Home टीवी रवीश कुमार के ‘डर’ पर सवाल उठाता सुशांत सिन्‍हा का खुला पत्र!

रवीश कुमार के ‘डर’ पर सवाल उठाता सुशांत सिन्‍हा का खुला पत्र!

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सुशांत सिन्‍हा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। एनडीटीवी में काम कर चुके हैं। रवीश कुमार के सहकर्मी रहे हैं। आजकल इंडिया न्‍यूज में हैं। इन्‍होंने रवीश कुमार को एक खुला पत्र लिखा है जिसकी चर्चा इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के लोगों के बीच है। वैसे तो खुले पत्र के लिए रवीश कुमार खुद जाने जाते हैं। अभी हाल में उन्‍होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखकर पूछा था कि क्‍या पीएम को फॉलो करने वाले वे लोग जो रवीश को ट्रोल करते हैं, कहीं उन्‍हें मरवा तो नहीं देंगे। रवीश लगातार अपने मारे जाने, ट्रोल किए जाने, अपने भीतर के डर आदि के बारे में बोलते रहे हैं। सुशांत सिन्‍हा ने इसी डर पर सवाल खड़ा किया है। रवीश कुमार की निंदा या आलोचना करने वाले लोगों की भाषा के उलट सिन्‍हा की भाषा बहुत विनम्र है, बातें दलील के साथ रखी गई हैं और कुछ घटनाओं का जि़क्र किया गया है।
मीडियाविजिल इस पत्र में उल्लिखित घटनाओं की पुष्टि नहीं करता लेकिन एक पूर्व सहकर्मी और वरिष्‍ठ पत्रकार की ओर से लिखे गए पत्र को बहसतलब बेशक समझता है। वैसे तो खुले पत्रों की परंपरा यह है कि इसे लिखते सब हैं लेकिन जवाब कोई नहीं देता, फिर भी लोकतांत्रिक बहस का तकाज़ा है कि रवीश कुमार इस पत्र का अपनी चिर-परिचित विनम्र शैली में तफ़सील से जवाब दें। मीडियाविजिल अपने पाठकों के लिए सुशांत सिन्‍हा का पत्र उनकी फेसबुक दीवार से साभार अविकल प्रकाशित कर रहा है।
-संपादक

 


प्रिय रवीश जी,

बहुत दिनों से आपको चिट्ठी लिखने की सोच रहा था लेकिन हर बार कुछ न कुछ सोचकर रुक जाता था। सबसे बड़ी वजह तो ये थी कि मेरा इन ‘खुले खत’ में विश्वास ही नहीं रहा कभी। खासकर तब से जब सोशल मीडिया पर आपकी लिखी वो चिट्ठी पढ़ ली थी जिसमें आपने अपने स्वर्गीय पिता को अपने शोहरत हासिल करने के किस्से बताए थे औऱ बताया था कि कैसे एयरपोर्ट से निकलते लोग आपको घेरकर फोटो खिंचवाने लग जाते हैं। बतौर युवा, जिसने 9 वर्ष की उम्र में अपने पिता को खो दिया था, मैं कभी उस खत का मकसद समझ ही नहीं पाया। मैं समझ ही नहीं पाया कि वो चिट्ठी किसके लिए थी, उस पिता के लिए जो शायद ऊपर से आपको देख भी रहा था और आपकी तरक्की में अपने आशीर्वाद का योगदान भी दे रहा था या फिर उन लोगों के लिए जिन्हें ये बताने की कोशिश थी कि आई एम अ सिलेब्रिटी। क्योंकि मेरे लिए तो मेरे औऱ मेरे स्वर्गीय पिता का रिश्ता इतना निजी है कि मैं हमारी ख्याली बातचीत को सोशल मीडिया पर रखने का साहस कभी जुटा नहीं सकता।

