Home टीवी किसी पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए सुशांत सिन्हा !

किसी पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए सुशांत सिन्हा !

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कुछ दिनों पहले मीडिया विजिल में सुशांत सिन्हा का रवीश कुमार को लिखा एक खुला ख़त छपा था। सुशांत सिन्हा एनडीटीवी में रवीश कुमार के सहयोगी थे और अब इंडिया न्यूज़ में ऐंकर हैं। इस पत्र को लेकर काफ़ी विवाद हो रहा है। कई मित्रों का मानना है कि यह पत्र निजी स्तर पर हमला करता है, और इसे छापकर मीडिया विजिल ने ग़लती की। इस सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे ने भी एक टिप्पणी लिखी है। इस टिप्पणी में मीडिया विजिल को लेकर भी कई ‘अनुमान ‘ लगाए गए हैं। हिंदी जगत की जड़ता तोड़ने के लिए बहसें खड़ा करना मीडिया विजिल का संकल्प है, इसलिए हम इस टिप्पणी को अविकल छाप रहे हैं। मीडिया विजिल की ओर से अपना पक्ष बाद में रखा जाएगा। हाँ, इस टिप्पणी में एक शेर मीडिया विजिल के लिए दर्ज किया गया है तो एक हमारी ओर से भी अर्ज़ है- पस-ए-मदफ़्न बनाए जाएँगे साग़र मेरी गिल के, लबे जाँ वस्ल के बोसे मिलेंगे ख़ाक में मिल के – संपादक

 

सुशांत सिन्हा के नाम से छपे खुले पत्र पर टिप्पणी 

( प्रकाश के रे )

पहले मैंने सोचा था कि मीडियाविजिल पर छपे सुशांत सिन्हा के पत्र पर पत्र के अंदाज़ में ही कुछ कहा जाये, पर इरादा बदल दिया. मैं सिन्हा को न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही पेशेवर तौर पर जानता हूँ. उनका पत्र पढ़ कर यह भी महसूस हुआ कि उनसे किसी तरह का राब्ता या बावस्तगी रखना समझदारी का काम नहीं है. पत्र या टिप्पणी भी लिखने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि उनका पत्र मीडियाविजिल पर छपा है. इस साइट को मैं फ़ॉलो करता हूँ और दो-चार दफ़े इस पर कुछ लिखा भी है. अगर कहीं और छपा होता, तो अव्वल तो मेरी नज़र ही नहीं पड़ती, और अगर दिख भी जाता, तो पढ़ता नहीं. सोशल मीडिया के ज़माने में एक बड़ी मुसीबत है रैंडम लेखों को पढ़ना. वक़्त भी जाया होता है और हासिल भी कुछ नहीं होता.

पढ़ने के बाद क़ायदे से सिन्हा की चिट्ठी को इग्नोर भी किया जा सकता था, पर भला हो मीडिया विजिल के ‘संपादक’ का जिन्होंने सिन्हा की चिट्ठी के साथ एक इंट्रो भी चस्पा कर दिया है जिसमें कहा गया है कि ‘रवीश कुमार की निंदा या आलोचना करने वाले लोगों की भाषा के उलट सिन्‍हा की भाषा बहुत विनम्र है, बातें दलील के साथ रखी गई हैं और कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है… मीडियाविजिल इस पत्र में उल्लिखित घटनाओं की पुष्टि नहीं करता लेकिन एक पूर्व सहकर्मी और वरिष्‍ठ पत्रकार की ओर से लिखे गए पत्र को बहसतलब बेशक समझता है.’ इस टिप्पणी में आगे संपादक के इस निष्कर्ष पर कुछ कहूँगा, पहले कुछ मीडियाविजिल के इस पत्र को छापने पर कुछ अनुमान लगाया जाये.

