Home टीवी दौड़ने वाले प्रसून बैठ गए..! ‘आज तक’ हम तेरा ऐतबार क्या करें...

दौड़ने वाले प्रसून बैठ गए..! ‘आज तक’ हम तेरा ऐतबार क्या करें ?

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कई बार भंगिमाओं में बदलाव, किसी बड़े बदलाव की आहट होती है। इस आहट में भविष्य से ज़्यादा वर्तमान का पता चलता है। चेहरे पर उभरी पीड़ा या चिंता की लक़ीरें, या किसी की मशहूर तेज़ी का अचानक मंथर हो जाना बताता है कि नेपथ्य में कुछ बड़ा घट रहा है…!

छोड़िए, इस दार्शनिकता को..हम भी भंगिमा बदल लेते हैं..!.तो ख़बर ये है कि अपने प्रसून बाबू के ‘दस्तक’ में कुछ खेला हो गया है…प्रसून यानी अपने पुण्य प्रसून बाजपेई जो ‘आज तक’ पर हफ़्ते पाँच दिन, रात 10 बजे ‘दस्तक’ देते हैं। इसके लिए वे बड़े ‘स्टायल’ से इंट्री लेते हैं…घंटी बजते ही वे तेज़ी से स्टूडियो के एक कोने से निकल कर बीच में पहुँचते हैं और फिर बड़े अंदाज़ में हाथ मलते हुए पलटते हैं…(प्रसून का हथेली रगड़ना उनका ऐसा ट्रेड मार्क है जिस पर चुटकुले भी सुनाए जाते हैं !) और फिर देश की तस्वीर का ख़ाका पेश करते हैं।

प्रसून ‘आज तक’ की शुरुआती टीम के हिस्सा रहे हैं। एसपी सिंह वाली टीम के समय से। बीच में वे ‘एनडीटीवी’, ‘ज़ी न्यूज़’, ‘समय’ वगैरह भी गए, लेकिन दिल उनका ‘आज तक’ में ही लगता है। तो पिछले कुछ सालों से वे फिर ‘आज तक’ में हैं। ‘दस्तक’ जैसे उनके लिए ही बना है।

प्रसून की अपनी अपनी एक पहचान है जो चैनलों के बदलने के साथ बदली नहीं। अगर चकमक ख़बरिया चैनलों से गुज़रते हुए कान में सरोकार, किसान, महंगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, लोहिया, गाँधी, विनोबा, भगत सिंह, आदिवासी जैसे शब्द पड़ कान में पड़ें तो कोई भी समझ जाता है कि पर्दे पर प्रसून जी ही हैं।

प्रसून 18-20 मिनट की अपनी दैनिक ‘पारी’ में पहली ही गेंद से चौए-छक्के जड़ने लगते हैं। कई बार तो ठेठ अख़बारी अंदाज़ में। आँकड़ों से भरे ग्राफ़िक्स के ज़रिए तमाम सरकारी दावों की चिंदी-चिंदी उड़ाते प्रसून का सफेद दाढ़ी के बीच झलकता चेहरा, अद्भुत संतोष से भरा होता है….। वैसे भी, न्यूज़ चैनलों में लंबा वक्फ़ा काटने के बावजूद किसी भी किस्म की ‘बकवास’ से बरी रहने का संतोष कम नहीं है। उनकी ब्राँडिंग ऐसी है कि चैनल उनसे ‘बकवास’ नहीं कराता उलटा मौक़ा पड़ने पर उनकी तस्वीर के साथ चैनल के कुछ ‘सुगंधित मूर्खों’ का भी बेड़ा पार करा देता है। प्रसून बॉलीवुड प्रेमी भी हैं। अपनी बैटिंग ख़त्म करके जाते-जाते कोई गाना ज़रूर बजाते हैं, हालाँकि मुखड़े से अंतरे तक पहुँच पाना कम ही हो पाता है..।

लेकिन इधर कुछ ऐसा ज़रूर हुआ है जिसने प्रसून का अंदाज़ बदल दिया है !

