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प्रसंगवश हेमंत शर्मा : ‘लगा कि अब मर्यादा गई, तब गई, पर बच गया!’

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‘हेमंत शर्मा’- यह नाम इतना रेगुलर, शाकाहारी और पड़ोसभावप्रवण है जितना कबीरचौरा के किसी भी आम निवासी का नाम। कबीरचौरा यानी वही मोहल्‍ला जहां की हेमन्‍त शर्मा पैदाइश हैं। हेमन्‍त शर्मा कौन? अगर सीबीआइ के इंस्‍पेक्‍टर यासिर अराफ़ात को इस सवाल का जवाब पता होता तो इंडिया टीवी के पूर्व समाचार निदेशक के आगे ऐसा सेलेक्टिव ‘तमाशा’ न हो रहा होता, जिसके वे स्‍वाभावतन मुरीद रहे हैं। झज्‍जर मेडिकल कॉलेज घोटाले के मामले में सीबीआइ की एफआइआर 3 अगस्‍त को दर्ज हुई थी। न केवल उस दिन, बल्कि साल भर पहले से जानने वाले जानते थे कि दाल घोटाले से लेकर मेडिकल घोटाले तक देश का कौन सा बड़ा टीवी पत्रकार लिप्‍त है। लोगों ने निजी क्षमता में सार्वजनिक माध्‍यमों पर नाम भी लिया था, लेकिन सीबीआइ के इंस्‍पेक्‍टर लगता है दीन-दुनिया से निर्लिप्‍त नौकरी करते हैं जो उन्‍होंने हेमंतजी के यहां छापा मार दिया। हुआ भी यही है। वो तो ऐन मौके पर एजें‍सी जान गई कि भले ये आदमी कबीरचौरा का है लेकिन ‘औघड़नाथ की तकिया’ से इसका पुराना लेनदेन है। सो, एफआइआर में नाम नहीं आया। पंद्रह दिन तक सब चुप रहे।

जिन्‍होंने लिखा भी, सीबीआइ के उच्‍च सूत्रों के हवाले से। अब यह सूत्र का खेल थोड़ा पुराना हो चुका है। हर ऐरा-गैरा सीबीआइ के सूत्र के हवाले से कुछ भी छाप देता है। कायदे की पत्रकारिता में ऐसा नहीं करना चाहिए। इसीलिए ‘दि वायर’ ने जब मेडिकल घोटाले में हेमंत शर्मा के नाम को रजत शर्मा के बयान के सहारे ”इट्स ऑफीशियल” कहा, तो हमने सोचा कि इस पर टेक लगाई जा सकती है। ”सत्‍याग्रह” ने भी यही किया है। सो नीचे आप जो कुछ पढ़ेंगे, मानकर पढि़एगा कि ”दि वायर” ने वाकई रजत शर्मा से बात की होगी और रजत शर्मा ने हेमंत शर्मा के बारे में उससे जो कुछ कहा है, वह वाकई कहा होगा और इसे हम हाजि़र-नाजि़र मानकर ही बात को आगे बढ़ा रहे हैं वरना छोटी-मोटी बात पर मानहानि महसूस हो जाने के इस दौर में बिना सबूत के किसी का नाम लेना खतरे को न्‍योता देना है।

आप समझ सकते हैं कि पूरा मीडिया सब जानते हुए भी एक बड़े संपादक के नाम पर अब तक क्‍यों चुप है। दरअसल, कबीरचौरा से निकलकर मुझे नहीं लगता कि किसी ने इतनी लंबी और भव्‍य यात्रा तय की होगी, जैसी हेमंत शर्मा की रही है। एक दौर में एसपी सिंह की शादी दिल्‍ली में ख़बर बनी थी। हिंदी के दरिद्र और नैतिक समाज में ग़ाजीपुर से निकला एक पत्रकार अपनी शादी इतने अश्‍लील तरीके से करेगा, यह किसी की कल्‍पना से बाहर था। उस वक्‍त ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ में संपादक आनंद स्‍वरूप वर्मा ने ‘एक पत्रकार की शादी’ के नाम से लेख लिख मारा था। लोग बताते हैं कि एसपी थोड़ा शर्मिंदा भी हुए थे। अब पत्रकार क्‍या, उनके बेटे-बेटियों की शादी और जन्‍मदिन ऐसे मनते हैं।