खैर, वजह आप बेहतर जानते होंगे लेकिन उस दिन से ऐसा कुछ हुआ कि मैंने चिट्ठी न लिखने का फैसला कर लिया। लेकिन कल आपकी वो चिठ्ठी पढ़ी जो आपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखी थी। आपके बीते कुछ दिनों के बयानों औऱ इस चिठ्ठी से मेरे मन में कुछ सवाल आए और साथ ही बतौर पूर्व सहकर्मी, मुझे लगा कि मुझे आपको बताना चाहिए कि आप ‘बीमार’ हैं औऱ आपको इलाज की ज़रुरत है। कृपा कर इसे अन्यथा मत लीजिएगा क्योंकि मुझे आपकी चिंता है इसलिए तहे दिल से ये खत लिख रहा हूं।

पहली बीमारी- बिना वजह अनदेखे डर से भयग्रस्त रहना

आपकी चिट्ठी पढ़कर जो पहला सवाल मन में आया था वो ये कि आपको बेरोज़गार होकर सड़क पर आ जाने की चिंता सता भी कैसे सकती है? आपकी तनख्वाह लाखों में हैं। अगर गलत नहीं हूं तो करीब 8 लाख रुपए प्रति महीने के आसपास। यानि साल का करीब करीब करीब 1 करोड़ रुपया कमा लेते हैं आप। सुना है आपकी पत्नी भी नौकरी करती हैं। यानि आपके घर बैठने की नौबत भी आई तो वो घर चला ही लेंगीं। और दोनों घर बैठे तो भी साल के करोड़ रुपए की कमाई से आपने इतना तो बचा ही लिया होगा कि आप सड़क पर न आ जाएं। इतने पैसे की सेविंग को फिक्स भी कर दिया होगा तो भी इतना पैसा हर महीने आ जाएगा जितना मीडिया में कइयों की सैलरी नहीं होती। पैसा घर चलाने भर नहीं बल्कि सामान्य से ऊपर की श्रेणी का जीवन जीने के लिए आएगा। अब अगर आपकी जीवन शैली किसी अरबपति जैसी हो गई है कि लाख-दो लाख रुपए प्रति महीने की कमाई से काम नहीं चलेगा तो कह नहीं सकता। लेकिन घबराने की तो कतई ज़रुरत नहीं है। आप खुद भी चाहें तो भी आप और आपके बच्चे सड़क पर नहीं आ सकते और कुछ नहीं तो मेरे जैसे कई पूर्व सहकर्मी हैं हीं आपकी मदद के लिए।

हिम्मत लीजिए उनसे और सोचिए ज़रा अपने ही दफ्तर के उन चपरासियों और कर्मचारियों के बारे में जिनकी तनख्वाह 20-30 हज़ार रुपए महीने की थी और जिन्हें संस्थान ने हाल ही में नौकरी से निकाल दिया। आप करोड़ रुपए कमा कर सड़क पर आ जाने के ख़ौफ से घिर रहे हैं, उनकी और उनके बच्चों की हालत तो सच में सड़क पर आ जाने की हो गई होगी। और आप उनके लिए संस्थान से लड़े तक नहीं? आपको तो उनका डर सबसे पहले समझ लेना चाहिए था लेकिन आप आजकल पीएम को चुनौती देने में इतना व्यस्त रहते हैं कि अपने संस्थान के ही फैसले को चुनौती नहीं दे पाए? खैर, कोई नहीं… टीवी पर गरीबों का मसीहा दिखने औऱ सच में होने में फर्क होता ही है। पीएम को चुनौती देकर आप हीरो दिखते हैं, मैनेजमेंट को चुनौती देकर नौकरी जाने का खतरा रहता है और कोई ये खतरा क्यों ले। और नौकरी जाने का डर कितना भरा है आपके मन में ये तो आपके साथ काम करने वाले कई लोग अच्छे से जानते हैं। कुछ लोग तो वो किस्सा भी बताते हैं कि आउटपुट के एक साथी को नोटिस मिला औऱ वो पार्किंग लॉट में आपसे मिलकर मदद की गुहार लगाने आया तो आपने गाड़ी की खिड़की का शीशा तक नीचे नहीं किया और अंदर से ही हाथ जोड़कर निकल लिए। जबकि आप भी जानते थे कि उसका दोष मामूली सा था। आप उसके साथ खड़े हो जाते तो उसकी नौकरी बच जाती। लेकिन आपने उसके परिवार के सड़क पर आ जाने का वो दर्द महसूस नहीं किया जो आजकल आप महसूस कर रहे हैं अपने बच्चों के लिए।