शुक्रवार 7 अप्रैल को रात दस बजे प्रसून ने ‘दस्तक’ तो दी, लेकिन बेअसर। उनकी मशहूर तेज़ी ग़ायब थी. अपनी ख़्याति से उलट प्रसून बैठे हुए थे। हथेलियाँ मलने की जगह, उन्हें मेज़ पर दाएँ-बाएँ इस तरह जमाए हुए थे जैसे हाथ हटेगा तो बैठे भी ना रह पाएँगे, लुढ़क जाएँगे।

प्रसून अपने कार्यक्रम में शामिल की गई ख़बरों की वॉयस ओवर (पीछे से सुनाई पड़ रही आवाज़) ख़ुद करते हैं, लेकिन इस दिन आवाज़ दूसरों की थीं। प्रसून के साथ काम करने वाले प्रोड्यूसर हमेशा परेशान रहे हैं कि वे कभी लिखे हुए ‘ऐंकर लिंक’ नहीं पढ़ते। अपनी मर्ज़ी से बोलते हैं। और विश्लेषण भी कुछ इस अंदाज़ में करते चलते हैं जिसकी प्रोड्यूसर को हवा भी नहीं होती। कई बार इससे टाइम मैनजमेंट गड़बड़ा जाता है। ‘प्रसून को कोई अनुशासित नहीं कर पाया’- कई पुराने प्रोड्यूसर बड़बड़ाते मिल जाते हैं।

लेकिन शुक्रवार को प्रसून पूरी तरह अनुशासित थे। दो-तीन लाइन का ऐंकर-लिंक पढ़कर जैसे सिर का बोझा हटा रहे थे। ख़बरों में भी उनका तंजिया अंदाज़ ग़ायब था। पाँच मिनट तो सिर्फ़ शेख हसीना के स्वागत में मोदी की ‘ऐतिहासिक पहल’ को दिया गया था। बाक़ी में ज़्यादातर ‘योगी-योगी’ की धूम थी। यक़ीन करना मुश्किल हा रहा था कि यह ‘वही प्रसून’ हैं और यह वही ‘दस्तक’ है। क्या यह सब महज़ संयोग हो सकता है..?

प्रसून का बैठ कर कार्यक्रम पेश करना !
प्रसून का वॉयसओवर ना करना !
प्रसून का अपने अंदाज़ में ऐकर लिंक ना पढ़ना !

यह सब बता रहा था कि कहीं कुछ गंभीर घटा है। आख़िर यह बदलाव किसके कहने से आया ? प्रसून की अनिच्छा तो उनके अंदाज़ से ही प्रकट हो रही थी। यह बदलाव किसी ‘आम ‘ की इच्छा भी नहीं हो सकती। इसके पीछे ‘ख़ास’ लोग ही हो सकते हैं। सवाल यह है कि कितने ख़ास ? क्या ये आज तक के अंदर के ‘ख़ास’ हैं या बाहर के ? बाहर के हैं तो क्या ‘आज तक’ झुकने की तैयारी कर रहा है ? या फिर ‘प्रोजेक्ट’ सिर्फ़ प्रसून को झुकाना है ? क्या ये क़िस्सा कुछ-कुछ रवीश कुमार और एनडीटीवी जैसा है..?

दौड़ते हुए प्रसून को बैठे देखना भी कोई देखना है ! आज़ाद परिंदे का पंख नोचकर उड़ाना या टाँग तोड़कर नचाना किसकी ख़्वाहिश हो सकती है ?

जो भी हो, हालात अच्छे नहीं हैं। प्रसून जैसे चेहरे न्यूज़ चैनलों को पूरी तरह ख़ारिज करने की राह में बाधा की तरह हैं। लेकिन शायद चैनल ख़ारिज ही होना चाहते हैं। 7 अप्रैल के शो में प्रसून ने बीते ज़माने के फ़िल्मी सितारे जीतेंद्र के 75वें जन्मदिन पर उन पर फ़िल्माया गया गाना बजाया–मुसाफ़िर हूँ यारों…ना घर है ना ठिकाना….मुझे चलते जाना है…..!

क्या यह गाना कोई इशारा था…दर्शकों को अब ये गाना पड़ेगा –

“प्रसून प्रसून ना रहा, दस्तक दस्तक ना रहा….आज तक हमें तेरा ऐतबार ना रहा..’

हमरी ना मानो, नीचे वीडियो पर चटका लगाओ..

.बर्बरीक

14 COMMENTS

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