Home टीवी किसी पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए सुशांत सिन्हा !

किसी पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए सुशांत सिन्हा !

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कुछ दिनों पहले मीडिया विजिल में सुशांत सिन्हा का रवीश कुमार को लिखा एक खुला ख़त छपा था। सुशांत सिन्हा एनडीटीवी में रवीश कुमार के सहयोगी थे और अब इंडिया न्यूज़ में ऐंकर हैं। इस पत्र को लेकर काफ़ी विवाद हो रहा है। कई मित्रों का मानना है कि यह पत्र निजी स्तर पर हमला करता है, और इसे छापकर मीडिया विजिल ने ग़लती की। इस सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे ने भी एक टिप्पणी लिखी है। इस टिप्पणी में मीडिया विजिल को लेकर भी कई ‘अनुमान ‘ लगाए गए हैं। हिंदी जगत की जड़ता तोड़ने के लिए बहसें खड़ा करना मीडिया विजिल का संकल्प है, इसलिए हम इस टिप्पणी को अविकल छाप रहे हैं। मीडिया विजिल की ओर से अपना पक्ष बाद में रखा जाएगा। हाँ, इस टिप्पणी में एक शेर मीडिया विजिल के लिए दर्ज किया गया है तो एक हमारी ओर से भी अर्ज़ है- पस-ए-मदफ़्न बनाए जाएँगे साग़र मेरी गिल के, लबे जाँ वस्ल के बोसे मिलेंगे ख़ाक में मिल के – संपादक

 

सुशांत सिन्हा के नाम से छपे खुले पत्र पर टिप्पणी 

( प्रकाश के रे )

पहले मैंने सोचा था कि मीडियाविजिल पर छपे सुशांत सिन्हा के पत्र पर पत्र के अंदाज़ में ही कुछ कहा जाये, पर इरादा बदल दिया. मैं सिन्हा को न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही पेशेवर तौर पर जानता हूँ. उनका पत्र पढ़ कर यह भी महसूस हुआ कि उनसे किसी तरह का राब्ता या बावस्तगी रखना समझदारी का काम नहीं है. पत्र या टिप्पणी भी लिखने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि उनका पत्र मीडियाविजिल पर छपा है. इस साइट को मैं फ़ॉलो करता हूँ और दो-चार दफ़े इस पर कुछ लिखा भी है. अगर कहीं और छपा होता, तो अव्वल तो मेरी नज़र ही नहीं पड़ती, और अगर दिख भी जाता, तो पढ़ता नहीं. सोशल मीडिया के ज़माने में एक बड़ी मुसीबत है रैंडम लेखों को पढ़ना. वक़्त भी जाया होता है और हासिल भी कुछ नहीं होता.

पढ़ने के बाद क़ायदे से सिन्हा की चिट्ठी को इग्नोर भी किया जा सकता था, पर भला हो मीडिया विजिल के ‘संपादक’ का जिन्होंने सिन्हा की चिट्ठी के साथ एक इंट्रो भी चस्पा कर दिया है जिसमें कहा गया है कि ‘रवीश कुमार की निंदा या आलोचना करने वाले लोगों की भाषा के उलट सिन्‍हा की भाषा बहुत विनम्र है, बातें दलील के साथ रखी गई हैं और कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है… मीडियाविजिल इस पत्र में उल्लिखित घटनाओं की पुष्टि नहीं करता लेकिन एक पूर्व सहकर्मी और वरिष्‍ठ पत्रकार की ओर से लिखे गए पत्र को बहसतलब बेशक समझता है.’ इस टिप्पणी में आगे संपादक के इस निष्कर्ष पर कुछ कहूँगा, पहले कुछ मीडियाविजिल के इस पत्र को छापने पर कुछ अनुमान लगाया जाये.

