Home टीवी चैनलों ने नहीं, हनीप्रीत ने चैनलों को खोजा ! ये डेराप्रेमी नेताओं...

चैनलों ने नहीं, हनीप्रीत ने चैनलों को खोजा ! ये डेराप्रेमी नेताओं का एक्सक्लूसिव था !

SHARE

3 अक्टूबर सुबह 8 बजकर 47 मिनट पर अचानक सबसे तेज़ ‘आज तक’ ने धमाका किया। चैनल ने ‘सुपर एक्सक्लूसिव’ का दावा करते हुए ऐलान किया-  “जिसे ढूंढ रही थी,दो देशों और सात राज्यों की पुलिस, उसे खोज निकाला आज तक ने।”

कुछ सूँ-साँ के साथ, रिपोर्टर सत्येंद्र चौहान एक गाड़ी में बैठे हनीप्रीत से इंटरव्यू करते हुए सामने आए। नेपथ्य का अँधेरा रात की गवाही थी। जिस हनीप्रीत के लिए 37 दिनों से चैनलों ने कल्पनाओं के घोड़े खोल रखे थे, जिसके चाल, चरित्र और चेहरे को लेकर एक भयावह तस्वीर बनाई गई थी, वह डरी-सहमी और आँख में आँसू लिए तमाम सवालों का जवाब दे रही थी। बता रही थी कि चैनलों की बनाई अपनी ही छवि से वह डर गई है।

 

आख़िर यह सब हुआ कैसे। आज तक ने बताया — ‘हम उसे समझाने में कामयाब रहे कि उसे ना सिर्फ कानून का साथ देना चाहिए, बल्कि खुद पर लगे इल्ज़ामों का सच भी बताना चाहिए। हनीप्रीत मान गई। 2 और 3 अक्टूबर की दरम्यानी रात उसने हमें गुमनाम जगह बुलाया ।’

‘आज तक’ ने विजयी भाव से ऐलान किया- “37 दिन बाद जब नमूदार हुई तो वह कैमरा आज तक का ही था।  8 बजकर 47 मिनट पर जब ‘आज तक’ ने सबसे पहले इंटरव्यू दिखाया तो दिल्ली से लेकर पंचकूला तक पूरा का पूरा पुलिस तंत्र सन्नाटे में आ गया। छलावा बनी हनीप्रीत का राज़ अब सबके सामने है, वह पुलिस की गिरफ्त में है, लेकिन आज तक के कैमरे में आने के बाद। ”

वाक़ई किसी चैनल के लिए या रिपोर्टर के लिए उपलब्धि है कि जिसे दो मुल्कों और सात राज्यों की पुलिस ढूँढ रही हो, उसका वह इंटरव्यू कर ले। सोशल मीडिया में आज तक का धमाका छा गया। ‘सबसे पहले’ और ‘सुपर एक्सक्लूसिव’ के दावे ने दूसरे प्रतिद्वंद्वी चैनलों को सकते में डाल दिया। ‘आज तक’ ने फिर साबित किया कि वह क्यों ‘नंबर वन’ है।

लेकिन ठीक उसी वक़्त, टीआरपी के पायदान पर काफ़ी नीचे खड़ा एक और चैनल भी यही दावा कर रहा था। चैनल था, न्यूज़ 24। वहाँ भी दावा किया जा रहा था कि 2 और 3 अक्टूबर की दरम्यानी रात उसके संवाददाता विशाल एंग्रीस ने हनीप्रीत से एक्सक्लूसिव बात की। संवादाता और बातचीत सामने थी। हनीप्रीत यहाँ भी एक गाड़ी में उसी मुद्रा में बैठी थी जैसे आज तक पर दिखी थी। यह ‘आज तक’ में इंटरव्यू प्रसारण शुरू होने के मिनट-दो मिनट बाद ही हुआ।

