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डोकलाम पर चीनी ‘संप्रभुता’ ! सेना भारत की हटी ! लेकिन ‘हर-हर मोदी’ में जुट गए चैनल !

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प्रियभांशु रंजन

भारत और चीन की सरकारों की ओर से सोमवार को जारी किए गए बयानों की मानें तो बीते जून महीने से जारी डोकलाम गतिरोध सुलझ गया है और सीमा पर तनाव कम हुआ है ।

दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों की ओर से बयान जारी करने के कुछ ही मिनटों बाद भारत के कुछ अति-उत्साही और सत्ता की चरणवंदना में जुटे न्यूज चैनलों ने इसे ‘‘मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत’’ करार देना शुरू कर दिया।

अगर ये भारत की जीत होती तो देश का हर नागरिक वाकई खुश होता। लेकिन खबरिया चैनल इसे मोदी की कूटनीतिक जीत साबित करने की इतनी जल्दबाजी में थे कि उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय का बयान सुनकर सिर्फ अपने कानों को पसंद आने वाला मतलब निकाल लिया और चीन विदेश मंत्रालय के बयान का विश्लेषण करना जरूरी नहीं समझा । एंकरों ने तो किसी आम खबर की तरह चीन का बयान दो लाइन में पढ़ दिया।

चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “India will withdraw personnel and equipment that crossed the line to the India side and China will continue its sovereignty rights in accordance with the historical border agreement”.

हिंदी में इसका मतलब ये है, ‘‘भारत अपने उन सैनिकों और उपकरणों को वापस अपने क्षेत्र में ले जा रहा है जिन्होंने सीमा रेखा पार की थी, चीन ऐतिहासिक सीमा संधि के अनुरूप अपने संप्रभु अधिकारों का इस्तेमाल करता रहेगा।’

चीन के विदेश मंत्रालय के बयान पर गौर करें तो इसमें कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि चीन डोकलाम से अपनी सेना हटा रहा है। इसमें सिर्फ भारत की ओर से सेना हटाने की बात साफ-साफ कही गई है।

चीन ने ये भी साफ नहीं किया कि उसकी सेना डोकलाम में आने वाले दिनों में सड़क बनाएगी कि नहीं। और तो और, चीन डोकलाम पर अपने संप्रभु अधिकारों के इस्तेमाल की बात कर रहा है, यानी वह हमेशा की तरफ एक बार फिर डोकलाम को अपना इलाका बता रहा है ।

जब चीन अपनी सेना हटाने की बात कर ही नहीं रहा, जब ये साफ कर ही नहीं रहा कि वह डोकलाम में सड़क बनाएगा कि नहीं बनाएगा तो ये मोदी सरकार की कैसी कूटनीतिक जीत है?

इस बीच, चीन की सरकारी समाचार एजेंसी ‘शिन्हुआ’ ने एक कमेंट्री में साफ लिखा है –

‘‘India pulled back personnel and equipment from Dong Lang (Doklam) region on Monday afternoon, ending a two-month military stand-off triggered by India’s illegal incursion.
It is the correct choice of India to return to abiding by international law.
The Doklam area is undisputed Chinese territory with a clear history and legal basis. The Indian military trespass grossly encroached on China’s territorial sovereignty, and trampled on the fundamental principles of international law and basic norms governing international relations.
Over the past days, China has demonstrated its determination to safeguard its territorial sovereignty and legitimate rights. Chinese troops have also taken countermeasures.
The Chinese side has exercised the utmost restraint, communicated with the Indian side through diplomatic channels, and shown maximum sincerity in resolving the dispute via peaceful means.
There is no room for the slightest ambiguity regarding historical issues that concern the principle of right and wrong.
For China and India, close neighbors and the world’s two largest emerging economies, their common interests far outweigh their disputes. China has been building friendly ties with India, and safeguarding the overall interest of bilateral ties, on a basis of respect for each other’s territorial sovereignty.
As India’s gambit comes to an end, China will continue to patrol the Doklam area and safeguard territorial integrity, as approved by border agreements.’’