यह वेबसाइट आम तौर पर अच्छे विश्लेषण और ख़बरों को देता है जिसका व्यापक मतलब होता है. व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को पहली बार छपते हुए देख रहा हूँ. कुछ दिन पहले इस साइट पर एक पत्रकार द्वारा आरएसएस के प्रमुख को लिखे निजी पत्र को सार्वजनिक किया गया था. लेकिन उसका बाहर आना इसलिए ज़रूरी था ताकि यह पता चले कि इस सरकार में कुछ खेल और भी चल रहे हैं जो हमारी नज़रों से ओझल हैं. मैंने सोशल मीडिया पर यह चर्चा सुनी थी कि उक्त पत्रकार ने मीडियाविजिल साइट पर केस दर्ज करने की बात कही थी. चूँकि मामला संघ प्रमुख से जुड़ा हुआ है, तो चर्चा भी ख़ूब हुई. मुझे लगता है कि मीडियाविजिल के ‘संपादक’ और उनकी टीम ने उस पत्र के कारण बने दबाव के असर को कम करने के लिए सुशांत सिन्हा का रवीश कुमार के नाम पत्र को छापा है. यह मेरा अनुमान है और इस तरह के डैमेज कंट्रोल या बैलेंसिंग एक्ट मीडिया में नई बात भी नहीं है. मेरे अनुमान को सबसे अधिक आधार साइट के ‘संपादक’ द्वारा लिखे गये इंट्रो से मिलता है. अगर ऐसा नहीं है तो सिन्हा की भाषा को ‘विनम्र’ और इस पत्र को ‘बहसतलब’ की संज्ञा देनेवाली समझ चाहे और जो भी हो, संपादकीय समझ तो कतई नहीं है. इंट्रो में कुछ लड़खड़ाहट भी साफ़ दिखती है. ख़ैर, बेदम शाह वारसी का एक शेर मीडियाविजिल के लिए पेश है-

हल्की सी इक ख़राश है क़ासिद के हल्क़ पर
ये ख़त जवाब-ए-ख़त है कि ख़त की रसीद है

बहरहाल, अब आते हैं सिन्हा की चिट्ठी पर. इसमें मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं- रवीश की सैलेरी लाखों में है, रवीश एनडीटीवी में कर्मचारियों को हटाये जाने पर चुप रहे, एनडीटीवी सुरक्षाकर्मियों के मरने पर ‘शहीद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता, रवीश अपने पिता को याद क्यों करते हैं, प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में रवीश ने जिस डर का उल्लेख किया है, वह बेबुनियाद है आदि. सैलेरी वाली बात तो हास्यास्पद है ही, साथ ही सिन्हा की कुंठा को भी दर्शाती है. एक संस्था में काम करनेवाले लोगों के वेतन में विषमता पूँजीवाद, ख़ासकर नव-उदारवादी तंत्र, में एक चलन है. इसके लिए किसी एक शख़्स की ओर अँगुली उठाने का क्या मतलब है! सिन्हा जहाँ अभी जहाँ काम करते है, वहाँ सैलेरी पिरामिड उलटा चलता है क्या? अगर इस विषमता से सिन्हा को इतना ही दर्द है, तो वे उस आर्थिक तंत्र पर सवाल क्यों नहीं उठाते जिसकी वज़ह से ऐसा है? ऐसा नहीं कर सकते, तो मैं उन्हें इन शब्दों में सांत्वना देने की कोशिश करता हूँ-

दूसरों की अमानत पर हैरान न हो
ख़ुदा तूझको भी देगा परेशान न हो

यह टिप्पणी लिखते हुए अभी बालकनी में सिगरेट पीने गया था. नीचे एक चमचमाती बड़ी कार खड़ी थी. सिन्हा के लॉजिक से या तो मुझे उस पर थूक देना चाहिए था या उसके मालिक को कहना चाहिए था कि ऑटो के रेट पर एक चक्कर घुमा दो! चलिए वेतन विषमता की बात चली है, तो कुछ आँकड़े दे देता हूँ.  वर्ष 2015 की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की व्यस्क 71 फ़ीसदी आबादी की संपत्ति में हिस्सेदारी मात्र तीन फ़ीसदी है. इनकी औसत संपत्ति 10 हज़ार डॉलर से कम है. इसके बरक्स 0.7 फ़ीसदी आबादी के पास 45.2 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. इनकी औसत संपत्ति 10 लाख डॉलर से अधिक है. पिछले साल ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट ने बताया था कि दुनिया के शीर्ष एक फ़ीसदी के पास शेष आबादी की पूरी संपत्ति से अधिक माल है. और, यह विषमता 19वीं सदी के बाद से सबसे ज़्यादा है. ध्यान रहे, इन आँकड़ों में दबा-छुपा के रखे गये माल का हिसाब शामिल नहीं है. साल 1960 के बाद से आर्थिक असमानता में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है. ग्लोबल वेल्थ डेटाबुक, 2014 बता रहा है कि भारत के शीर्ष 10 फ़ीसदी धनिकों के पास सबसे ग़रीब 10 फ़ीसदी की संपत्ति से 370 गुना अधिक धन है. तो, बताया जाये कि इन सब के लिए रवीश और उनके कथित आठ लाख ज़िम्मेदार हैं या फ़िर मामला कहीं और फँसा है? और, जहाँ फँसा है, वहाँ सिन्हा जी पहुँच ही नहीं पा रहे हैं.