यह वेबसाइट आम तौर पर अच्छे विश्लेषण और ख़बरों को देता है जिसका व्यापक मतलब होता है. व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को पहली बार छपते हुए देख रहा हूँ. कुछ दिन पहले इस साइट पर एक पत्रकार द्वारा आरएसएस के प्रमुख को लिखे निजी पत्र को सार्वजनिक किया गया था. लेकिन उसका बाहर आना इसलिए ज़रूरी था ताकि यह पता चले कि इस सरकार में कुछ खेल और भी चल रहे हैं जो हमारी नज़रों से ओझल हैं. मैंने सोशल मीडिया पर यह चर्चा सुनी थी कि उक्त पत्रकार ने मीडियाविजिल साइट पर केस दर्ज करने की बात कही थी. चूँकि मामला संघ प्रमुख से जुड़ा हुआ है, तो चर्चा भी ख़ूब हुई. मुझे लगता है कि मीडियाविजिल के ‘संपादक’ और उनकी टीम ने उस पत्र के कारण बने दबाव के असर को कम करने के लिए सुशांत सिन्हा का रवीश कुमार के नाम पत्र को छापा है. यह मेरा अनुमान है और इस तरह के डैमेज कंट्रोल या बैलेंसिंग एक्ट मीडिया में नई बात भी नहीं है. मेरे अनुमान को सबसे अधिक आधार साइट के ‘संपादक’ द्वारा लिखे गये इंट्रो से मिलता है. अगर ऐसा नहीं है तो सिन्हा की भाषा को ‘विनम्र’ और इस पत्र को ‘बहसतलब’ की संज्ञा देनेवाली समझ चाहे और जो भी हो, संपादकीय समझ तो कतई नहीं है. इंट्रो में कुछ लड़खड़ाहट भी साफ़ दिखती है. ख़ैर, बेदम शाह वारसी का एक शेर मीडियाविजिल के लिए पेश है-

हल्की सी इक ख़राश है क़ासिद के हल्क़ पर
ये ख़त जवाब-ए-ख़त है कि ख़त की रसीद है

बहरहाल, अब आते हैं सिन्हा की चिट्ठी पर. इसमें मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं- रवीश की सैलेरी लाखों में है, रवीश एनडीटीवी में कर्मचारियों को हटाये जाने पर चुप रहे, एनडीटीवी सुरक्षाकर्मियों के मरने पर ‘शहीद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता, रवीश अपने पिता को याद क्यों करते हैं, प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में रवीश ने जिस डर का उल्लेख किया है, वह बेबुनियाद है आदि. सैलेरी वाली बात तो हास्यास्पद है ही, साथ ही सिन्हा की कुंठा को भी दर्शाती है. एक संस्था में काम करनेवाले लोगों के वेतन में विषमता पूँजीवाद, ख़ासकर नव-उदारवादी तंत्र, में एक चलन है. इसके लिए किसी एक शख़्स की ओर अँगुली उठाने का क्या मतलब है! सिन्हा जहाँ अभी जहाँ काम करते है, वहाँ सैलेरी पिरामिड उलटा चलता है क्या? अगर इस विषमता से सिन्हा को इतना ही दर्द है, तो वे उस आर्थिक तंत्र पर सवाल क्यों नहीं उठाते जिसकी वज़ह से ऐसा है? ऐसा नहीं कर सकते, तो मैं उन्हें इन शब्दों में सांत्वना देने की कोशिश करता हूँ-

दूसरों की अमानत पर हैरान न हो
ख़ुदा तूझको भी देगा परेशान न हो

यह टिप्पणी लिखते हुए अभी बालकनी में सिगरेट पीने गया था. नीचे एक चमचमाती बड़ी कार खड़ी थी. सिन्हा के लॉजिक से या तो मुझे उस पर थूक देना चाहिए था या उसके मालिक को कहना चाहिए था कि ऑटो के रेट पर एक चक्कर घुमा दो! चलिए वेतन विषमता की बात चली है, तो कुछ आँकड़े दे देता हूँ.  वर्ष 2015 की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की व्यस्क 71 फ़ीसदी आबादी की संपत्ति में हिस्सेदारी मात्र तीन फ़ीसदी है. इनकी औसत संपत्ति 10 हज़ार डॉलर से कम है. इसके बरक्स 0.7 फ़ीसदी आबादी के पास 45.2 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. इनकी औसत संपत्ति 10 लाख डॉलर से अधिक है. पिछले साल ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट ने बताया था कि दुनिया के शीर्ष एक फ़ीसदी के पास शेष आबादी की पूरी संपत्ति से अधिक माल है. और, यह विषमता 19वीं सदी के बाद से सबसे ज़्यादा है. ध्यान रहे, इन आँकड़ों में दबा-छुपा के रखे गये माल का हिसाब शामिल नहीं है. साल 1960 के बाद से आर्थिक असमानता में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है. ग्लोबल वेल्थ डेटाबुक, 2014 बता रहा है कि भारत के शीर्ष 10 फ़ीसदी धनिकों के पास सबसे ग़रीब 10 फ़ीसदी की संपत्ति से 370 गुना अधिक धन है. तो, बताया जाये कि इन सब के लिए रवीश और उनके कथित आठ लाख ज़िम्मेदार हैं या फ़िर मामला कहीं और फँसा है? और, जहाँ फँसा है, वहाँ सिन्हा जी पहुँच ही नहीं पा रहे हैं.

