने के लिए फ्री हैंड दिया गया कि वो अपने शो को भयानक राष्ट्रवादी बनाकर हीरो बन जाए. इसके लिए अलग से लोगों की भर्ती हुई. आज कर्मचारियों की पूरी फौज सारा दिन सिर्फ एक शो में चांद तारे जड़ने के लिए लगी रहती है. वो जानती है कि ये शो सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं बनता. ये टीम की अनवरत मेहनत का परिणाम है कि आज कोई भी उस “रंगदार संपादक” की बात नहीं करता. अब सबको राष्ट्रवादी शोर ने बहरा कर दिया है. स्वयं चंद्रा जी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए टीवी पर अमीर बनने के टिप्स बेचने शुरू किए. कई साल तक उस बोरियत से भरपूर शो को चलाकर वो भी अंतत: करियर गुरू जैसी इमेज बनाने में कामयाब रहे. दोनों ही लोगों ने विश्वसनीयता के संकट से जूझते हुए टीवी का उपयोग अपने निजी छवि निर्माण में जिस तरह योजनाबद्ध ढंग से किया उस पर मैं कभी पीएचडी का शोध करना चाहूंगा.

आज दोनों के पास अपना बचाव करने के लिए फैन्स का साथ है. यकीन ना हो तो फैन पेज देख आइए. संपादक जी के नाम से लगे होर्डिंग तो मैंने दिल्ली के पॉश इलाकों तक में पाए हैं. ये अभूतपूर्व है जब एक संपादक को कुछ लोग नेता की तरह प्रमोट कर रहे हैं.अब तो कोई उनका स्टिंग कर दे तो पहले की तरह परेशानी नहीं होगी. वो उसे अपने स्तर से पत्रकारिता पर हमला कह कर या सीधा सीधा राष्ट्रवादी पत्रकारों पर हमला कह कर बच निकलेंगे. निजी हितों की लड़ाई को कैसे अभिव्यक्ति या विचार की लड़ाई में बदला जाए ये उसकी तैयारी है. क्रिकेट मैच का बायकॉट दरअसल अपने उसी खास रुझानवाले फैन को ये भरोसा दिलाने के लिए है कि जब सारे मीडिया के लिए देश से ऊपर क्रिकेट हो गया था तब हम अकेले भारतीय सेना का पराक्रम दिखा रहे थे.

उससे उलट एनडीटीवी ऐसी कोई कोशिश कभी करता नहीं दिखा.उन्होंने सरकारों से सवाल पूछे. भले चैनल का प्रमोटर कोई वित्तीय खेल करता ही रहा हो तो भी चैनल के तेवर ने पत्रकारिता के बेसिक्स के साथ खिलवाड़ नहीं किया. खिलवाड़ तब होता जब चैनल धीरे धीरे अपनी टोन डाउन करता ताकि उसके प्रमोटर को सरकार के कोप से किसी हद तक बचाया जा सके. इससे उलट वो टीआरपी में जितना पिछड़ा उसका तेवर ज़्यादा ही तल्ख होता गया. बैन का नोटिस भेजकर सरकार ने सोचा होगा कि चेतावनी देकर चैनल के सुर साध लेगी मगर रवीश कुमार की काली स्क्रीन का मैसेज साफ था. चैनल बैन तो सरकार ने वापस लिया ही.. प्रतिरोध की बहार देखकर समझ आ गया कि भले ही मालिक पर हमला कर दो लेकिन चैनल से बचकर रहो. चैनल की लड़ाई जो चेहरा लड़ रहा है उसे देश के करोड़ों लोगों का भरोसा हासिल है. बीच में उसकी क्रेडिबिलिटी भी खत्म करने की साज़िश हुई. भाई पर छिछला सा आरोप लगा और ट्रोल रवीश को किया जाने लगा. उसके बाद सोशल मीडिया पर किसी रवीश की छोटी बहन को भी ट्रोल किया गया. ट्रोल करनेवालों को इस तथ्य से बहुत लेनादेना नहीं था कि रवीश की कोई बहन ही नहीं है.

खैर.. दो चैनलों के पाप की तुलना से मीडिया का कोई भला नहीं होनेवाला. मैंने ये लड़ाई पहली बार पाकिस्तानी चैनल्स पर देखी थी जहां एंकर खुलेआम ऑन एयर अपने प्रतियोगियों की खिंचाई करते हैं. भारत के चैनल इस मामले में बेहद अनुशासित रहे मगर पहली बार इस नियम को ज़ी ने ही तोड़ा. उसने ही सबसे पहले सेकुलर मीडिया जैसी बात कहके देश को समझाने की कोशिश की.. कि वो खुद बाकी सबसे अलग हैं और सेकुलर तो कतई नहीं हैं. उसने ये हरकत इतनी बार दोहराई कि एक बार तो चैनल के मालिक को ऑन एयर सफाई देनी पड़ी कि हम किसी पार्टी के साथ नहीं हैं. ये ऐतिहासिक सफाई वो तब दे रहे थे जब कुछ महीने पहले अपने ही चैनल पर एक पार्टी के लिए प्रचार करते और वोट मांगते दिखे थे. ज़ाहिर है उनकी सफाई कपिल की कॉमेडी की तरह मज़ेदार थी. वैसे उनके विरोधी नवीन जिंदल तो और भी माशाअल्लाह निकले. उन्होंने ज़ी को घेरने के लिए एक चैनल ही खरीद डाला.