हेमंत शर्मा तो ख़ैर बहुत दूर की चीज़ हैं। पिछले साल सर्दियों में आजतक के एक पत्रकार ने अपनी बिटिया का जन्‍मदिन एक दक्षिण भारतीय सांसद के बंगले में मना लिया। अब ये चीज़ें अखरना बंद हो चुकी हैं, शायद इसीलिए हेमंत शर्मा की बिटिया की शादी में भारत के प्रधानमंत्री समेत तकरीबन समूची कैबिनेट, पूर्व मुख्‍यमंत्री हीरो-हिरोइन, नेता-परेता का होना रेगुलर बात थी। आजकल इसे कामयाबी कहते हैं। एसपी के दौर में भी ऐसे ही पत्रकारों को कामयाब कहा जाता था। शेखर गुप्‍ता आज से नहीं, दशकों से ऐसी पार्टियां दिए जा रहे हैं। पत्रकारिता में कामयाबी का पैमाना बिलकुल नहीं बदला है, लेकिन बुनियादी बात यह है कि सब कुछ करते हुए ”भ्रष्‍टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस” बनी रहनी चाहिए। रजत शर्मा ने दि वायर से यही कहा है कि वे भ्रष्‍टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस रखते हैं और हेमंत शर्मा उनकी इस नीति का सम्‍मान करते थे। ग़ज़ब सम्‍मान है कि सम्‍मान करते हुए भी कंपनी छोड़ गए। निकाल दिए गए। या छुट्टी पर चले गए। अब तीनों में से जो समझना हो, समझिए।

मूल बात वह है जो तुलसीदास कह गए हैं, ”श्रवण समीप भये सित केसा” अर्थात् हेमंत शर्मा के अनुसार (तमाशा मेरे आगे, हेमंत शर्मा, पृष्‍ठ 26) ”बालों में सफेदी इस बात की सूचना है कि अब आप अपनी दुकान समेटिए। आपके समाचार समाप्‍त हो रहे हैं। आप राम भजन में लगें।” हेमंत लिखते हैं कि तुलसी बाबा के कहे मुताबिक उन्‍हें कायदे से 25 साल की उम्र में ही दुकान समेट लेनी चाहिए थी क्‍योंकि कुदरत ने उनके बालों पर तभी मेहरबानी कर दी थी, लेकिन वह तो कायदे से दुकान लगाने की उम्र थी। बाबा तुलसी के विरोध में जाने के बाद आखिर हुआ क्‍या? वे खुद लिखते हैं, ”मेरी खोपड़ी में अगर कुछ था तो इन बालों ने खूब चूसा।”

उनकी खोपड़ी में क्‍या था? ज़ाहिर है इसका सबसे प्रामाणिक जवाब तो वे ही दे सकते हैं लेकिन वे फिल़हाल अपनी पहुंच से बाहर हैं। एक बनारसी होने के नाते मोटामोटी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनकी खोपड़ी में बाल पकने से पहले का जो कबीरचौरा था, मार्क्‍स से चार दशक पहले वाला जो साम्‍यवाद था, उसे पके बालों ने टंकार घृतकुमारी तेल की तरह चूस लिया। एक समस्‍या यह भी हुई कि इस बनारसी गोल के गुरु गोविंदाचार्य ज्ञान प्राप्ति में स्‍लो रहे, लिहाजा उनके चेले इसका लाभ उठाकर बीच के वक्‍फ़े में पूंजीवादी बन गए। गोविंदजी को दस साल के एकांतवास और तप करने के बाद जब समझ में आया कि भूमंडलीकरण और पूंजीवाद तो बुरी चीज़ है, तब तक हार्ट और नेग्री की जोड़ी फ्रिक्‍शनलेस यानी घर्षणमुक्‍त पूंजीवाद की अवधारणा तक जा पहुंची थी। हेमंत शर्मा दिल्‍ली में थे। जनसत्‍ता से काफी आगे आ चुके थे और ज्ञान के क्षेत्रों में अपनी जानकारी अद्यतन रखते थे। गोविंदजी को सत्‍य मिलने तक उन्‍होंने अमेरिकी दार्शनिकों पर भरोसा किया और घर्षणमुक्‍त पूंजीवाद का अभ्‍यासी बनकर एक साथ भाजपा से लेकर सपा तक सबको साधा। इस साध का फल मिला। मालिक रजत शर्मा, जो ग़ाज़ीपुर के तिवारीजी की बिल्डिंग में भारी किराया भर-भर के परेशान थे, उन्‍हें नोएडा के एक निर्जन सेक्‍टर में खेत के बीच ज़मीन मिल गई। मालिक को ज़मीन दिलवाकर हेमंत शर्मा ने दरअसल इंडिया टीवी के बाहर अपनी ज़मीन तैयार कर ली।