किसी निजी संस्थान में छँटनी उसी संस्थान में काम करनेवाला कोई और रोक सकता है क्या? किसी कर्मचारी को रोज़गार देनेवाला परेशान न करे, यह काम तो श्रम विभाग का होना चाहिए. लेकिन सिन्हा जी क्या कभी इस बात पर सवाल उठाये हैं कि पहले काँग्रेस और अब भाजपा सरकारें ताबड़तोड़ हायर-फ़ायर क़ानून ला रही हैं? यूनियन पर तमाम तरह के बंधन आयद किये जा रहे हैं. बाज़ार में काम नहीं है और सरकार मौज़ ले रही है. अगर कोई चुप भी रहा, तो आप उसे दोष किस आधार पर देंगे? एक पत्रकार या एक नागरिक के रूप में मुझे बोलने या नहीं बोलने का अधिकार है या नहीं? सवाल तो तब खड़ा होता है, जब मैं अपने निजी या पेशेवर जीवन में बेईमानी करूँ. सवाल तब खड़ा होता है कि जब मैं झूठ और बेहूदगी का सहारा लेकर फ़ेक न्यूज़ दूँ और किसी भी को भी देशद्रोही कह दूँ. सवाल तब खड़ा होता है जब सरकार के सामने मैं सदैव साष्टांग पड़ा रहूँ.

सिन्हा जी ने एनडीटीवी द्वारा ‘शहीद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करने की बात कही है. इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है. टीवी न के बराबर देखता हूँ. और किसी चैनल की संपादकीय नीति पर बिना जाने बोलने का तुक नहीं है और मुझे इतनी फ़ुरसत भी नहीं है कि इस बारे में पता लगाऊँ. पर, सिन्हा जी को याद दिलाना चाहूँगा कि भारत के गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजु ने लोकसभा में अप्रैल, 2015 में कहा था कि रक्षा बलों या अर्द्ध सैनिक बलों के लिए ‘शहीद’ शब्द परिभाषित नहीं है.

रवीश कुमार द्वारा अपने पिता को याद करने पर सिन्हा की तक़लीफ़ समझ से परे है. सुख-दुख में माँ-बाप और परिजनों को नहीं याद करोगे, तो किसको याद करोगे? अगर कोई ‘सिलेब्रिटी’ हो रहा है, तो सिन्हा जी के पेट में मरोड़ क्यों उठना चाहिए? परमहंस योगानंद के शिष्य जे डोनाल्ड वाल्टर्स (स्वामी क्रियानंद) का एक कथन उल्लिखित करना पर्याप्त होगा- ‘अपनी राष्ट्रीयता, भाषा और व्यक्तिगत रुचियों के बावजूद कुछ ऐसी वास्तविकताएँ हैं जिससे हम सभी का वास्ता है. जैसे हमें भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही हमें भावनात्मक पोषण- दूसरों से प्रेम, दया, प्रशंसा और सहयोग- की आवश्यकता होती है.’