‘शिन्हुआ’ चीन की सरकारी समाचार एजेंसी है, इसलिए उसे गंभीरता से लेना ज्यादा जरूरी हो जाता है। ‘शिन्हुआ’ की कमेंट्री में कुछ बातें साफ-साफ सामने आ रही हैं, मसलन – (1) भारत ने डोकलाम से अपनी सेना हटाई (2) भारत ने अवैध अतिक्रमण किया था (3) डोकलाम बगैर किसी विवाद के चीन का क्षेत्र है (4) चीन की सेना डोकलाम में गश्त जारी रखेगी और अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करेगी।

जब सब कुछ चीन के अनुकूल ही है तो फिर कोई बताएगा कि ये मोदी सरकार की कैसी कूटनीतिक जीत है?

कुछ लोगों को शिकायत हो सकती है कि चीन के विदेश मंत्रालय और उसकी मीडिया पर तो यकीन किया जा रहा है, लेकिन भारत सरकार के बयान पर नहीं । तो ठीक है, उसका भी विश्लेषण कर लेते हैं ।

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा – “In recent weeks, India and China have maintained diplomatic communication in respect of the incident at Doklam. During these communications, we were able to express our views and convey our concerns and interests. On this basis, expeditious disengagement of border personnel at the face-off site at Doklam has been agreed to and is on-going”.

यानी भारत ने अपने बयान में कहा – “पिछले कुछ हफ्तों से भारत और चीन डोकलाम की घटना के बारे में कूटनयिक स्तर पर संवाद बनाए हुए थे। इन संवादों के दौरान हम अपने विचार, चिंताएँ और हितों की बात संप्रेषित कर सके। इसी आधार पर सीमा पर तैनात सैनिकों को डोकलाम से तेज़ी से पीछे हटाने पर रज़ामंदी हुई और ये काम चल रहा है।”

भारत के बयान को पढ़कर मन में सबसे पहला सवाल यह पैदा होता है कि जैसे चीन ने साफ-साफ शब्दों में भारत की ओर से अपनी सेना हटाने के बारे में लिखा है, वैसे भारत ने अपने बयान मेें साफ-साफ क्यों नहीं लिखा कि चीन भी अपनी सेना हटा रहा है? इस तरह की ज्यादातर खबरें ‘सूत्रों’ के हवाले से क्यों आ रही हैं कि चीन ने अपनी सेना हटा ली, चीनी सेना अपने बुलडोजर भी वापस ले गई, वगैरह-वगैरह।

बहरहाल, मेरी राय है कि चीन ने डाेकलाम पर फिलहाल अपना रुख भले ही नरम कर लिया हो। लेकिन इसे स्थायी कूटनीतिक सफलता मानना एक भूल होगी।

गौरतलब है कि चीन के One Belt One Road (OBOR) परियोजना की एक बैठक में भारत के हिस्सा नहीं लेने से चीन को बड़ा झटका लगा था। ऐसे में यदि तीन से पांच सितंबर तक आयोजित होने जा रहे BRICS शिखर सम्मेलन में भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिरकत नहीं करते तो ये चीन के लिए शर्मिंदगी का सबब बन जाता, क्योंकि BRICS की स्थापना ही अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिमी देशों के प्रभाव को कम करने के लिए हुई थी।

चीन ये कभी नहीं चाहेगा कि BRICS से भारत जैसा साझेदार छिटक जाए, क्योंकि ऐसा होना चीन की नेतृत्व क्षमता पर सीधा सवाल खड़े करेगा। मैंने ‘नेतृत्व क्षमता’ शब्द का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि चीन की धारणा है कि वह BRICS की अगुवाई कर रहा है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि BRICS शिखर सम्मेलन में मोदी की शिरकत की खातिर चीन ने भले ही डोकलाम मुद्दे पर थोड़ी नरमी दिखाई हो, लेकिन मोदी सरकार की असल परीक्षा ये होगी कि चीन भारत से लगी सीमा के हर हिस्से में शांत एवं शालीन व्यवहार करे और आक्रामकता कम दिखाए। डोकलाम पर यथास्थिति कितने दिनों तक बनी रहती है, ये देखना भी दिलचस्प होगा।



प्रियभांशु रंजन

लेखक पीटीआई से जुड़े युवा पत्रकार हैं।



 

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