यह ज़मीन बहुत मज़बूत थी। इतनी मज़बूत, कि जब चौतरफ़ा अटकलें लग रही थीं कि रजत शर्मा भाजपा से राज्‍यसभा चले जाएंगे, उस वक्‍त मालिक का पत्‍ता कटवाकर हेमंत शर्मा ने स्‍वपन दासगुप्‍ता को हरी झंडी दिलवा दी। दि कारवां एक वरिष्‍ठ संपादक के हवाले से लिखता है, ”हेमंत शर्मा ने रिंग में अपनी टोपी उछाल दी” मने इशारा कर दिया कि किसे चुना जाना है। यह यूं ही नहीं था। इसकी पृष्‍ठभूमि लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस में कैंटोनमेंट के एक होटल में तैयार की जा चुकी थी जिसमें अमित शाह और दासगुप्‍ता समेत कई अन्‍य पत्रकार भाजपा के खर्च पर रोके गए थे। चौक से गुलाब, केवड़े और चमेली की ठंडई की निर्बाध आपूर्ति के बीच सबके लिए चुनावोत्‍तर गोटी सेट की जा रही थी। यही वह दौर था जब हेमंत शर्मा बनारस के बेताज बादशाह बनकर परदे के पीछे से नमूदार हुए थे और सघन गर्मी के महीनों में बिना पसीना छोड़े एक तड़ीपार और उसके साहेब के लिए औघड़ों के तकिये की मिट्टी को हथेलियों के बीच रगड़-रगड़ कर भुरभुरा कर रहे थे।

वह 13 मई, 2014 का दिन था। मतदान के अगले दिन बनारस की गलियों में सन्‍नाटा लोट रहा था। अस्‍सी के चौराहे पर फ्लैग मार्च निकल रहा था। मोहल्‍ले में रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के एक पुराने कद्दावर नेता अपने दालान में समर्थकरहित अवस्‍था में कुछ यूं बैठे हुए थे गोया सुबह से किसी ने गुरु कहकर एक बार भी नहीं पुकारा हो। उन्‍हें इस चुनाव में कोई भूमिका नहीं दी गई थी। उन्‍हें ही क्‍यों, तमाम पुराने राष्‍ट्रवादियों को सिरे से छांट दिया गया था। यह अमित शाह की बिसात थी जिसे बिछाने का काम हेमंत शर्मा ने टॉप गियर में किया था जबकि अस्‍सी चौराहे पर रुष्‍ट नेताओं को पैसिफाइ करने का जिम्‍मा रिवर्स गियर में रहने वाले केके मिश्रा ने अफ़वाहबाजि़यों और किस्‍सों के सहारे संभाल रखा था। तो नेताजी ने दालान में बैठे-बैठे ही दूर से हाथ हिलाया। पास पहुंचते ही हालचाल के सवाल पर पहली गाली उन्‍होंने हेमंत शर्मा और केके मिश्रा की जोड़ी के लिए निकाली जबकि दूसरी गाली अपने घर की औरतों के लिए, जो आम आदमी पार्टी को वोट देकर आई थीं।

औरतों को पास देते हुए जब बाकी के बारे में बात आगे बढ़ी, तो उक्‍त नेता ने एक बात कही। वे बोले, ”देख लीजिएगा, मड़वरिया (बनारस में आम तौर से मारवाड़ी को लोग माड़वारी बोलते हैं) सबको खा जाएगा। जो जितना करीब होगा, वो सबसे पहले पेलाएगा।” यह बात ज़ेहन में कायम रही। यूपी का चुनाव आया और हेमंत शर्मा टिकट दिलवाने की स्थिति में आ गए। नोएडा के सेक्‍टर-44 के जिस मकान में सीबीआइ ने छापा मार के रिश्‍वत के पैसे पकड़े थे, अमित शाह वहां अकसर आते थे। सेक्‍टरवासी इसके गवाह हैं। वहां से वी.के. शर्मा नाम के जिस शख्‍स को पकड़ा गया, उसी ने यूनीटेक क्‍लब में अपने पैसे से हेमंत शर्मा की बिटिया की शादी की पार्टी रखी थी जिसमें नोएडा के सांसद और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा समेत कुमार विश्‍वास भी मौजूद थे। इस मकान को आंखें होतीं तो शायद हेमंत शर्मा के बाल धूप में न पकने की गवाहियां दिलवायी जा सकती थीं। फिलहाल वी.के. शर्मा समेत दो और जो न्‍यायिक हिरासत में हैं, वे ही सीबीआइ के गवाह हैं। चौथा फरार है। कुल चार नाम एफआइआर में हैं।