अब आते हैं प्रधानमंत्री को लिखे रवीश के पत्र पर सिन्हा की बेचैनी पर. अव्वल तो सिन्हा जी को अब तक यह जान जाना चाहिए था कि किसी को कुछ कहते समय मर्यादित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए. एक पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए. किसी को बीमार या मानसिक रोगी ऐसे कहा जाता है? आपको आपके बड़ों, शिक्षकों और संपादकों ने यही सिखाया है? यह न सिर्फ़ अपमानजनक है, बल्कि आपराधिक भी है. सोमवार को ही देशभर में पत्रकारों को निशाना बनाये जाने के विरुद्ध फिर से प्रदर्शन हुआ है. बौद्धिक कांचा इलैया की सोलिडैरिटी में प्रदर्शन हुआ है. लोग मारे जा रहे हैं. धमकियाँ दी जा रही हैं. ऐसे में रवीश का डर बेबुनियाद है? यह बीमारी है? अगर है भी, तो उन्होंने प्रधानमंत्री से बदतमीज़ और बददिमाग़ ट्रोलों की शिकायत की, तो आपको मिर्ची क्यों लग रही है सिन्हा जी?

सिन्हा जी को मेरी सलाह है कि अध्ययन-मनन पर ध्यान दें, कभी कसरत कर लें, खान-पान का ख़्याल रखें, सिनेमा-संगीत में दिलचस्पी लें. ज़ेहन में ज़हर और मन में कुंठा के विषाणु पालना अच्छी बात नहीं है. समाज को समृद्ध और स्वच्छ बनाया जाये. अमन-चैन रहे, यह प्रयास हो.

 प्रकाश के रे, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, bargad.org



 

 

16 COMMENTS

  1. प्रकाश के रे जी! मैं फेसबुक पर नहीं हूँ। ट्विटर पर ये फीड आई और मैंने आपका जवाब पढ़ा, इतना दिलचस्प है कि उस ख़त को पढ़ने की नौबत ही नहीं आई जिसका आपने जवाब दिया है। आजकल ज़्यादातर पत्रकार cheap publicity में लगे हुए हैं। काश! इतनी गहराई से अगर कोई समझ सकता आर्थिक ढांचे को और अमीरी-ग़रीबी की खाई को तो फिर क्या ही बात थी। उस दिन ही socialist democracy का लक्ष्य पूरा हो जाता। लेकिन यहां तो फ्री में प्रवक्ता बनने का चलन है। मुझे लगता है असल में ये एक बीमारी है। डरना उनलोगों को चाहिए कि आनेवाले वक़्त में जब उनके बच्चे उनसे पूछेंगे कि पापा-मम्मी आप तो फ्री में प्रवक्ता बनते थे, आख़िर क्या मिला आपको। आपका जवाब बहुत लॉजिकल है। धन्यवाद आपका कि मैं फ़ालतू का open letter पढ़ने से बच गया और आपका जवाब पढ़कर कुछ जानकारी भी हासिल हुई।

  2. I was shocked that Meida Vigil decided to publish the letter from Sinha with a foreword like “‘रवीश कुमार की निंदा या आलोचना करने वाले लोगों की भाषा के उलट सिन्‍हा की भाषा बहुत विनम्र है, बातें दलील के साथ रखी गई हैं और कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है… मीडियाविजिल इस पत्र में उल्लिखित घटनाओं की पुष्टि नहीं करता लेकिन एक पूर्व सहकर्मी और वरिष्‍ठ पत्रकार की ओर से लिखे गए पत्र को बहसतलब बेशक समझता है.’” .

    However, I am not surprised. I have followed at least one of its editors very closely and that gives me a logical explanation of such a foreword.

  3. It is the most plausible explanation that media vigil published that despicable, indecent and unwarranted letter that MV was trying to do a balancing act.
    Sinha is no Journalist anymore, he can be assigned the title of a troll with reasonable sense of rectitude. The content, form and intention of his letter informs us of our journalistic credentials.

  4. ye praksh re bhi communist mind set ka hai.. isiliye ravish ki chamchagiri kr rha hai.. sinha bnde ne hr baat logic ke sath kahi thi.. prakash re bhai ne.. betuki baate ki hai.. ravish ko defend krne ke liye..

