Home टीवी हुल्लड़बाज़ चैनलों के युग में एक ‘गुफ़्तगू’ की 200 कड़ियाँ !

हुल्लड़बाज़ चैनलों के युग में एक ‘गुफ़्तगू’ की 200 कड़ियाँ !

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मीडिया को लेकर विजिलेंट होने का मतलब सिर्फ ये नहीं है की हम उसकी कमियाँ ही तलाशें। तमाम सीमाओं और टीवी में सिकुड़ते रचनात्मक स्पेस के भीतर भी जो काम अच्छा और ऐतिहासिक महत्त्व का है उसको रेखांकित करना भी हम ज़रूरी समझते हैं।

बीते रविवार राज्य सभा टीवी के सेलिब्रिटी साक्षात्कारों के कार्यक्रम ‘गुफ़्तगू’ ने अपने 200 एपिसोड पूरे कर लिए। यह कार्यक्रम अपनी संकल्पना घोषित करते हुए कहता है “यह प्रोग्राम कला, साहित्य, संस्कृति और सिनेमा सहित जीवन के कोमल पक्षों से जुड़े उन महत्वपूर्ण लोगों के साथ इंटरव्यू की श्रृंखला है जिनके जीवन और कृतित्व से हमारा समय प्रभावित हुआ है।”  इस शो में बिना किसी सनसनी और आक्रामकता के आमंत्रित गेस्ट के साथ उसके जीवन की यात्रा इस तरह ट्रेस की जाती है जो सुदूर गावों, क़स्बों जनपदों में बैठे दर्शकों को प्रेरित कर सके।

टीवी चैनलों के इस हाहाकारी समय में ‘गुफ़्तगू’ जैसा कार्यक्रम देख पाना एक विरल अनुभव है। इसकी एक बड़ी वजह साक्षात्कार लेने वाले इरफ़ान की अपनी शख्सियत और अदाज़ भी है। इरफ़ान न कोई चीख़-पुकार मचाते हैं और न सामने वाले को बेइज़्ज़त करते हैं जो इस दौर की पहचान है, उल्टा वे बड़े प्यार से बात करते हुए इंटरव्यू देने बैठी शख्सियत के दिल में उतर जाते हैं। फिर वो कभी हँसता है तो कभी रुआँसा होता है। लगता है जैसे उसे बातचीत करने की बरसों पुरानी चाह पूरी करने का रास्ता मिल गया है। कोई अपना मिल गया हो। वह दिल खोलकर रख देता है।

guftgoo-gulzarहाल के वर्षों में टीवी एंकरों ने अपने पूर्व निर्धारित एजेंडे के साथ लगातार टोका-टाकी करने वाली शैली अख़्तियार करके टीवी इंटरव्यू फॉरमैट को अरुचिकर और प्रायः घृणास्पद बना डाला है। ऐसे में, टीवी दर्शकों की एक पूरी पीढ़ी जिसने सकारात्मक और सुस्वादु इंटरव्यूज़ नहीं देखे हैं, वह गुफ़्तगू के साथ जुड़ गयी । यहाँ उसे भाषाई शिक्षण और प्रस्तुति की शालीनता के अलावा अतीत की झाँकी और वर्तमान की चिंताओं का एक स्वस्थ खाका मिलता है। पुराने दर्शक इसे ‘क्लासिक दूरदर्शन फ्लेवर’ कहकर खुश होते है तो नए दर्शक भी इसे ‘आतताई एंकरों’ द्वारा खाली की जा चुकी ज़मीन पर विकसित हुआ प्रोग्राम मानते हैं।

निजी चैनेलों से तो उम्मीद ही क्यों करें, लेकिन  पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर्स भी अपनी धरोहर के प्रति लगातार पीठ करके खड़े रहे हैं। नतीजे के तौर पर अलग-अलग विधाओं में डंका बजाने वालों के साथ ढंग की बातचीत का कोई कॉम्प्रिहेंसिव आर्काइव आज ढूंढे नहीं मिलता। इसके लिए जो दृढ़ता और अपनी थाती के लिए सम्मान का भाव होना चाहिए, वह शायद दूरदर्शन जैसे संस्थान में था ही नहीं। ऐसे में गुफ़्तगू एक सुखद आश्चर्य की तरह है जिसने एक ओर पेंटिंग, फ़ोटोग्राफ़ी, संगीत, साहित्य, मूर्तिकला, कार्टूनकला, रंगमंच, रेडियो, अकेडेमिया, एडमिनिस्ट्रेशन, कानून और जैसे विविध विषयों से जुडी नामचीन हस्तियों से दर्शकों को परिचित कराया है तो दूसरी ओर सिनेमा के विविध पक्षों से जुडी सेलिब्रिटीज़ से मिलवाने का क्रम जारी रखे हुए है।