जब इन तीनों को ग़जि़याबाद की सीबीआइ अदालत में पेश किया गया, तो एक स्‍थानीय रिपोर्टर को भनक लग गई कि वी.के. शर्मा ने सीबीआइ को दिए अपने बयान में किसी हेमंत शर्मा का नाम लिया है। नाम चूंकि कबीरचौरा ब्रांड है, तो रिपोर्टर भी रिपोर्ट करने में नहीं हिचकिचाया। डेस्‍क ने हालांकि अपना काम ईमानदारी से किया और ख़बर से शर्मा का नाम काट दिया। इस बारे में जब रिपोर्टर को फोन मिलाया गया, तो उसने दो टके का बयान दिया, ”कौन हेमंत शर्मा? आप जानते हैं क्‍या?” इसे कहते हैं हलके नाम का वज़न।

यही वह वज़न है जिसने सारे मीडिया को एक संपादक की घोटाले में संलिप्‍तता पर ख़बर करने से रोके रखा। कायदे से देखें तो दि वायर को रजत शर्मा का दिया बयान भी कुछ साबित नहीं करता। हेमंत शर्मा का नाम इस मामले से जोड़ने के सर्कमस्‍टेंशियल यानी परिस्थितिजन्‍य कारण गिनाए जा रहे हैं, कि उन्‍हें नौकरी से मुक्‍त किया जाना इसका एक साक्ष्‍य है। यह भी हालांकि लचर तर्क ही है। हां, अगर किसी ने गुड़गांव में हुए इंडिया टीवी के एक निजी आयोजन पर नज़र रखी होगी, तो वह समझ पाएगा कि हेमंत शर्मा का इंडिया टीवी से निकलना कैसे रजत शर्मा को कमज़ोर कर गया है। हेमंत शर्मा के एक पुराने पत्रकार साथी बताते हैं कि कुछ दिन पहले हुए इस आयोजन में अतिथियों की सूची पर हेमंत शर्मा ने एक बार फिर से ”रिंग में टोपी उछाल दी” यानी वीटो कर दिया। नतीजा- नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक कोई भी वहां नहीं पहुंचा।

यह अभी-अभी की बात है। हेमंत शर्मा के इंडिया टीवी से बाहर आने के बाद की बात।

दिसंबर 2014 में रजत शर्मा नेआप की अदालत के 21 साल पूरे होने पर भव्‍य कार्यक्रम रखा था। उसके आमंत्रितों की सूची देखकर कोई भी गश खाकर गिर जाता। यह चमक हेमंत शर्मा की ही दी हुई है। अब शर्मा-शर्मा की जोड़ी टूट चुकी है तो इंडिया टीवी का रसूख थोड़ा कम हो जाएगा। जहां तक हेमंत शर्मा का सवाल है, तो अब तक उनके खिलाफ़ कोई साक्ष्‍य नहीं है। वी.के. शर्मा का बयान होगा भी तो सीबीआइ की चार्जशीट में गोपनीय होगा, बाहर नहीं आया है। इसके बावजूद पूरे मीडिया में अगर हेमंत शर्मा के नाम की मुंहामुंही हफ्ते भर से चल रही है और कोई लिखने की स्थिति में नहीं, तो समझा जा सकता है कि मीडिया पर दबाव कितना ज्‍यादा है। सीबीआइ पर तो ख़ैर होगा ही।

इस स्थिति को कैसे देखा जाए? अस्‍सी के पुराने कद्दावर भाजपाई नेता और वे तमाम बनारसी राष्‍ट्रवादी नेता जिनके दिल पर हेमंत शर्मा की चोट पहुंची है, खुश होंगे। जिनके टिकट कट गए, वे भी संतुष्‍ट होंगे। हेमंत शर्मा के समधी थोड़ा सतर्क होंगे, जो अभी-अभी यूपी के विधायक बने हैं। रजत शर्मा की सेहत पर शायद ज्‍यादा फर्क न पड़े, क्‍योंकि गए-बीते हाल में भी उनके पास बालसखा अरुण जेटली का साथ है। भाजपा?