ज़ी फिर भी किसी ज़माने में कभी शानदार पेशेवर चैनल था जिसने राजनीतिक खबरों को बेहद अच्छे ढंग से रखने में साख बनाई थी मगर जिंदल इस पेशे में सिर्फ इसीलिए उतरे क्योंकि उन्हें ज़ी के हमलों का जवाब उसी की भाषा में देना था. इस सबमें किस को कितना फायदा हुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन पत्रकारिता का नुकसान बहुत हुआ. विरोधी चैनल को अपने खिलाफ खबर चलाने का कानूनी नोटिस भिजवाने वाला खेल ये दोनों खूब खेलते रहे हैं.

भारतीय पत्रकारिता ने दो बिज़नेसमैन की लड़ाई में अपना इतना खून कब बहाया था याद नहीं. इतने बड़े मामले की जांच कहां तक पहुंची आज ये कोई नहीं जानता. वैसे मोदी सरकार को इनकी लड़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है. कोल ब्लॉक की जिस जंग में दोनों के हाथ काले हुए उस पर अब कोई बात नहीं करता. सरकार के पास वक्त और ऊर्जा लगाने के लिए आज खुद का एक शत्रु है और फिलहाल उसका फोकस पूरी तरह उसी पर है. फोकस ना होता तो वो इतने छिछले आरोप में सीबीआई को कभी नहीं उतारती.

प्राइवेट बैंक का कर्ज़ ना लौटाने का केस और उसमें भी एक ऐसे आदमी की शिकायत जो कभी इसी ग्रुप का खास रहा है सब कुछ ज़ाहिर करने के लिए काफी है. आरोप तो इतना कमज़ोर है कि जिसकी हद नहीं. प्रणय रॉय के पास कर्ज़ चुकाने के कागज़ात मौजूद हैं. अलबत्ता कागजों के सही गलत का फैसला बाद की बात है. अब लगे हाथ बता दूं कि जिस फेमा के उल्लंघन में चैनल की अक्सर खिंचाई होती है ठीक वही मामला एक अन्य मीडिया संस्थान पर भी है लेकिन उसे सरकार के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री के बहुत करीबी होने का ज़बरदस्त फायदा मिल रहा है. मोदी के राज में कानून का डंडा इतना सेलेक्टिव होकर चलेगा ये अंदाज़ा लगाना तब बेहद आसान हो गया था जब गुजरात की एजेंसियों ने सरकार बनने के बाद उन तीस्ता सीतलवाड़ पर औने पौने आरोप लगाए जिसने गुजरात दंगों के मामले में मोदी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया.

आज जो हो रहा है वो सीबीआई से पहले भी कराया गया है. इस काम में अब उसे महारत हासिल है. खुद मोदी का वो वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद है जिसमें वो सीबीआई को कांग्रेस की कठपुतली बता रहे हैं. आज देश किस आधार पर मान ले कि वो प्रधानमंत्री का तोता नहीं है ?  मीडिया के उस खेमे से उनकी खुन्नस यूं भी पूरानी है जो अक्सर उनसे गुजरात दंगों पर सवाल करता रहा है. वो तो लाल किले तक से मीडिया को पाठ पढ़ा चुके हैं. उनके लिए मीडिया को उसकी हैसियत दिखाना कितना ज़रूरी है ये इसी बात से समझिए कि तीन साल गुज़र गए उन्होंने कभी खुलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की.. अलबत्ता संपादकों से अलग मिलकर निर्देश और सलाह देते रहते हैं. आज सत्ता उनके पास है और उसके साथ सीबीआई दहेज की तरह मिलती है. अब ये प्रधानमंत्री के विवेक पर है कि वो सीबीआई का इस्तेमाल व्यापमं जैसे बड़े घोटालों में कायदे से करते हैं या फिर अपने पूर्ववर्तियों की तरह विरोधियों को निपटाने और ब्लैकमेल करने में करते हैं. देश उन्हें देख रहा है.. वो कहां देख रहे हैं??




नितिन ठाकुर

लेखक टीवी पत्रकार हैं।

 



 

2 COMMENTS

  1. . . .PICHLE SAAL JNU MAMLE KO “CHHEE” NEWS NE JESE BHAGVE RANG SE DIKHAYA AUR OOSKE EK VARISTHA JOURNALIST NE IS CHANNEL KI NOKRI KO JO “galinuma istifa “bheja vo bhartiya patrakarita ka ek etihasik din ban gaya.

  2. An alleged case of extortion. is tolerable but we can’t tolerate a Channel that always goes against national security and interest . Several times this Channel gave such reporting that was against national interest

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