खैर, जाने दीजिए। आपके डर को बेवजह इसलिए भी बता रहा हूं कि आप खुद सोचिए कि जिस नरेन्द्र मोदी को आप महाशक्तिशाली बताते हैं वो 2002 के बाद से 15 साल इंतज़ार करते रहेंगे आपकी नौकरी खाने के लिए? इतना ही नहीं, पिछले तीन साल से तर्क और कुतर्क के साथ आपने सरकार पर सवाल उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी तब भी बीजेपी का ग्राफ़ ऊपर से भी ऊपर ही गया, वो चुनाव पर चुनाव जीतते गए तो वो आपकी नौकरी क्यों खाना चाहेंगे? आपके तार्किक और गैर तार्किक विरोध से या तो उनको फर्क नहीं पड़ रहा या फिर उनका फायदा ही हो रहा है, ऐसे में आपकी नौकरी खाने में उनकी क्या दिलचस्पी होगी? ये डर आपके अंदर कोई भर रहा है, जानबूझकर औऱ वो आपके आसपास ही रहता है। कौन है खुद सोचिएगा।

बस कहना मैं ये चाह रहा हू कि आप अपने मन से सड़क पर आने का खौफ निकाल दीजिए क्योंकि ये बेवजह का डर है। नौकरी गई भी तो इतने काबिल हैं आप, कोई न कोई और नौकरी मिल ही जाएगी आपको भी। कुछ नहीं तो बच्चों को पढ़ाकर घर चल ही जाएगा। आपकी लेखनी का कायल तो मैं हमेशा से रहा हूं, आपको पता ही है… कुछ नहीं तो हिन्दी फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखकर भी आपका घऱ चल जाएगा। पीएम के नाम चिठ्ठी में बच्चों के सड़क पर आ जाने का जो इमोशन आपने डाला था वैसा ही इमोशन और एक दिन शो में जैसे आप पीएम को ललकार रहे थे, वैसा ही अग्रेशन.. दोनों को मिलाकर स्क्रिप्ट लिख देंगे तो पक्का फिल्म चलेगी। मेरी गारंटी है।

दूसरी बीमारी- स्पलिट पर्सनालिटी या दोहरे व्यक्तित्व का शिकार हो जाना

इस बीमारी में इंसान खुद ही समझ नहीं पाता कि उसके अंदर दो दो इंसान पल रहे होते हैं। आप खुद लिखते हैं अपने बारे में औऱ बताते भी हैं कि आप बिना सवाल पूछे नहीं रह पाते, सच के लिए लड़ने से और सवाल उठाने से खुद को रोक नहीं पाते लेकिन आपके अंदर ही एक दूसरा रवीश कुमार रहता है जो इतना डर सहमा होता है कि नौकरी के मोह में अपने खुद के संस्थान या बॉस से कोई सवाल ही नहीं पूछता। आपको याद है न कि कैसे एक दिन अचानक एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर ने फरमान सुना दिया था कि देश के लिए जान देने वाले और शहीद होनेवाले सैनिक को हम ‘शहीद’ नहीं कहेंगे और न हीं लिखेंगे बल्कि उसे ‘मर गया’ बताएंगे। ऊपर से लेकर नीचे तक हड़कंप मच गया था कि देश के लिए जान कुर्बान करनेवाले सैनिक के प्रति इतना असम्मान क्यों? लेकिन आप तब भी चुप रह गए थे। कुछ नही बोले, न कोई सवाल उठाया।

और वो किस्सा भी याद होगा आपको जब एक फेसबुक पोस्ट लिखने पर मुझे नौकरी तक से निकाल देने की धमकी दे दी गई थी। पोस्ट में मैंने सिर्फ इतना लिख दिया था कि हम देश की अदालत और उसके फैसले का सम्मान करते हैं तो फिर इस तथ्य का सम्मान क्यों नहीं करते कि देश की किसी भी अदालत ने नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों का दोषी करार नहीं दिया है औऱ क्यों मीडिया की अदालत आज भी उन्हें दोषी करार देकर सज़ा देने पर आमादा है अपने अपने स्टूडियो में?