घोटाले में तो वह हेमंत शर्मा का नाम साफ़-साफ़ आने से बचा ले जाएगी वरना घोटाले की पूंछ लंबी होती जाएगी। जो चार नाम एफआइआर में दर्ज हैं, वे बलि का बकरा बना दिए जाएंगे। हां, हेमंत शर्मा को लेकर इस घटना ने फि़तना तो बो दिया है। उन पर कोई आरोप नहीं है लेकिन जो है, वह औपचारिक आरोप से भी ज्‍यादा असरकारी हो सकता है। पहली संभावना यह है कि हेमंत शर्मा का पत्रकारीय जीवन समाप्‍त और राजनीतिक जीवन शुरू। वे मोदी के चुनाव क्षेत्र के मैनेजर की भूमिका में थे। मैनेजर तो ज़रूरत के हिसाब से बदले भी जाते हैं। इस लिहाज से उन्‍हें संभव है कि शेरवानी पहना दी जाए। किसी मर्यादा वाले पद पर कहीं भेज दिया जाए।

दूसरी संभावना यह है कि वाकई उनके बाल अब पूरी तरह पक चुके हैं। भाजपा के लिए यूपी चुनाव के बाद उनकी सक्रिय भूमिका खत्‍म ही हो चुकी है। वे कई ची़जों के राज़दार भी हैं। इसलिए शायद 2019 के लिए उन्‍हें कोई अलहदा भूमिका सौंपी जाए। इतना तो तय है कि जिस नाभिनाल ने उन्‍हें अब तक पोसा है, उससे अलग होने का सपना वे नहीं देख सकते।

एक तीसरी और ज्‍यादा व्‍यावहारिक संभावना यह है कि हेमंत शर्मा के मामले को (इंडिया टीवी से निकाले जाने को) ”भ्रष्‍टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस” की नज़ीर के तौर पर पेश करते हुए कुछ सत्‍ताविरोधी पत्रकारों को टारगेट करने का काम किया जाए। दिखाया जाए कि देखो, हम तो अपने आदमी को भी नहीं बख्‍शते। यह दूर की कौड़ी है लेकिन पैटर्न में फिट बैठती है।

तीनों संभावनाएं विडंबना हैं क्‍योंकि समूचे मामले में हेमंत शर्मा ऑन दि रिकॉर्ड कहीं नहीं हैं। बीजेपी हालांकि ऐसी विडंबनाओं की उस्‍ताद है। याद कीजिए गोरखपुर, जहां योगी ने कह दिया कि ऑक्‍सीजन से कोई नहीं मरा लेकिन इसकी जांच करने के लिए कमेटी भी बना दी। जब पता है कि ऑक्‍सीजन की कोई भूमिका नहीं तो कमेटी किस बात की? मने कुल मिलाकर एक सर्कस चल रहा है। गुलटिया खाना ही समकलीन धर्म है।

हेमंत शर्मा के एक पुराने पत्रकार मित्र इस स्थिति पर एक दिलचस्‍प तुलना पेश करते हैं, ”जैसे सर्कस में होता है, कि एक जोकर दूसरे जोकर को मारता है लेकिन गिरता तीसरा जोकर है, यहां बिलकुल वही हुआ है।”

हेमंत शर्मा अच्‍छे से जानते हैं कि चंद जोकरों के मारने से वे गिरने वाले नहीं हैं। अपनी पुस्‍तक ‘तमाशा मेरे आगे’ में ‘महिमा मालिश की’ नामक अध्‍याय में उन्‍होंने अपने ‘भोगे हुए यथार्थ’ के सहारे एक मार्के की बात कही है जो प्रस्‍तुत प्रसंग को समझने में कारगर हो सकता है। वे लिखते हैं कि बनारस में उनके मोहल्‍ले के कल्‍लू पहलवान नल पर ही लंगोट बांधते थे इसलिए मालिश करवाने से पहले लंगोट बांधना उनके लिए आसान काम था। आगे वे लिखते हैं, ”भाई लोग मेरी मालिश कर रहे थे और मैं लंगोट के फट जाने के डर से भयाक्रांत था। लगा कि अब मर्यादा गई, तब गई, पर बच गया।”

 

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