  5. सिन्हा का पत्र में ऐसा कुछ पढ़ा जाने वाला था ही नहीं कि पढ़ कर याद रखा जाय। ऐसे लग रहा था कोई बीए फर्स्ट ईयर का बच्चा लिखने बैठा हो। लिखावट में सवाल होना चाहिये पाठकों से.. लेकिन लिखने वाला का बुद्धि देख तरस आ गया कि कोई ऐसे कैसे कुछ भी लिख सकता है। मिडियाविजिल को देख थोड़ा सोंच में पढ़ गया कि वह इस पत्र को क्यों इतना अहमियत दे रही है।

  6. सलाह वाजिब है एक अकेले के लिये नहीं उस सारे समाज के लिये जहाँ से हवन किया जा रहा है स्वाहा : ।

  7. मैं तो बस इतना मना रही थी की काश सैलरी वाली बात सच होती. बंदा डिज़र्व करता है. लेकिन आपने वो भ्रम भी तोड़ दिया, सिन्हा को जो मुंहतोड़ जवाब दिया सो दिया.

  8. रवीश कुमार की निंदा या आलोचना करने वाले लोगों की भाषा के उलट सिन्‍हा की भाषा बहुत विनम्र है, बातें दलील के साथ रखी गई हैं और कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है… मीडियाविजिल इस पत्र में उल्लिखित घटनाओं की पुष्टि नहीं करता लेकिन एक पूर्व सहकर्मी और वरिष्‍ठ पत्रकार की ओर से लिखे गए पत्र को बहसतलब बेशक समझता है.’” .

    क्या सर? खैर।।।

  9. जिनके लिए लिखा गया, जिसने लिखा उनकी सेहत का तो पता नहीं लेकिन पत्र में जो सोच है वह बीमार है – वह आज की मीडिया में फैली उसी बिमारी से पीड़ित है जिसने हम दर्शको/पाठको को त्रस्त कर रखा है. सुशांत सिन्हा का पत्र जो रवीश कुमार के मोदी को लिखे पत्र के सन्दर्भ में लिखा गया है, मूल मुद्दे (trolling) पर कुछ कहता ही नहीं है…(शायद इस्सलिये क्यूंकि उसके सबूत रवीश कुमार पेश कर चुके हैं वहां चटकारा लेने के लिए कुछ नहीं है ) उसके बजाय, TRP बटोरने के लिए, तर्कविहीन, तथ्यहीन, सतही खुले पत्र को व्यक्तिगत आक्षेप के मसाले में लपेट कर परोसा जाता है. पत्र पढ़कर यह तो पता लगा ही की सुशांत सिन्हा नाम का कोई पत्रकार भी है, साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ की…
    – रवीश कुमार का उनके पिता के लिए पत्र ना सिर्फ अपने पिता के प्रति उनकी संवेदना अभिव्यक्त करता है साथ ही उन् दोनों के रिश्ते की मज़बूती भी दर्शाता है. हाँ इस देश काल में जहाँ तो हमारे `लोकप्रिय’ नेतागण, माँ के साथ तो फोटो खिचाते हैं औऱ अपने पिता के बारे में एक शब्द भी प्रस्फुटित करते हूँ, ऐसे पत्र आप जैसो को अजूबे ही लगेंगे. खैर…रवीश कुमार स्वर्गवासिय पिता को पत्र लिख सकते हैं क्यूंकि उनके पास लिखने के लिए ज़रूरी सोच है, भाव-भाषा पर पकड़ है, कौशल है…सुशांत सिन्हा आप को एक अदना पाठक की ओर से एक सुझाव की आप कोशिश भी ना कीजियेगा कभी. आप तो यह परचा, पत्र टाइप काम कीजिये जिससे लोगो को आप बताते रहे की “I also exist ” !
    – अगर रवीश कुमार को मिलती है बड़ी सैलरी तो वह पूर्णतया deserve करते हैं, कुबूत है उनमें…आज जहाँ २ कौड़ी को बचाने ओर पाने के लिए लोग घुटने पर आ गए हैं वहां “करोड़ों” की सालाना आमदनी को रवीश कुमार रोज़ दांव पर लगाते हैं यह सोच कर उनके के लिए इज़्ज़त ओर बढ़ गयी.
    – वह अमिताभ बच्चन वाले एपिसोड पर क्या हुआ थोड़ा `जंगल में मोर नाचा’ वाला मसला है…लेकिन अगर, अगर रवीश जी ने कहा भी तो गलत नहीं कहा. आज की तरीक में मैं ओर मुझ जैसे कई हैं को असल में मिस्टर बच्चन को कम ओर रवीश जी को ज़्यादा देखना/सुनना चाहेंगे. बच्चन साहब का क्या वह तो को कही भी दिख जायेंगे क्रीम,पाउडर बेचते हुए.
    – रवीश जी के लिए सुशांत सिन्हा का सुझाव की रवीश जी एक अच्छे स्क्रिप्ट लेखक या कलाकार बन सकते हैं सराहनीह है. रवीश कुमार तो हैं ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेकिन सुशांत जी का क्या होगा. पत्र में `शहीद’ वाले मसले ओर मोदी वाली फेसबुक टिप्पड़ी के साथ ही सुशांत सिन्हा ने अपनी राजनैतिक / वैचारिक पकड़ का सबूत तो दे ही दिया है..जो उनको इस बरसाती मौसम में तो टर्राने का मौका तो ज़रूर देती है लेकिन ज़्यादा दूर नहीं ले जाएगी. एक सुझाव है सुशांत सिन्हा के लिए की अपने पूर्व-सहयोगी को मदद करने के बजाये (“और कुछ नहीं तो मेरे जैसे कई पूर्व सहकर्मी हैं हीं आपकी मदद के लिए”) अपने भविष्य कि चिंता करें – ऐसे स्तरहीन पत्रकारिता के चलते उनको ज़रूर ही भविष्य की चिंता करनी चाहिए. जिस तरह से प्रोफेशनलिज्म ओर नैतिकता को ताक पर रखकर सुशांत सिन्हा जहाँ काम किया उस संसथान, वहां की निजी बातो को सार्वजनिक रूप से लिख है (रहें है या आज की पत्रकारिता की भाषा में कहें तो उछाल रहे है) उनको याद रखना चाहिए कि उनके वर्तमान के `माई-बाप’ भी उनकी इस फितरत से वाकिफ है औऱ समय आने पर इसी बड़बोलापन के चलते उनको रास्ता नपवा देंगे. ऐसा न हो यही उम्मीद है नहीं तो पब्लिक तो यही कहेगी की चले थे आँखों में मोतियाबिंद ले चले थे दुनिया की बिमारी ढूढ़ने, खुद ही नबीना होकर लौटे…आखिरकार पब्लिक है वह सब जानती है !

