Home टीवी पत्रकार पूजा के क़ातिलों में ज़ी समूह का नाम क्यों नहीं ?

पत्रकार पूजा के क़ातिलों में ज़ी समूह का नाम क्यों नहीं ?

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ज़ी मीडिया समूह की पूर्व पत्रकार पूजा तिवारी की मौत का मसला महज़ किसी अपराध कथा में सिमटने वाला नहीं है। पुलिस का दावा है कि इतवार और सोमवार की दरम्यानी रात डेढ़ बजे फ़रीदाबाद के सदभावना अपार्टमेंट की पांचवीं मंज़िल से कूद कर पूजा ने ख़ुदकुशी की। वजह के नाम पर तमाम अजब-गज़ब ‘रसीली’ कहानियाँ पेश की जा रही हैं। लेकिन एक बात जिसका ज़िक्र दूर-दूर तक नहीं है, वह है कॉरपोरेट पत्रकारिता की बेरहमी जो नवेले पत्रकारों की ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत साल चूस कर फेंक देती  है और कई बार  पहचानने से भी इंकार कर देती है। पूजा उसी बेरहमी का शिकार हुई है।

ज़ी समूह को अपने न्यूज़ चैनल में ऐसे संपादकों को रखने में कोई हिचक नहीं जो उगाही के मामले में जेल जा चुके हैं, लेकिन उसी के एक उपक्रम ‘डीएनए’ की पत्रकार रही पूजा का करियर इसलिए बरबाद हो गया क्योंकि उसकी ख़बर से नाराज़ एक डॉक्टर ने उस पर वसूली का आरोप लगा दिया।

पलिस ने दावा किया है कि फरीदाबाद में एक डॉक्टर दंपति से 2 लाख रुपए की फिरौती और ब्लैकमेलिंग में नाम आने की वजह से पूजा तनाव में थीं। इस जानलेवा कदम के पीछे यही वजह है। लेकिन पूजा से जुड़ी तमाम जानकारी सामने आने के बाद ऐसा मान लेना मामले से पल्ला झाड़ना होगा। पूजा बेशक अवसाद में थीं लेकिन एफआईआर से ज़्यादा समाज के दोहरे रवैये से। वह अपनी लड़ाई में अकेली थीं। अपनी कंपनी ज़ी मीडिया से लेकर फरीदाबाद के स्थानीय पत्रकारों तक से उसने मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई आगे नहीं आया।

इस मौत के बाद पूजा का एक पुराना मेल सामने आया है। इससे पता चलता है कि वो फरीदाबाद प्रेस क्लब समेत अपने सभी जानने वालों से मदद मांग रही थीं लेकिन कोई साथ न आया। स्थानीय पत्रकारों ने उनकी मदद करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हद तो यह है कि जिस संस्थान में वह काम करती थीं, फरीदाबाद पुलिस की एक नोटिस के जवाब में उसने पूजा को अपना पत्रकार ही मानने से इनकार कर दिया था। पूजा सभी के रवैये से हैरान थीं। मेल में पूजा ने लिखा है कि इस स्टिंग की जानकारी डीएनए को थी। वहाँ से अप्रूवल के बाद ही स्टोरी पर काम किया। डीएनए ने उन्हें आरोपी डॉक्टर का वर्जन लेने के लिए कहा। इसके बाद स्टोरी चलाई भी,  लेकिन आरोपी डॉक्टरों ने जब उनके खिलाफ मुकदमा किया तो संस्थान ने पल्ला झाड़ लिया।

सवाल यह है कि क्या महज़ आरोप लगने पर किसी संस्थान को अपने पत्रकार को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए? क्या तफ्तीश के दौरान संस्थान सिर्फ इतना कहकर ख़ुद को किनारे कर सकता है कि पूजा तिवारी अब हमारी मुलाज़िम ही नहीं हैं। क्या संस्थान एक आंतरिक जांच शुरु करके और उसके पूरा होने तक पूजा को अपने साथ बनाए नहीं रख सकता था? कम से कम इससे उस युवा पत्रकार के भीतर एक मामूली भरोसा तो ज़रूर पैदा होता।

हमें क्यों नहीं शक करना चाहिए कि डॉक्टर दंपति ने अपने खिलाफ ख़बर छपने के बाद, पत्रकार को सबक सिखाने के इरादे से एफआईआर दर्ज कराई ? डॉक्टर दंपति के पास रुपया, ताक़त और रसूख समेत वो सबकुछ है जिसके सहारे वो हवा का रुख़ किसी भी तरफ मोड़ देने की कुव्वत रखते हैं। डॉक्टर गोयल इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुखिया रह चुके हैं और अपनी तहरीर थाने लेकर जाने की बजाय सीधे फरीदाबाद के सीपी हनीफ़ कुरैशी के पास पहुंचे थे। दूसरी तरफ पूजा तिवारी अकेली थी।  करियर बनाने के लिए इंदौर से दिल्ली आई थी और बिना रीढ़ वाली हिंदी पत्रकारिता की दुनिया की हिस्सा थी। बावजूद इसके पूजा लड़ रही थीं। विवाद से पल्ला झाड़ने के नाते संस्थान से और एफआईआर दर्ज होने के नाते पुलिस और डॉक्टर दंपति के के ख़िलाफ़ वह लड़ रही थी। पूजा की इस लड़ाई में सिवाय अमरीन ख़ान के और कोई दोस्त भी शामिल नहीं दिखा। अमीरन ही  उसका दुख-दर्द बाँटती थी। लगातार गुहार के बावजूद संस्थान और पत्रकार बिरादरी ने पूजा की तरफ़ मुड़ कर नहीं देखा।

पूजा नौ साल से पत्रकारिता कर रही थीं। पांच-छह साल से दिल्ली में रह रही थी।  एफआईआर में नाम आने और कार्रवाई पर बदनामी के डर से उसने ख़ुदकुशी कर ली, ये भेड़चाल वाली समझ है। बुनियादी तौर पर वो अपने आसपास के दोस्त, पत्रकार बिरादरी और संस्थान के चौंकाने वाले रुख़ से परेशान थी। हद तो यह है कि जिस ज़ी समूह के संपादकों को करोड़ों की उगाही करते पूरी दुनिया ने देखा, वे आज भी अपने पद पर बने हुए हैं। जबकि पूजा पर ब्लैकमेलिंग का आरोप ऐसी खबर को लेकर लगा जो बाकयदा संपादकीय एजेंड में थी, फिर भी उसे पहले संस्थान और फिर दुनिया छोड़ देनी पड़ी।

तमाम चैनल इस समय पूजा की कहानी को तरजीह दे रहे हैं। उन्होंने इस कहानी में पैबस्त ‘सनसनी’ सूँघ ली है।  पूजा का एक करीबी पुलिसवाला गिरफ्तार भी हो चुका है। युवाओं में घर करते अवसाद को लेकर तमाम किस्से सुने-सुनाये जा रहे हैं। लेकिन पूजा की कहानी एक पत्रकार की बरबादी की दास्तान कैसे बनी, इस पहलू पर बात करने को कोई तैयार नहीं है।

अभी यह कहना मुश्किल है कि पूजा की मौत हत्या है या खुदकुशी, लेकिन ज़ी समूह का दामन पूजा के ख़ून से रँगा है, इसमें कोई शक नहीं ! अफ़सोस कि हम ऐसे दौर में हैं जब किसी पत्रकार के साथ हुआ यह सलूक किसी एफआईआर में दर्ज नहीं होता !