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चार जजों के ‘सुप्रीम विद्रोह’ का दिन बनाम चैनलों की वफ़ादारी की रात !

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मशहूर टीवी पत्रकार रवीश कुमार आजकल छुट्टी पर हैं। छँटनी की पृष्ठभूमि में उनका परदे पर न दिखना तमाम आशंकाओं को जन्म दे रहा है, लोग कह रहे हैं कि जिस जस्टिस लोया की मौत के मामले को टीवी पर अकेले रवीश कुमार उठा रहे थे, वह अब सुप्रीम कोर्ट के चार विद्रोही जजों की चिंता से जुड़ गया है तो रवीश बोल क्यों नहीं रहे हैं। बहरहाल, हक़ीक़त यही है कि वे छुट्टी पर हैं। वैसे भी साल में एक-आध बार छुट्टी नहीं लेगा तो कोई पत्रकार इंसान भी कैसे रह पाएगा ! हालाँकि यह भी सच है कि कोई पत्रकार पूरी तरह छुट्टी पर नहीं रह सकता। इसलिए कल रात उन्होंने जब चैनलों पर चार जजों के विद्रोह की ख़बर देखी तो बहुत देर तक देख नहीं सके और यह टिप्पणी अपनी फ़ेसबुक दीवार पर चिपका दी, जिसे हम यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं–संपादक

 

आज चैनलों की वफ़ादारी की रात है !

 

आज अगर आप न्यूज़ चैनल देख रहे हैं तो ग़ौर से देखिए। चैनलों के स्क्रीन पर क्या लिखा है और एंकर क्या बोल रहे हैं। जजों ने देश सेवा की इसके बाद भी ये मीडिया सरकार की सेवा कर रहा है। आप मीडिया की भाषा पर ग़ौर करेंगे तो सारा खेल समझ आ जाएगा।

जज लोया की मौत पर आपने इन एंकरों को चर्चा करते देखा था जब कैरवान ने स्टोरी ब्रेक की थी? जज लोया की सुनवाई के मामले ने इस प्रेस कांफ्रेंस को प्रेरित किया मगर क्या कोई एंकर जज लोया की मौत के मामले का नाम ले रह है? एक जज की मौत पर सवाल उठे हैं क्या आप इस पर मीडिया की तब भी और आज की चुप्पी को सही मानेंगे ?

कोई प्रमुखता से नहीं बता रहा है कि चार जजों ने चिट्ठी में क्या लिखा है? न तो उनका बिंदुवार ज़िक्र है और न उस पर चर्चा। जज लोया की मौत का ज़िक्र भी नहीं हो रहा है। एंकर सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस का ज़िक्र कर रहा है। कांफ्रेंस में क्या बोला गया है इसका न तो ज़िक्र है और न ही प्रमुखता से चर्चा।

अब इसकी जगह मीडिया एक काम कर रहा है। इमेज पर इमेज रख रहा है। जैसे बिस्तर पर चादर के ऊपर एक मोटी चादर बिछा दी जाती है। मैं इसे इमेज शिफ़्टिंग कहता हूँ। आप देख तो रहे हैं जजों के प्रेस कांफ्रेंस की स्टोरी मगर जजों के सवाल की जगह आप वाया एंकर सत्ता की चालाकी के सवाल देख रहे होते हैं । मीडिया ने जजों की चिट्ठी पर अपनी तरफ से चादर डाल दिया है। कल सुबह अख़बार भी देख लीजिएगा।

यह काम करना बहुत आसान है। दूसरे तीसरे सवालों से जजों के उठाए सवाल पर पर्दा डाल दो। कुछ सीपीआई नेता और सांसद डी राजा ने भी सरकार का क़र्ज़ उतार दिया। वहाँ जाकर मिले और संदिग्ध बना दिया। वाक़ई डी राजा की कहानी को दोनों तरफ से देखने की ज़रूरत है। चैनल अगर इसे राजा के बहाने साज़िश बता रहे हैं तो उसी के साथ देखा जाना चाहिए कि राजा ने इमेज शिफ़्टिंग कराने में अपनी क़ुर्बानी तो नहीं दी। सत्ता के खेल में यह सब बारीकी होती है।

दूसरा इसी बहाने एंकर कांग्रेस के राजनीतिक लाभ लेने पर जजों की चिट्ठी पर ज़्यादा ज़ोर दे रहे हैं। तो अब आप चैनल पर देख रहे हैं जजों के प्रेस कांफ्रेंस की स्टोरी मगर दिखाई दे रहे हैं राजा, कांग्रेस। जो नहीं दिख रहा है वो जजों की चिट्ठी का मजमून, जज लोया की मौत का सवाल, ख़ास तरीके से बेंच के गठन के आरोप और प्रेस कांफ्रेंस ।

कम से कम ठीक से बात तो बताई जाती। चर्चा तो होती। अगर निर्णय नहीं देना है तो वो भी ठीक है लेकिन दूसरी तरफ झुक कर भी निर्णय नहीं देना चाहिए। मैंने आधे घंटे टीवी देखकर बंद कर दिया। टीवी का खेल कुछ ज़्यादा समझने लगा हूँ । काश कम समझता। शांति रहती।

 



 

3 COMMENTS

  1. Black and white day ? What’s that? From more than last 30 years hundreds of high court judges and scores of sc judges are living in heaven. Except their lip service they did nothing concrete as far as contract act and equal renumeration act implementation in public and private sector is concerned. Same for other labour laws. Even they could have taken suomotu cognizance. Even an advocate of the stature of Prashant bhusan knows that what happens to fate of “Labour law violation PIL”. Is this a socialist state promised by our constituent assembly?

  2. Judiciary as we say in revolutionary materialstic parlance is just one of so many superstructures of economy. Accordingly we have witnessed things like this. It doesn’t suit to this or that individual or parties but determining thing is what effect it has on domestic and imperialist capital. Since government of the day is singing HMV ( his masters voice ) ALL POWERFUL capital will protect them at every cost.

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