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‘हिंदू’ मीडिया को हिंदू महिलाओं से हमदर्दी नहीं ! सिर्फ़ मुस्लिम समाज परफ़ेक्ट चाहिए !

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शीबा असलम फ़हमी

 

शीबा असलम फ़हमी (इस मज़मून की लेखिका), ज़किया सोमन, नूरजहां सफिअ निआज़, नाइश हसन आदि महिलाओं को अब सोचना चाहिए की जो मीडिया, प्रगतिशील समाज और नारीवादी, मुस्लमान महिला को न्याय दिलाने की लड़ाई बिना थके लड़ रहे हैं और मुसलमानो से ज़्यादा लड़ रहे हैं, वही लोग बलात्कार और क़त्ल जैसे जघन्य अपराधों कि शिकार हिन्दू महिलाओं से रत्ती भर हमदर्दी क्यों नहीं करते ? हिन्दू मीडिया मालिक, हिन्दू चैनल हेड, हिन्दू एंकर आखिर हिन्दू महिलाओं के ख़िलाफ़ क्यों हैं?

इन्हे पूरे भारतीय समाज में सेहतमंद बदलाव क्यों नहीं चाहिए? सिर्फ मुस्लिम समाज में ही सब परफेक्ट क्यों चाहिए?

स्वामी नित्यानंद, बाबा सारथी, संत रामपाल, आसाराम, बाबा गुरमीत या फिर किसी छोटे-मोटे बाबा-योगी द्वारा हिन्दू बेटियों से धर्म के नाम पर बलात्कार की एक लम्बी आपराधिक परंपरा चली आ रही है इसके बावजूद इस पर मीडिया आंदोलित नहीं होता. आजतक कभी भी मैंने ऐसी रेपर्टिंग नहीं देखि जिसमे लगातार हिन्दू बाबा-साधुओं-संतो की वासना और अपराधों पर जेंडर के एंगल से स्टोरी या रेपर्टिंग की गयी हो. उन पर सैद्धांतिक कुठाराघात किया गया हो. उनके मठ, आश्रम, केंद्र, डेरों, ग़ुफ़ाओं पर, हमेशा भांडा फूटने, जग हंसाई होने, विदेशों में रिपोर्टिंग होने, मुक़दमा दर्ज होने, फैसला तक आ जाने के दबाव में ही रिपोर्टिंग होती है जिसमे IPC के क़ानूनी दायरे में बात की जाती है. बलात्कारी गुरमीत ने अगर हिंसा का तांडव न करवाया होता तो मीडिया चुप ही था 12 सालों से। यही हाल आसाराम बापू और संत रामपाल की गिरफ़्तारी पर हुआ.

सवाल ये है की महिला-पुरुष दोनों की मौजूदगी से भरे इन धार्मिक केंद्रों पर विशाखा गाइड लाइन के तहत यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कमेटी बनाने की आदर्श व्यवस्था पर सरकार, महिला आयोग, मीडिया और न्यायालय ऐसी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इन केंद्रों को ‘सेक्सुअल हरस्मेंट ऑफ़ वीमेन एट वर्कप्लेस एक्ट 2013’ के दायरे में लाने की मांग क्यों नहीं हो रही? हिन्दू धार्मिक नेताओं की वासना और व्यभिचार की शिकार महिलाऐं तब तक मीडिया में और बृहत हिन्दू समाज में न्याय नहीं पातीं जब तक कोई व्हिसल-ब्लोअर, रिश्तेदार, पत्रकार की जान नहीं चली जाती. तब भी ये ज़रूरी है की वासना की शिकार महिला दलित या आदिवासी न हो वरना भंवरी देवी, सोनी सोरी जैसा फैसला आता है। होना तो ये चाहिए था की जिस तरह त्वरित तीन तलाक़ को जड़ से ख़त्म करने की मुहीम मीडिया ने चलाई, बार बार न्यायालय ने फैसले दिए, चुनाव घोषणापत्र में इसको मुद्दा बनाया गया वैसा ही आंदोलन इन मठों के ख़िलाफ़ खड़ा होता.

हिन्दू महिलाओं के अपराधी जब तक हिन्दू पुरुष हैं, हिन्दू बलात्कारी योगी-बाबा-संत हैं, हिन्दू भगोड़े पति-पुत्र हैं, तब तक मीडिया इन अपराधों को छुपाता है. हिन्दू विधवा आश्रमों, डेरों, ग़ुफ़ाओं में वासना का अँधा कुआं कितनी महिलाओं की आत्मा को क़त्ल कर चुका है इसका कोई हिसाब नहीं है. लेकिन मजाल है की इस जगज़ाहिर अन्याय और अत्याचार पर इन धार्मिक लोगों को घेरा जाए.