किसी निजी संस्थान में छँटनी उसी संस्थान में काम करनेवाला कोई और रोक सकता है क्या? किसी कर्मचारी को रोज़गार देनेवाला परेशान न करे, यह काम तो श्रम विभाग का होना चाहिए. लेकिन सिन्हा जी क्या कभी इस बात पर सवाल उठाये हैं कि पहले काँग्रेस और अब भाजपा सरकारें ताबड़तोड़ हायर-फ़ायर क़ानून ला रही हैं? यूनियन पर तमाम तरह के बंधन आयद किये जा रहे हैं. बाज़ार में काम नहीं है और सरकार मौज़ ले रही है. अगर कोई चुप भी रहा, तो आप उसे दोष किस आधार पर देंगे? एक पत्रकार या एक नागरिक के रूप में मुझे बोलने या नहीं बोलने का अधिकार है या नहीं? सवाल तो तब खड़ा होता है, जब मैं अपने निजी या पेशेवर जीवन में बेईमानी करूँ. सवाल तब खड़ा होता है कि जब मैं झूठ और बेहूदगी का सहारा लेकर फ़ेक न्यूज़ दूँ और किसी भी को भी देशद्रोही कह दूँ. सवाल तब खड़ा होता है जब सरकार के सामने मैं सदैव साष्टांग पड़ा रहूँ.

सिन्हा जी ने एनडीटीवी द्वारा ‘शहीद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करने की बात कही है. इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है. टीवी न के बराबर देखता हूँ. और किसी चैनल की संपादकीय नीति पर बिना जाने बोलने का तुक नहीं है और मुझे इतनी फ़ुरसत भी नहीं है कि इस बारे में पता लगाऊँ. पर, सिन्हा जी को याद दिलाना चाहूँगा कि भारत के गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजु ने लोकसभा में अप्रैल, 2015 में कहा था कि रक्षा बलों या अर्द्ध सैनिक बलों के लिए ‘शहीद’ शब्द परिभाषित नहीं है.

रवीश कुमार द्वारा अपने पिता को याद करने पर सिन्हा की तक़लीफ़ समझ से परे है. सुख-दुख में माँ-बाप और परिजनों को नहीं याद करोगे, तो किसको याद करोगे? अगर कोई ‘सिलेब्रिटी’ हो रहा है, तो सिन्हा जी के पेट में मरोड़ क्यों उठना चाहिए? परमहंस योगानंद के शिष्य जे डोनाल्ड वाल्टर्स (स्वामी क्रियानंद) का एक कथन उल्लिखित करना पर्याप्त होगा- ‘अपनी राष्ट्रीयता, भाषा और व्यक्तिगत रुचियों के बावजूद कुछ ऐसी वास्तविकताएँ हैं जिससे हम सभी का वास्ता है. जैसे हमें भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही हमें भावनात्मक पोषण- दूसरों से प्रेम, दया, प्रशंसा और सहयोग- की आवश्यकता होती है.’

अब आते हैं प्रधानमंत्री को लिखे रवीश के पत्र पर सिन्हा की बेचैनी पर. अव्वल तो सिन्हा जी को अब तक यह जान जाना चाहिए था कि किसी को कुछ कहते समय मर्यादित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए. एक पत्रकार को भद्दा ट्रोल नहीं होना चाहिए. किसी को बीमार या मानसिक रोगी ऐसे कहा जाता है? आपको आपके बड़ों, शिक्षकों और संपादकों ने यही सिखाया है? यह न सिर्फ़ अपमानजनक है, बल्कि आपराधिक भी है. सोमवार को ही देशभर में पत्रकारों को निशाना बनाये जाने के विरुद्ध फिर से प्रदर्शन हुआ है. बौद्धिक कांचा इलैया की सोलिडैरिटी में प्रदर्शन हुआ है. लोग मारे जा रहे हैं. धमकियाँ दी जा रही हैं. ऐसे में रवीश का डर बेबुनियाद है? यह बीमारी है? अगर है भी, तो उन्होंने प्रधानमंत्री से बदतमीज़ और बददिमाग़ ट्रोलों की शिकायत की, तो आपको मिर्ची क्यों लग रही है सिन्हा जी?

सिन्हा जी को मेरी सलाह है कि अध्ययन-मनन पर ध्यान दें, कभी कसरत कर लें, खान-पान का ख़्याल रखें, सिनेमा-संगीत में दिलचस्पी लें. ज़ेहन में ज़हर और मन में कुंठा के विषाणु पालना अच्छी बात नहीं है. समाज को समृद्ध और स्वच्छ बनाया जाये. अमन-चैन रहे, यह प्रयास हो.

 प्रकाश के रे, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, bargad.org