‘आज तक’ ने दावा किया था कि उसके संवाददाता ने हनीप्रीत ने ‘ढूंढ निकाला।’ लेकिन यहाँ विशाल एंग्रीस पूरी ईमानदारी से बता रहे थे कि दरअसल हुआ क्या। उन्होंने बताया कि एक अनजान शख्स ने तीन दिन पहले इसके लिए फ़ोन किया था।

विशाल के मुताबिक 2 और 3 की दरम्यानी रात उन्हें करीब एक बजे मिलने के लिए बुलाया गया।

जब वे नियत स्थान पर पहुँचे तो उन्हें अपनी कार छोड़ दूसरी कार में बैठाया गया। उनके और कैमरामैन की आँखों में पट्टी बाँध दी गई।

यहाँ तक कि कैमरे पर भी कपड़ा डाल दिया गया। मोबाइल फोन बंद करा दिए गए ताकि वे रास्ते और स्थान को ना जान सकें। फिर जब गाड़ी रुकी तो उन्हें एक और गाड़ी में ले जाया गया जहाँ हनीप्रीत मौजूद थी। रात के अंधेरे में गाड़ी के अंदर बैठे-बैठे ही उन्होंने इंटरव्यू लिया।

न्यूज़ 24 की कहानी से साफ़ है कि ‘आज तक’ का यह दावा झूठा था कि उसने हनीप्रीत को खोजा और उसकी बातचीत ‘सुपर एक्सक्लूसिव’ थी। दरअसल हनीप्रीत ने अपनी ज़रूरत के तहत चैनलों को खु़द खोजा था। उसकी इच्छा से चैनलों को बुलाया गया इंटरव्यू के लिए। उसने दोनों चैनलों को दिए इंटरव्यू में कुछ लोगों द्वारा ‘गाइड’ करने की बात बार-बार कही है। आख़िर कौन हैं ये गाइड ? ये और कोई नहीं, उन पार्टियों के नेता थे जो डेढ़ महीने पहले तक बाबा राम रहीम गुरमीत सिंह के ज़रिए अपने स्वार्थ साधते थे। उनके प्रगाढ़ रिश्तों का तक़ाज़ा था कि वे इस गाढ़े वक़्त पर मदद करते हनीप्रीत की।

इन नेताओं के लिए सबसे ज़रूरी था कि हनीप्रीत पुलिस के हाथ सीधे ना पड़े। उसकी ‘करुण कथा’ पहले दुनिया सुन ले। बीजेपी के बेहद क़रीब बाबा की इस मुँहबोली बेटी के लिए, कहा जाता है कि कुछ काँग्रेस नेताओं ने अपने रसूख का इस्तेमाल किया। वे काँग्रेस के नेता राजीव शुक्ला के चैनल न्यूज़ 24 पर इंटरव्यू चलवाना चाहते थे, लेकिन फिर लगा कि केवल एक चैनल से बात नहीं बनेगी जो टीआरपी में नीचे है और छींटे काँग्रेस पर पड़ सकते हैं। ऐसे में नंबर 1 ‘आज तक’ को भी इस प्रोजेक्ट में शामिल कर लिया गया। इंटरव्यू का एक टुकड़ा एक अंग्रेज़ी चैनल को भी देने की बात हुई। अपुष्ट जानकारी के मुताबिक यह सब पंजाब पुलिस की निगहबानी में हुआ। हरियाणा पुलिस इंटरव्यू के 15 घंटे बाद हनीप्रीत को पकड़ने का दावा कर रही है, लेकिन पंजाब पुलिस की नज़र में  वह पहले से थी। पंजाब में कांग्रेस सरकार है और उसके नेताओ ंके लिए ऐसा सहयोग पुलिस से पा लेना नामुमकिन भी नहीं लगता।

यानी 2 और 3 अक्टूबर की रात एक नहीं दो चैनलों को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिए गए। यह फ़ैसला हनीप्रीत और उसके ख़ैरख़्वाहों का था। तय हुआ कि दोनों इंटरव्यू सुबह नौ बजे चलेंगे। लेकिन सुबह जैसे ही इस बाबत न्यूज़ 24 का प्रोमो चला, आनन-फानन में आज तक ने पूरा इंटरव्यू प्रसारित कर दिया (8:47 a.m)। ख़ैर ऐसी प्रतिद्वंद्विता असामान्य नहीं है, लेकिन एक्सक्लूसिव का दावा ?

