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IBN7 के आकाश सोनी ने भी इक़बाल को पाकिस्तान भेजा ! टैगोर पर चले झूठ के चाबुक !!

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“कौन से इकबाल की बात को मानें, जो सेक्युलर थे पहले, फिर पाकिस्तान चले गये थे !”

यह टिप्पणी थी आईबीएन7 के एँकर आकाश सोनी की। 22 दिसंबर की शाम 5-6 के बीच राष्ट्रगान को लेकर सुब्रह्मण्यम स्वामीकृत विवाद पर सजी चौपाल में ब्रेक के बाद (5:45 pm के आसपास) कुछ सार्थक हस्तक्षेप की कोशिश करते जेएनयू के प्रो.चमनलाल को चुप कराते हुए आकाश ने वही ग़लती की जो एक दिन पहले एबीपी के एंकर अभिसार शर्मा कर चुके थे। यानी 1938 में दिवंगत हो चुके अल्लामा इक़बाल को आकाश ने भी उस पाकिस्तान भेज दिया जो 1947 में अस्तित्व में आया। (इस संबंध में लंबी बहस मेरी पिछली पोस्ट में देखी जा सकती है।)

बहरहाल, यहाँ सिर्फ इक़बाल के साथ ही मनमर्ज़ी खेल नहीं किया गया गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की निष्ठा पर भी झूठ के कोड़े बरसाये गये। “जन गण मन पर रण” शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान आईबीएन7 स्वामी के आरोपों पर आँख मूँद कर भरोसा करते हुए झूठ फैलाने में जुटा रहा। एँकर आकाश सोनी ने कई बार स्वामी और संघी चर्चाकार राकेश सिन्हा के इस आरोप पर सहमति जताई कि टैगोर ने ‘जन गण मन’ को को जॉर्ज पंचम के स्वागत में रचा और उन्हें अधिनायक कहा जो टैगोर की औपनिवेशिक गुलामी की मानसिकता का सबूत है। उधर, चैनल की स्क्रीन पर स्वामी के आरोपों को सही ठहराते हुए ग्राफिक्स चल रहे थे। ऐसे ही एक ग्राफिक्स में कहा गया था—
‘1912 के कोलकाता अधिवेशन में ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम के स्वागत में जन गण मन गाया गया।‘

हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस का अधिवेशन 1911 में हुआ था। लेकिन चूँकि मोदी को लिखे स्वामी के पत्र में 1912 कहा गया है तो चैनल के लिए वही अंतिम सत्य था। इतिहास जाये भाड़ में। जॉर्ज पंचम की प्रशंसा के आरोप को लेकर भी यही रुख रहा।

बहरहाल, मित्रो राष्ट्रगान विवाद की सच्चाई भी जान लीजिए। इस पर खुद टैगोर का स्पष्टीकरण मौजूद है। उनके हिसाब से राष्ट्रगान में ‘अधिनायक’ शब्द, राष्ट्र की जनता, उसका सामूहिक विवेक या फिर वह सर्वशक्तिमान है जो सदियों से भारत के रथचक्र को आगे बढ़ा रहा है। मूल रूप से संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में लिखे गये इस पांच पदों वाले इस गीत का तीसरा पद ग़ौर करने लायक है-

पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।
दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे
संकटदुःखत्राता।
जनगणपथपरिचायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

इस बंद में एक ‘भीषण विप्लव’ की कामना कर रहे टैगोर ‘भाग्यविधाता’ के रूप में कम से कम जॉर्ज पंचम की बात नहीं कर सकते। न अंग्रेज सम्राट की कल्पना भारत के ‘चिरसारथी’ के रूप में की जा सकती है। जाहिर है, टैगोर ऐसे आरोप से बेहद आहत थे। वे इसका जवाब देना भी अपना अपमान समझते थे। 19 मार्च 1939 को उन्होंने ‘पूर्वाशा’ में लिखा–
‘अगर मैं उन लोगों को जवाब दूंगा, जो समझते है कि मैं मनुष्यता के इतिहास के शाश्वत सारथी के रूप में जॉर्ज चतुर्थ या पंचम की प्रशंसा में गीत लिखने की अपार मूर्खता कर सकता हूँ, तो मैं अपना ही अपमान करूंगा।’