बोलने की आज़ादी के सबसे बड़े पैरोकार बनने वाले चैनल ने क्यों मेरी आज़ादी पर पाबंदी लगा दी औऱ आप चुप रह गए? आप मेरे साथ क्यों खड़े नहीं हुए? क्यों मेरी तरफ से मैनेजिंग एडिटर को खुली चिठ्ठी नहीं लिखी कि ये तो सीधा सीधा मेरे बोलने और विचारों की आजादी की हत्या है औऱ इसे रोका जाना चाहिए? ऐसे ही कितनी बार कितनों के साथ उनकी बोलने की आज़ादी का हनन हुआ पर आप किसी के लिए नहीं लड़े,क्यों? मैं सोचता रह गया था लेकिन अब पता चला कि दरअसल, दो दो रवीश हैं। एक वो रवीश, जो टीवी पर खुद को मसीहा पत्रकार दिखाता है औऱ दूसरा वो रवीश जो डर सहमा नौकरी बजाता है। एक रवीश जो प्रधानमंत्री को चैलेंज करता है औऱ दूसरा वो जो चुपचाप सिर झुकाकर संस्थान के मालिक/बॉस की हर बात सुन लेता है।

तीसरी बीमारी- खुद को हद से ज्यादा अहमियत देना और महानता के भ्रमजाल में फंस जाना

मुझे आज भी याद है कि कैसे आपने अहंकार के साथ न्यूज़ रुम में कहा था कि आप अमिताभ बच्चन के साथ एक शो करके आए हैं औऱ एडिटर को बोल दिया जाए कि जब शो एडिट हो तो बच्चन साहब से ज्यादा आपको दिखाए स्क्रीन पर क्योंकि लोग बच्चन साहब से ज्यादा आपको देखना चाहते हैं। मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ था लेकिन जो सामने था उसे कैसे नकारता। आपकी टीम के लोग भी आपसे दुखी रहते हैं क्योंकि आप अपने आगे किसी को कुछ समझते नहीं और सबको तुच्छ प्राणी सा एहसास कराते हैं। उस दिन आप गौरी लंकेश की हत्या पर हुए कार्यक्रम में बोलने गए तो वहां भी बोलने लग गए कि सब आपको कह रहे हैं कि आप ही बचे हैं बस, थोड़ा संभलकर रहिएगा। आप खुद को इतनी अहमियत क्यों देते हैं? आपके पहले भी पत्रकारिता थी, आपके बाद भी होगी, नरेन्द्र मोदी के पहले भी राजनीति थी औऱ उनके बाद भी होगी। आप क्यों इसे सिर्फ और सिर्फ रवीश Vs  मोदी दिखाकर खुद का कद बढ़ाने की जद्दोजहद में वक्त गंवा रहे हैं। इसी बीमारी का नतीजा है कि आप हर बात में अपनी मार्केटिंग का मौका ढूंढने में लगे रहते हैं। आपके आसपास ही इतने सारे प्रतिभावान पत्रकार एनडीटीवी में ही हैं जो बिना खुद की मार्केटिंग किए शानदार काम कर रहे हैं। आप उनसे सीख भी सकते हैं और प्रेरणा भी ले सकते हैं। दिन रात खुद को अहमियत देना बंद कर दीजिएगा तो चीज़ें सामान्य लगने लगेंगी।