  10. Sushant sinha ne jo bhi Ravish Kumar k khilaf likha hai use parh kar anayass hi mujhe ehsass hua ki yeh jawab kisi patrkar ki taraf se nahi mojuda hukoomat ki taraf se diya ja raha hai…
    Kyoon ki RAVISH Kumar k khule khat ka jawab mojuda hukoomat to kabhi de hi nahi sakti sushant sinha ko limelight me aane ka jaise hi moqa mila unhone der nahi ki or modi ji k qareebi patrkaron me apne aap ko bhi shumar karwa kiya…

    Aaj nahi to kal Sushant ko iss sab ka kuch na kuch phal modi ji dwara mil hi jaega….

  11. प्रकाश रे को मैं नहीं जानता … पहले मेरी इच्छा हुई की इनके जवाब को पढने का कोई तुक नहीं है … पर फिर सोचा एक बार पढ़ ही ले … पर पढ़ के कुछ नया नहीं मिला …. मुम्बैया भाषा में … “एक दम थकेला” 🙂 खैर रे साहब की भी ये ही सलाह है के “ज़ेहन में ज़हर और मन में कुंठा के विषाणु पालना अच्छी बात नहीं है” just chill 🙂

  12. Unlike the letter of Sinha, the letter of Mr. Prakash lacks logic. He seems to harbor the same illusion that Ravish ji is suffering from- being intellectual. what else explains his curtness as he repeats his being too busy to read an insignificant Sinha on one hand and then writing such lengthy and tedious defense of Ravish Kumar on the other.

    people like Ravish Kumar believe that they are the news and that the country should be grateful that they exist and appear on the TV. And from what I have just read above, Mr. Prakash is no different.

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