Home टीवी ‘न्यूज़रूम राष्ट्रवाद’ : देखते जाते हैं हम बस आँख मूँदे !

‘न्यूज़रूम राष्ट्रवाद’ : देखते जाते हैं हम बस आँख मूँदे !

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पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों में भूमंडलीकरण के आने से राष्ट्र-राज्य की शक्ति में कमी आई है.  हालांकि, राष्ट्र-राज्य की शक्ति में आई कमी के साथ-साथ इन्हीं वर्षों में दुनिया भर में दक्षिणपंथी ताकतों और उग्र-राष्ट्रवाद  का उभार भी हुआ है. पिछले महीने यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के लिए हुए जनमत संग्रहदक्षिणपंथी ताकतों की मजबूती और राष्ट्र-राज्य की कमजोर होती शक्ति को फिर से पाने का ही एक प्रयास है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के इमिग्रेशन, मुस्लिम समुदाय को लेकर दिए गए भड़काऊ बयानों को हम इसकी अगली कड़ी के रूप में देख सकते हैं.

भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में इसकी अभिव्यक्ति पिछले कुछ महीनों से विभिन्न मुद्दों (लव जिहाद, बीफ बैन, जेएनयू, कश्मीर) के बहाने राष्ट्रवाद के ऊपर चल रही बहस के रुप में भी देखी जा सकती है.

इस बहस के पीछे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की  राजनीति,  आत्म और अन्य की एकांगी व्याख्या और भारतीय इतिहास की औपनिवेशिक समझ-बूझ की एक बड़ी भूमिका है, जो भारतीय इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रितानी हुकूमतों के काल के आधार पर विभाजित करके देखती रही है.

बहरहाल, ये सारी बहसें अखबारों, खबरिया चैनलों और खास कर ‘प्राइम टाइम’ के माध्यम से जिस रूप में हमारे सामने आ रही है, वह एक अलग विश्लेषण की मांग करता है. दुनिया भर में बाजार और सूचना क्रांति को भूमंडलीकरण का मुख्य औजार माना गया है.  प्रसंगवश, भारत में भूमंडलीकरण के बाद ही भाषाई अखबारों और खबरिया चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ.

सवाल है कि भारत में राष्ट्रवाद और मीडिया के इस संबंध को हम किस रूप में देखें? क्या यह भूमंडलीकरण के साथ ही सहज रुप से विकसित हुए हैं? या भारतीय संदर्भ में इसकी कोई ख़ास विशेषता है?

राष्ट्रवाद के उदय और उभार के पीछे बेंडिक्ट एंडरसन ने ‘प्रिंट पूंजीवाद’ की भूमिका को रेखांकित किया है. उनका मानना है कि राष्ट्र की अवधारणा हमारी कल्पना में ही साकार होती है, और इसे साकार बनाने में मास मीडिया की एक बड़ी भूमिका होती है. हालांकि, भारत में भाषाई मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनल जिस तरह के राष्ट्रवाद को इन दिनों बढ़ावा दे रहे हैं वह उग्र-राष्ट्रवाद का नमूना है. पिछले दिनों कश्मीर में चरमपंथी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हुई मौत और बाद के घटनाक्रम पर कुछ न्यूज चैनलों के कवरेज और उन्मादी बहस-मुबाहिसा को देख कर कश्मीर के आईएएस अधिकारी शाह फैसल ने आक्रोश में इसे‘न्यूजरूम नैशलनिज्म’ का नाम दिया, जो हिंदुस्तान में वाद-विवाद-संवाद की पुरानी परंपरा को कुंद करता है.  यह राष्ट्रवाद कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग तो मानता है, पर जब कोई कश्मीर भू-भाग में रहने वाले कश्मीरियों की वेदना-संवेदना का जिक्र करता है तो वह राष्ट्रविरोधी करार दिया जाता है.

उल्लेखनीय है कि भारत में 19वीं सदी के आखिरी और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रवाद को खूब बढ़ावा दिया था. यह राष्ट्रवाद औपनिवेशनिक शक्तियों के खिलाफ था, पर आज़ादी के बाद एक संप्रभु राष्ट्र-राज्य में राष्ट्रवाद और मीडिया का वहीं स्वरूप नहीं रह गया जो आजादी के संघर्ष के दिनों में था. हालांकि, आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में अखबार, फिल्म और सरकारी रेडियो- टेलीविजन राष्ट्र निर्माण में सहयोग दे रहे थे, पर उनमें उग्रता नहीं थीं. मीडिया का प्रसार और ‘पब्लिक स्फीयर’ में उसकी भूमिका भी सीमित थी.

 

पिछले दशकों में हिंदी क्षेत्र में मंडल-कमंडल की एक नई राजनीति सामने आई. साथ ही लोगों की आय और शिक्षा में भी बढ़ोतरी हुई और एक नया पाठक-दर्शक वर्ग उभरा है, जिसे हम नव मध्यम वर्ग कह सकते हैं. मीडिया की पहचान एक हद तक इसी वर्ग (टारगेट आडिएंश) से जुड़ी हैं. इस वर्ग में बहुसंख्यक दलित, आदिवासी, किसान, मजदूर और महिलाएँ शामिल नहीं हैं.

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है, लोकतंत्र की एक मजबूत संस्था है, उसकी एक स्वायत्त संस्कृति है. जब भी हम मीडिया और राष्ट्रवाद के संबंधों की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के इस द्वंद्वात्मक रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया  का विस्तार हुआ है लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य पाठकों की संख्या को बढ़ाना, टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है.

साथ ही हमें इन मीडिया संस्थानों के संपादकों-मालिकों की राजनीतिक और कारोबारी हितों को भी रेखांकित करना होगा. क्या यह अनायास है कि पिछले कुछ वर्षों में मीडिया घराने के मालिक संसद में पहुँचने के लिए लालायित रहते हैं. कुछ मालिक-संपादक बकायदा राजनीतिक पार्टियों के साथ मंच साझा करने में, उनके करीबी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं. जाहिर है, ऐसे में राष्ट्रवाद और संस्कृति की उनकी समझ उनके चैनलों पर उनकी राजनीति से प्रेरित दिखेगी. बात चाहे जेएनयू की हो, कश्मीर की हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की.

साथ ही, राष्ट्रवाद जैसे जटिल मुद्दे के विवेचन-विश्लेषण में मीडियाकर्मियों की शिक्षण-प्रशिक्षण की भी अपनी भूमिका है. पिछले दो दशकों में जिस तरह से मीडिया का उभार हुआ है और जिस तरह राजनीति मीडिया जनित होकर प्राइम टाइम के माध्यम से हमारे सामने आती है वह पत्रकारों के पेशेवर होने की मांग करती है. वर्तमान में मीडिया में पेशेवर नैतिकता की दरकार किसी भी अन्य पेशे से ज्यादा है. दुर्भाग्यवश, भारत में मीडिया के अभूतपूर्व फैलाव के बाद जो मीडिया संस्कृति विकसित हुई है उसमें अभी भी पत्रकारों के शिक्षण-प्रशिक्षण पर विशेष जोर नहीं है. फलत: कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं.

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.अरविंद दास

(लेखक पत्रकार और मीडिया अध्येता हैं।)