मेरी मानिए, रवीश की रिपोर्ट वाले रवीश बन जाइए। आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़नेवाला। मैं डॉक्टर तो नहीं लेकिन मुझे लगता है कि इन सारी बीमारियों का इलाज होना ज़रुर चाहिए। किसी डॉक्टर से मिलकर देखिए एक बार। आप जैसे प्रतिभावान पत्रकार की ज़रुरत है देश को। और कभी पत्रकारिता छोड़िएगा तो नेता बनने से पहले एक बार अभिनेता बनने पर विचार ज़रुर कीजिएगा, मुझे उसका कौशल भी दिखता है आपमें।

हो सके तो इस चिट्ठी का जवाब भी मत दीजिएगा क्योंकि अभी आप बीमार हैं, आप इस चिठ्ठी को भी अपनी मार्केटिंग का जरीया बनाने लग जाइएगा बिना सोचे समझे। इसलिए इसका प्रिंटआउट तकिये के नीचे रखकर सो जाइएगा औऱ गाहे बगाहे पढ़ लीजिएगा।

आपके जल्द सकुशल होने की कामना के साथ

सुशांत सिन्हा
साथी पत्रकार

14 COMMENTS

  1. How interesting and ofcourse, how opportune that Mr Sihna decided to write the open letter to Mr Kumar at this point of time! Wondering why he kept all the information to himself and waited all these years. Mr Sinha should have written to Mr Kumar much earlier since he is so much concerned about his health and still remains self-claimed well-wisher. In 2015 only Mr Sinha, in an interview with one of the online media groups, mentioned and I quote “जो रवीश कुमार टीवी पर हैं वही रवीश कुमार न्यूज रूम में भी हैं, उनकी बातों में कोई बनावटीपन नहीं है।” I guess Mr Sinha himself must have been `sick’ at that time or must of succumbed to management’s pressure to give such a statement. It is also possible that Mr Sinha’s assessment about Mr Kumar was totally off-mark even after working for him so long…which really speaks about Mr Sinha’s journalistic skills ! People who are sick still have hopes in their lives but what about you Mr Sinha, how are you going to deal with so much of professional jealousy that is reeking from your letter to Mr Kumar? But one thing is there with this attempt you succeeded in grabbing atleast my attention – I am an avid reader and news-viewer but actually I never noticed that you had moved out of NDTV. With your letter I google searched and realised that you left last year to join in another channel – so there, see, atleast one reader/viewer is informed that you exist and updated about your whereabouts. But seriously this is a petty way and sorry attempt to grab public attention. But don’t lose heart , keep trying harder – one day with hard work and earnest effort you would be able to overcome the pettiness and who knows might actually start doing real journalism. Hard work pays, if nothing else this much you must have learnt from your senior Mr Ravish Kumar.

  2. I fully endorse the view of n_sexana…this is such a sorry attempt and shear display of professional jealousy….and most sad part is mediavigil published this.i can understand that a portal full crap like opindia can publish it but media vigil doing such nonsense is very disappointing

  3. Sinha Maine do baar aapko notice kiya hai, ek aaj aur ek tab jab aapne isse pahle Ravish Kumar ko sambodhit kiya tha. Kuchh achha kaam kar k naam kamaiye.
    Ravish ki shohrat ab aapki bareek kameengi se asarandaz na ho paegi.