त्वरित तीन तलाक़ की पीड़ित बुर्क़ापोश मुस्लमान महिला की त्रासदी दर्शाने के लिए कितने तरह तरह के प्रभावशाली ग्राफ़िक, नाट्य-रूपांतर, और क्रिएटिव यही मीडिया तैयार करता है, लेकिन धर्म बदल कर बहु विवाह करनेवाले चंद्रमोहन-धर्मेंद्र जैसे अनगिनत हिन्दू पतियों, हिन्दू भगोड़े पतियों, बिना शादी के रखैल रखनेवाले नारायण दत्त तिवारी जैसे अनगिनत अय्याश नेताओं, प्रोफ़ेसरों, बुद्धिजीवी मर्दों, नाजायज़ औलादों के हक़ मारनेवाले पिताओं, विधवा-आश्रमों को आबाद रखनेवाले बेटों, बलात्कारी योगी-संत-बाबा और इन सब पर चुप रहनेवाली हिन्दू धर्म व्यवस्था पर मीडिया वैसा कुठाराघात क्यों नहीं करता जैसा कुठाराघात वो संबित पात्राओं, राकेश सिन्हाओँ और बंसलों से इस्लाम पर करवाता है तीन तलाक़ और बहुविवाह पर ? बाबाओं पर सिर्फ सियासी बहस और मुस्लिम समाज पर सैद्धांतिक बहस? हिन्दू लड़कियों के अधिकार, इज़्ज़त, बराबरी जैसे मुद्दे कहाँ हैं?

हिन्दू लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए भारतीय मीडिया तभी आगे आता है जब अपनी मर्ज़ी से किसी हदिया या करीना कपूर ‘पीड़िता’ ने मुस्लमान मर्द से प्रेम विवाह किया हो. आख़िर हिन्दू मर्दों की शिकार हिन्दू महिलाओं पर कौन फ़िक्र करेगा? मौलाना या चाइना ?

इस बीच ये भी रेखांकित करने की ज़रुरत है की मुस्लिम बुनियाद परस्ती पर जब भी भारतीय न्यायलय हमला करता है, मौलानाओं ने उस पर मौखिक या लोकतान्त्रिक विरोध ही जताया है, जबकि बाबरी मस्जिद गिराए जाने से ले कर, बाबा गुरमीत के बलात्कारों पर फैसले तक, हिन्दू धार्मिक अराजकता किस किस तरह से सड़कों पर तांडव करती रही है ये किसी से छुपा नहीं है. ऐसे में अब ये ज़रूरी है की हम मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट इस मीडिया और समाज की चुनिंदा संवेदनशीलता-प्रगतिशीलता को समझें जो सिर्फ मुस्लमान मर्द को नीचा दिखाने के लिए ही उभरती है. एक खास तरह से मुस्लिम महिला का दर्द उभारने की ये कला हकीकत में इस्लाम और आम मुस्लमान मर्द के प्रति समाज में एक घिन्न पैदा कराने के लिए है क्या? जिसका भयानक नतीजा सड़कों पर घेर-घेर के मारे जा रहे बेक़ुसूर मुस्लमान मर्द भुगत रहे हैं.

मुस्लिम समाज में हालात बेहतर होने चाहिए, घर के अंदर भी, बाहर भी, जिसकी कोशिश हम सब करें, लेकिन दोग़लों को मौक़ा दिए बग़ैर. आइये बातचीत करें, बैठकें करें, ज़िद्द करें और क़ानूनी लड़ाई भी लड़ें, मौलानाओं से भी और सरकारों से भी, लेकिन इस लेहाज़ के साथ की सुधार के बजाय तबाही न आ जाए.



शीबा असलम फ़हमी
लेखिका और सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर सक्रिय।



 

2 COMMENTS

  1. Madam aap dono taraf kaisay rah lati hai koi doglapan ka hunar aap say shikay iss mamlay may. Kal tak aap bhi usse media kay saath milkar muslim mahilao ko 3 talak say nijad dila rahi thi. Aur aaj palat kar ussi media par ungli utha rahi hai aur muslim mardo ki himayati ban rahi hai iss baar aap ka kya naya agenda hai.

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