इस प्रकरण ने फिर साबित किया है कि अक्सर चैनलों के भंडाफोड़ और रहस्योद्घाटन के पीछे ‘कोई और’ होता है जो यह सब कराता है। चैनल या समाचार माध्यम जाने-अनजाने कठपुतलियाँ बन जाते हैं। हनीप्रीत को गाइड करने वाले नेताओें ने आज तक और न्यूज़ 24 को एक साथ अपने लिए इस्तेमाल कर लिया। फिर इन चैनलों के विजुअल्स को ‘साभार’ कई दूसरे चैनलों ने भी प्रसारित  किया।

इससे हनीप्रीत का काम किस कदर सधा इसका एक सबूत कानपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार की फेसबुक पोस्ट है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंटरव्यू देखकर ‘उनकी राय हनीप्रीत के बारे में बिलकुल बदल गई।’

आख़िर में दो बात-

पहली ये कि हनीप्रीत के मिलने की कहानी को लेकर न्यूज़ 24 की पैकेजिंग ‘आज तक’ से कहीं बेहतर थी। रहस्य-रोमांच से भरपूर। प्रोड्यूसर को बधाई। दूसरी  कि इस स्टोरी को फॉलो कर रहे बाक़ी चैनलों के रिपोर्टरों को हताश नहीं होना चाहिए। वे कतई पिछड़े नहीं हैं। बस उनका इस बार ‘चुनाव’ नहीं हुआ है। संपादकों को समझना चाहिए कि इस तरह के इंटरव्यू अपने ‘ख़ास लोगों’ या फिर किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिहाज़ से चुनकर दिए जाते हैं। इसमें रिपोर्टर का कोई कमाल नहीं होता है।

 

. बर्बरीक

 



 

1 COMMENT

  1. इस प्रकरण ने फिर साबित किया है कि अक्सर चैनलों के भंडाफोड़ और रहस्योद्घाटन के पीछे ‘कोई और’ होता है जो यह सब कराता है। चैनल या समाचार माध्यम जाने-अनजाने कठपुतलियाँ बन जाते हैं। हनीप्रीत को गाइड करने वाले नेताओें ने आज तक और न्यूज़ 24 को एक साथ अपने लिए इस्तेमाल कर लिया। …………..
    इस स्टोरी को फॉलो कर रहे बाक़ी चैनलों के रिपोर्टरों को हताश नहीं होना चाहिए। वे कतई पिछड़े नहीं हैं। बस उनका इस बार ‘चुनाव’ नहीं हुआ है। संपादकों को समझना चाहिए कि इस तरह के इंटरव्यू अपने ‘ख़ास लोगों’ या फिर किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिहाज़ से चुनकर दिए जाते हैं। इसमें रिपोर्टर का कोई कमाल नहीं होता है।
    ——–
    भाई साहब, यही बात कोई और कहता तो शायद आप उसे कांग्रेसी-भाजपाई कहकर खारिज कर देते. यह बात सिर्फ चैनलों पर ही नहीं, अखबारों पर भी लागू होती है. उन अखबारों पर ज्यादा, जो सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी होने का दावा करते हैं, लेकिन जाने-अनजाने आखिरकार किसी न किसी स्वार्थी तत्व का मोहरा बन रहे होते हैं. इंडियन एक्सप्रेस में ऐसी प्लांटेड खबरें आपको मिल जाएंगी, जिन्हें खोजी पत्रकारिता कहकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन सचाई यह है कि रिपोर्टर तक सारी चीजें पहुंचाई जाती हैं…. और कभी-कभी वह ‘तख्तापलट की कोशिश’ जैसी वाहियात खबरें भी ब्रेक कर देते हैं. एनडीटीवी बिक गया, हालिया उदाहरण है.

LEAVE A REPLY