  4. सिन्हा जी मुझे तो लगता है इलाज की जरूरत तो आपको है कारण आप इतना भी नहीं जानते की डरने वाला इंसान कभी खुला पत्र नहीं लिखता हैं और ना ही कभी प्रधानमंत्री पद पर बैठे मोदी को चुनौती देकर यह कहता कि मेरे सवालों का जवाब आमने सामने बैठकर लाईव टीवी पर दो !
    मुझे तो लगता है कि पर्सनैलिटी डिसआर्डर के असली शिकार तो आप खुद ही हैं क्योंकि जब आपको नौकरी से निकाला गया तब आपमें इतना बल नहीं था कि आप अपने को निकाले जाने का विरोध करने के लिये कोई खुला खत लिखकर सच्चाई जनता के संमुख लाते शायद खुला खत भी लिखा जा सकता है इसका ग्यान भी आपको रवीश जी के खुला खत देखने के बाद ही हुआ होगा और आप अब अपनी टीवी चैनल के खिलाफ र्जिश निकालने के लिये रवीश कुमार का ही सहारा ले रहे हैं और यही है आपकी असली बीमारी की जड़ यानि पर्सनैलिटी डिसऔर्डर ! रवीश कुमार की तनखा का उल्लेख करके आपने ययह भी दिखा दिया है कि आप की असली जलन का कारण क्या है , दरअसल आप रवीश जी की कामयाबी से जलते हैं क्योंकि आपने इल्जाम लगाया है कि रवीश जी अपने बास के विरुध कभी नहीं कोई खुला पत्र नहीं लिखते हैं तो भला कोई बेवकूफ ही होगा जो जानबूझ कर अपने पैरों पर कुल्हाडी मारेगा !
    हम तो यह देखते हैं कि रवीश जी खुलकर अपने सवालों की बौछार करते हैं और सरकार या शाशन प्रशाशन से सवाल करना ही एक अच्छे पत्रकार का काम है ! आप डरते हैं और आपको सरकार के नजदीक जाने के लिये कोई बहाना चाहिये इसी लिये आप रवीश जी का सहारा ढूंढ़ रहे हैं !!

  5. Mr Sinha! Is it not possible that modi was really a culprit in 2002 Gujrat ( Even a chief Justice of india openly blamed that he would have lodged a fir vagainst modi for Genocide. Don’t you know that you can be a judge. You are sure that this man has done it. But you can’t punish him judicially for lack of proof. Second thing. Suppose Ravish fights 4 peons of ndtv and he himself is terminated. Then it will be a great loss to India so Anti fascist forces. Could you name a guy anywhere in hindi news channels who can be compared with Ravish? Pl name 1.Why else ndtv gives him 8 lakh per month. How much u get? I don’t think more than 50000 per month. Who requires a Ravishing today in his channels., 99%channels are like zee channels. No? Don’t you know nd TV gave Maruti to all employees some years back. Lastly Ravishing is not a revolutionary. May be not a true bourgeois democrat. Nd TV is ultimately a business man. May be aligned with congress.

    • `ravish ke chamcho’ yeh kya baat hui ? aapko lagta hai ki sushant nein ravish kumar ko aainaa dhikhaya to kya aap `sushant ke chamche’ kah layenge?

  6. वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रकाश के रे की टिप्पणी बहुत सधी हुई और सटीक है… आप शायद सरकार के नजदीक रहने के लिए उनका कृपा पात्र बने रहने की कोशिश ज्यादा लगता है और मानसिक रूप से आप बीमार अधिक लगते हैं

  7. ”पोस्ट में मैंने सिर्फ इतना लिख दिया था कि हम देश की अदालत और उसके फैसले का सम्मान करते हैं तो फिर इस तथ्य का सम्मान क्यों नहीं करते कि देश की किसी भी अदालत ने नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों का दोषी करार नहीं दिया है औऱ क्यों मीडिया की अदालत आज भी उन्हें दोषी करार देकर सज़ा देने पर आमादा है अपने अपने स्टूडियो में?”

    BHAI SUSHANT JI.
    modi bhakton, RSS VAALON KI DALIL YAHI HOTI HAI…AUR YAH BHI KI DESH KI JANTA KA 3/4 BAHUMAT LEKAR MODI SARKAR AAYI HAI….!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    BHAI SUSHANT JI,MODI BHAKT HO YA GODI MEDIA? …YA DARBARI MEDIA?…YE CHAAPLOOS MEDIA???…YA TANKHAYYA MEDIYA KE PART JO EMI AUR BAAL-BACHCHE PALNE KE LIYE NAUKRI KAR RAHE HAIN, PATRAKARITA (JOURNALISM) NAHINI!!!

    KYA ISKA YAH MATLAB HAI KI MODI SARKAR JITNA GANDH MACHAYE, DUGANDH MACHAYE USKA SAMARTHAN KIYA JAYE????????????