टैगोर की मन:स्थिति का कुछ अंदाज़ 10 नवंबर 1937 को पुलिन बिहारी सेन को लिखे उनके पत्र से भी पता चलता है। उन्होंने लिखा- “ मेरे एक दोस्त, जो सरकार के उच्च अधिकारी थे, ने मुझसे जॉर्ज पंचम के स्वागत में गीत लिखने
की गुजारिश की थी। इस प्रस्ताव से मैं अचरज में पड़ गया और मेरे हृदय में उथल-पुथल मच गयी। इसकी प्रतिक्रिया में मैंने ‘जन-गण-मन’ में भारत के उस भाग्यविधाता की विजय की घोषणा की जो युगों-युगों से, उतार-चढ़ाव भरे
उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए भारत के रथ की लगाम को मजबूती से थामे हुए है। ‘नियति का वह देवता’, ‘भारत की सामूहिक चेतना का स्तुतिगायक’, ‘सार्वकालिक पथप्रदर्शक’ कभी भी जॉर्ज पंचम, जॉर्ज षष्ठम् या कोई अन्य
जॉर्ज नहीं हो सकता। यह बात मेरे उस दोस्त ने भी समझी थी। सम्राट के प्रति उसका आदर हद से ज्यादा था, लेकिन उसमें कॉमन सेंस की कमी न थी।“

टैगोर इस पत्र में 1911 की याद कर रहे हैं जब जॉर्ज पंचम का भारत आगमन हुआ था। इसी के साथ 1905 में हुए बंगाल के विभाजन के फैसले को रद्द करने का ऐलान भी हुआ था। बंगाल के विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के रूप में एक बवंडर पैदा हुआ था। 1857 की क्रांति की असफलता के बाद यह पहला बड़ा आलोड़न था जिसने पूरे देश को हिला दिया था। आखिरकार अंग्रेजों को झुकना पड़ा था। उस समय कांग्रेस मूलत: मध्यवर्ग की पार्टी थी जो कुछ संवैधानिक उपायों के जरिये भारतीयों के प्रति उदारता भर की मांग कर रही थी। ऐसे में अचरज नहीं कि बंगाल विभाजन रद्द करने के फैसले के लिए सम्राट के प्रति आभार प्रकट करने का फैसला हुआ। 27 जुलाई 1911 को इस अधिवेशन में सम्राट की प्रशंसा मे जो गीत गाया गया था वह दरअसल राजभुजादत्त चौधरी का लिखा “बादशाह हमारा” था। लेकिन चूंकि अधिवेशन की शुरुआत में जन-गण-मन भी गाया गया था इसलिए दूसरे दिन कुछ अंग्रेजी अखबारों की रिपोर्ट में छपा कि सम्राट की प्रशंसा में टैगोर का लिखा गीत गाया गया। भ्रम की शुरुआत यहीं से हुई।

समय के साथ यह भ्रम राजनीतिक कारणों से बढ़ाया गया। आरएसएस लगातार प्रचारित करता रहा कि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान होना चाहिए था, लेकिन जन-गण-मन को यह दर्जा दिया गया जो अंग्रेज सम्राट के स्वागत में रचा गया था। आशय यह बताना था कि आजाद भारत को मिला पं.नेहरू का नेतृत्व कम राष्ट्रवादी था और उसने असल राष्ट्रवादियों को अपमानित करने के लिए ऐसा किया। यह बात भुला दी जाती है कि 24 जनवरी 1950 (26 नवंबर 1949 नहीं, जैसा कि स्वामी कह रहे थे और आकाश सिर हिला रहे थे) को जब डा.राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के सामने जन-गण-मन को राष्ट्रगान घोषित किया था तो अपने बयान में वंदे मातरम को भी समान दर्जा देने का ऐलान किया था।

दोस्तो, अज्ञानी होना किसी का मौलिक अधिकार है। लेकिन किसी का अज्ञान अगर समाज की चेतना को दूषित करने लगे तो प्रतिकार जरूरी है। संपादकों को होश में लाने और यह बताने कि हिंदी समाज को हल्के में लेने की ग़लती न करें, और क्या तरीक़ा हो सकता है कि हम सब बोलें…लब खोलें?

नोट—आईबीएन से अपनी बरख़ास्तगी को अवैध मानते हुए मैं अदालती लड़ाई लड़ रहा हूँ।

(पत्रकार पंकज श्रीवास्तव के फेसबुक पेज से )