vineetयुवा मीडिया समीक्षक विनीत कुमार कहते हैं कि इस कार्यक्रम को सिर्फ़ सेलीब्रिटी के लिए नहीं देखा जाता बल्कि प्रस्तोता इरफ़ान की हिंदी सुनने के लिए भी देखा जाता है। वे जिस तरह सहज ढंग से भाषा को बरतते हैं, वह क़माल है। एक ख़ासियत यह भी है कि जहाँ निजी चैनलों में इंटरव्यू करने वाला पत्रकार अभिभूत दिखता है, उसे  लगता है कि इंटरव्यू देने वाला कोई अहसान कर रहा है, वहीं इरफ़ान पर किसी के स्टारडम का असर नहीं दिखता। वे बड़ी सहजता से क्रिटिकल सवाल भी पूछते हैं लेकिन इंटरव्यू देने वाले को कभी नहीं लगता कि वह कहीं कठघरे में खड़ा है।

विनीत कुमार एक ख़ास बात की ओर और इशारा करते हैं। उनका कहना है कि गुफ़्तगू ने सेलिब्रिटीज़ का इंटरव्यू ही नहीं किया, बल्कि अपने इंटरव्यू के ज़रिये तमाम ऐसे लोगों को सेलिब्रिटी का दर्जा भी दिलाया जो पहले सिर्फ़ अपनी विधा के परिसर में पहचाने जाते थे। अगर इरफ़ान टॉम आल्टर और तिग्मांशु धूलिया से बात करते हैं तो उसी सम्मान के साथ कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी और फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज से भी मिलवाते हैं। उनके चयन का आधार हुनरमंद होना और अपने क्षेत्र में योगदान देना होता है न कि विवाद। जबकि निजी चैनलों में सप्ताह से जुड़े विवाद या फिर फ़िल्म रिलीज़ को ध्यान में रखते हुए इंटरव्यू का पात्र तय किया जाता है।

बहरहाल, अपने दो सौ एपिसोड पूरे करने के साथ ही गुफ़्तगू देश का सबसे लंबा चलने वाला ऐसा इंटरव्यू शो बन गया है जो पिछले पांच वर्षों से नेशनल टीवी पर हर सप्ताह दिखाया जा रहा है। टीवी पर प्रसारण के साथ ही इसे इसके दर्शक यूट्यूब की लाइव स्ट्रीमिंग के ज़रिये विदेश में भी बड़ी संख्या में देखते हैं। अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा में बसे गुफ़्तगू प्रशंसकों की सोशल मीडिया पर आने वाली टिप्पणियाँ इसकी गवाह हैं।  फ्रांस में हिन्दी पढ़ रहे छात्रों के बीच भी यह काफ़ी लोकप्रिय है।

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गुफ़्तगू कई मिथ भी तोड़ता है। यूट्यूब पर इस शो के हिट्स देखने से पता चलता है कि दर्शक सिर्फ बड़े फ़िल्मी सितारों के बारे में ही नहीं जानना चाहते बल्कि भूले बिसरे कलाकारों का भी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।  उदाहरण के लिए इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अभिनेत्री निम्मी की गुफ़्तगू 4,05242, जया बच्चन 2,81562, वहीदा रहमान 2,56706  और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को 2,45206 हिट्स दिखाई दे रहे हैं।

यूट्यूब पर गुफ़्तगू के सभी एपिसोड्स यहाँ देखे जा सकते  हैं https://www.youtube.com/user/rajyasabhatv/videos?view=0&shelf_id=18&sort=p

शो के होस्ट इरफ़ान से facebook.com/irfan.sm पर संपर्क किया जा सकता है।

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