    GUJRAT DANGE…KI AAPKI TIPPANI KA BHI YAHI MATLAB KYA NAHIN HAI???????

    KUL MILAKAR AAPIKI TIPPANI MODI BHAKTI HAI–PATA NAHIN AAPKE TV PATRAKAR RAHTE AAAPK KAHAN KHADE HAIN???

    MODI SARKAR KE PAKSH MEN YA VIRODH MEN????????

    BHAI, SANBHAV HAI KI RAVISH KUMAR MEN THODI ‘AATMMUGDHTA’ HO, THODA ‘AATM-PRACHAR’ KARTE HON. NDTV MEN SAHKARMI HONE KE NATE AAPKI KAI SANDARBHON SE YE AABHAS HOTA HAI…..LEKIN….LEKIN…LEKIN…BUT….KINTU….PARANTU…. VAGAIRAH….VAGAIRAH BHAI SUSHANT JI….AAP BHI TV PATRAKAR HAIN….AAP JAISE 1000 RON TV PATRAKAR PAL RAHE HAIN TV CHAINALON MEN….EMI CHUKANE KI MAJBURI HAI UNPE….BAAL-BACHCHE PAALNE KI MAJBURI…MERI BHI HAI…SHYAD RAVISH KUMAR KI BHI HAI BALKI HOGI HI…LEKIN 16 MAY 2014 KE BAAD DESH KE HAALAAT NE KYA KARVAT LI HAI…HINDUSTAN KI GANGA-JAMUNI SANSKRITI KO KIS TARAH TAHAS-NAHAS KIYA GAYA HAI, KAISE AGHOSHIT AAPATKAAL LAAGOO HAI…KAISE AAP JIS MEDIA SECTOR K TANKHAIYYAA HAIN VO ‘GODI MEDIYA’ …’DARBAARI MEDIA” ‘CHAARAN MEDIA”, MODI SARKAR KI CHAAPLOOS MEDIA” ‘DALAAL MEDIA’ ..VAGAIRAH-VAGAIRAH BAN GAI HAI YE AAP BHI JAANTE HAIN AUR NAHI JAANTE TO AAP JOURNALIST K NAAM PAR KALANK HAIN. MAINE BHI PRINT MEDIA MEN KAAM KIYA HAI…EDITORIAL PAGE SANBHALA HAI…AAJ DU KA PROFESSOR HU…APNI KAABILIYAT SE, APNE VAICHARIK SAROKARON SE…

    BHAI MUJE RAVSI KUMAR KA N DOST SAMJHEN N RISHTEDAR …

    SHUKRIYA.
    DHNYAWAD
    TANKHA UTHATE RAHEN
    BIVI-BACHE PALTE RAHEN
    CHARNGIRI KARTE RAHEN
    SHUBH RATRI
    GOOD NIGHT
    SABBA KHAIR.

    – DR SHASHIKANT

  8. जिनके लिए लिखा गया, जिसने लिखा उनकी सेहत का तो पता नहीं लेकिन पत्र में जो सोच है वह बीमार है – वह आज की मीडिया में फैली उसी बिमारी से पीड़ित है जिसने हम दर्शको/पाठको को त्रस्त कर रखा है. सुशांत सिन्हा का पत्र जो रवीश कुमार के मोदी को लिखे पत्र के सन्दर्भ में लिखा गया है, मूल मुद्दे (trolling) पर कुछ कहता ही नहीं है…(शायद इस्सलिये क्यूंकि उसके सबूत रवीश कुमार पेश कर चुके हैं वहां चटकारा लेने के लिए कुछ नहीं है ) उसके बजाय, TRP बटोरने के लिए, तर्कविहीन, तथ्यहीन, सतही खुले पत्र को व्यक्तिगत आक्षेप के मसाले में लपेट कर परोसा जाता है. पत्र पढ़कर यह तो पता लगा ही की सुशांत सिन्हा नाम का कोई पत्रकार भी है, साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ की…
    – रवीश कुमार का उनके पिता के लिए पत्र ना सिर्फ अपने पिता के प्रति उनकी संवेदना अभिव्यक्त करता है साथ ही उन् दोनों के रिश्ते की मज़बूती भी दर्शाता है. हाँ इस देश काल में जहाँ तो हमारे `लोकप्रिय’ नेतागण, माँ के साथ तो फोटो खिचाते हैं औऱ अपने पिता के बारे में एक शब्द भी प्रस्फुटित करते हूँ, ऐसे पत्र आप जैसो को अजूबे ही लगेंगे. खैर…रवीश कुमार स्वर्गवासिय पिता को पत्र लिख सकते हैं क्यूंकि उनके पास लिखने के लिए ज़रूरी सोच है, भाव-भाषा पर पकड़ है, कौशल है…सुशांत सिन्हा आप को एक अदना पाठक की ओर से एक सुझाव की आप कोशिश भी ना कीजियेगा कभी. आप तो यह परचा, पत्र टाइप काम कीजिये जिससे लोगो को आप बताते रहे की “I also exist ” !
    – अगर रवीश कुमार को मिलती है बड़ी सैलरी तो वह पूर्णतया deserve करते हैं, कुबूत है उनमें…आज जहाँ २ कौड़ी को बचाने ओर पाने के लिए लोग घुटने पर आ गए हैं वहां “करोड़ों” की सालाना आमदनी को रवीश कुमार रोज़ दांव पर लगाते हैं यह सोच कर उनके के लिए इज़्ज़त ओर बढ़ गयी.
    – वह अमिताभ बच्चन वाले एपिसोड पर क्या हुआ थोड़ा `जंगल में मोर नाचा’ वाला मसला है…लेकिन अगर, अगर रवीश जी ने कहा भी तो गलत नहीं कहा. आज की तरीक में मैं ओर मुझ जैसे कई हैं को असल में मिस्टर बच्चन को कम ओर रवीश जी को ज़्यादा देखना/सुनना चाहेंगे. बच्चन साहब का क्या वह तो को कही भी दिख जायेंगे क्रीम,पाउडर बेचते हुए.
    – रवीश जी के लिए सुशांत सिन्हा का सुझाव की रवीश जी एक अच्छे स्क्रिप्ट लेखक या कलाकार बन सकते हैं सराहनीह है. रवीश कुमार तो हैं ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेकिन सुशांत जी का क्या होगा. पत्र में `शहीद’ वाले मसले ओर मोदी वाली फेसबुक टिप्पड़ी के साथ ही सुशांत सिन्हा ने अपनी राजनैतिक / वैचारिक पकड़ का सबूत तो दे ही दिया है..जो उनको इस बरसाती मौसम में तो टर्राने का मौका तो ज़रूर देती है लेकिन ज़्यादा दूर नहीं ले जाएगी. एक सुझाव है सुशांत सिन्हा के लिए की अपने पूर्व-सहयोगी को मदद करने के बजाये (“और कुछ नहीं तो मेरे जैसे कई पूर्व सहकर्मी हैं हीं आपकी मदद के लिए”) अपने भविष्य कि चिंता करें – ऐसे स्तरहीन पत्रकारिता के चलते उनको ज़रूर ही भविष्य की चिंता करनी चाहिए. जिस तरह से प्रोफेशनलिज्म ओर नैतिकता को ताक पर रखकर सुशांत सिन्हा जहाँ काम किया उस संसथान, वहां की निजी बातो को सार्वजनिक रूप से लिख रहें है (या आज की पत्रकारिता की भाषा में कहें तो उछाल रहे है) उनको याद रखना चाहिए कि उनके वर्तमान के `माई-बाप’ भी उनकी इस फितरत से वाकिफ है औऱ समय आने पर इसी बड़बोलापन के चलते उनको रास्ता नपवा देंगे. ऐसा न हो यही उम्मीद है नहीं तो पब्लिक तो यही कहेगी की चले थे आँखों में मोतियाबिंद ले दुनिया की बिमारी ढूढ़ने, खुद ही नबीना होकर लौटे…आखिरकार पब्लिक है वह सब जानती है !

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