Home कर्नाटक चुनाव 2018 कर्नाटक में ‘सुपारी मीडिया’ के बीच, कैसी ट्रैजडी है नीच!

कर्नाटक में ‘सुपारी मीडिया’ के बीच, कैसी ट्रैजडी है नीच!

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कुछ दिन पहले वरिष्ट पत्रकार हरिशंकर व्यास ने मोदी सरकार के सामने दंडवत हो चुके मीडिया का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि ‘मीडिया की मोदी भक्ति में नंगई और नीचता का एक पैटर्न है!’ ज़ाहिर है, ऐसी तीखी टिप्पणी पर बहुत से किंतु-परंतु किए जा रहे थे, लेकिन कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद मीडिया के बड़े हिस्से की रिपोर्टिंग से लेकर विश्लेषण तक ने साबित किया कि व्यास जी की बात में कुछ ज़्यादा ही दम है।

कर्नाटक चुनाव प्रचार शुरू होते ही मीडिया मोदी के अजेय होने का मिथ गढ़ने में जुट गया था। कर्नाटक में कांग्रेस का लिंगायत कार्ड का बैकफ़ायर करना और इसकी प्रतिक्रिया में विराट हिंदू एकजुटता का नगाड़ा बजाने लगा था। इस शोर में पूर्व लोकायुकत जस्टिस संतोष हेगड़े का यह आश्चर्यमिश्रित सवाल दबा दिया गया कि आख़िर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ताल ठोंकने वाली बीजेपी भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने वाले येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कैसे बना सकती है? येदियुरप्पा के भ्रष्टाचार की जाँच बतौर लोकायुक्त जस्टिस हेगड़े ने ही की थी।

बहरहाल, ‘मोदीमय’ कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह बीजेपी के पक्ष में बैटिंग नहीं करेगा, लेकिन इस उत्साह में वह नैतिक मान्यताओं ही नहीं, क़ानून की भी परवाह न करे, यह हैरान करने वाला था। और इससे भी ज़्यादा परेशानी की बात यह कि वह ‘फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट’ आधारित संसदीय व्यवस्था के बुनियादी पाठ भी भूल गया।

15 मई को कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए और बीजेपी की बढ़त देखते ही मीडिया मोदी-शाह की जोड़ी की दुंदभी बजाने में जुट गया। झटका तब लगा जब बीजेपी 104 पर सिमट गई, लेकिन वह बीजेपी प्रवक्ताओं की तरह ही बहुमत जुटा लेने को लेकर आश्वस्त था। उसके निशाने पर कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन था जो ‘अनैतिक और अवसरवादी’ था। इसके ख़िलाफ़ बीजेपी का दूसरी पार्टियो से विधायक तोड़ लेने में उसे कुछ भी ग़लत नहीं लग रहा था।

अगले दो-तीन दिन बैंगलुरु से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक फैले हाईप्रोफ़ाइल राजनीतिक ड्रामे के बीच मीडिया का पक्ष बहुत स्पष्ट था। उसे हर हाल में बीजेपी की जीत चाहिए थी। तमाम ऐंकर लिहाज के भाषाई पर्दे को भी नोंचकर फेंक चुके थे। बीजेपी के पक्ष में पलड़ा झुकते देख वे ‘अच्छी ख़बर’ और कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में जाने वाली बातों को ‘बुरी ख़बर’ की तरह पेश कर रहे थे। मीडिया ने यह सवाल पूछने की जहमत नहीं उठाई कि बीजेपी रिश्वत के ज़रिए विधायकों को तोड़ने का ‘क़ानूनन अपराध’ करने की कोशिश क्यों कर रही है। इस सिलसिले में सामने आई ख़रीद-फ़रोख़्त की ऑडियो रिकॉर्डिंग उसके लिए महज़ काँग्रेस का आरोप थीं। चैनलों पर लगातार उन संभावनाओं के ग्राफ़िक्स दिखाए जा रहे थे जिनसे येदियुरप्पा की सरकार बच सकती थी। तमाम ऐंकर कूद-कूद कर बता रहे थे कि कितने विधायक शक्ति परीक्षण में शामिल न हों तो बीजेपी का 104 का आँकड़ा ही बहुमत बन जाएगा। कोई भूलकर भी अपनी ज़बान पर यह बात नहीं ला रहा था कि पार्टी तोड़ने के लिए दो तिहाई विधायकों के समर्थन की ज़रूरत होगी। पाँच-छह विधायकों का व्हिप के ख़िलाफ़ जाकर वोट करने  से उनकी सदस्यता चली जाएगी।

यही नहीं, मीडिया काँग्रेस और जेडीएस के ‘लिंगायत विधायकों’ के टूटने की संभावना से उत्साहित भी था जो उसकी निगाह में येदियुरप्पा जैसे लिंगायत नेता की प्रतिष्ठा  बचाने के लिए कुछ भी कर सकते थे। ( कल्पना कीजिए कि अगर यूपी या बिहार में यादव विधायकों के अपनी पार्टी छोड़ लालू या मुलायम के साथ जाने की सुरसुराहट भी हो तो मीडिया ‘जातिवाद के नंगे नाच’ से किस तरह स्क्रीन भर देगा। लेकिन लिंगायत विधायकों का एकजुट होना, उसके लिए विकास का आहुति थी।)

 

बीजेपी के मिशन 2019 के लिए रोज़ाना चीख़-पुकार करने वाले रिपब्लिक टीवी पर अर्णव गोस्वामी ने इस बीच कांग्रेस और जेडीएस विधायकों को रिसार्ट पर रखने या उन्हें टूटने से बचाने के लिए की जा रही कोशिशों को ‘होस्टेज (बंधक) ड्रामा’ क़रार दिया जो कर्नाटक की जनता का ‘अपमान’ था। एक बार भी गोस्वामी जी के मुखारबिंद से यह प्रश्न नहीं फूटा कि बीजेपी इन विधायकों को ख़रीदने की कोशिश कर रही है जो क़ानूनन अपराध है। 19 मई को तो हद हो गया। गोस्वामी जी ने  ऐलान किया- ‘हमें बहुमत साबित करने के लिए अब सिर्फ़ छह विधायकों की ज़रूरत रह गई है।’

 

 

ज़ाहिर है, तमाम ऐंकर अब तक बीजेपी और ख़ुद में फ़र्क भूल चुके थे। एबीपी का हाल भी हैरान करने वाला था। यहाँ भी बीजेपी के जीत को संभव बनाने वाले ग्राफ़िक्स के सहारे ट्वेंटी-ट्वेंटी खेला जा रहा था। चैनल के तमाम रिपोर्टर ‘चप्पे-चप्पे पर तैनात’ थे। बहुमत परीक्षण के क़रीब एक घंटे पहले उसने ख़बर ब्रेक की कि बीजेपी के लिए बहुमत का इतज़ाम हो गया है। अब एबीपी के पर्दे पर बीजेपी ‘बहुमत’ और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ‘अल्पमत’ में दिख रहा था। चैनल की वाचाल ऐंकर कूद-कूद कर विशेषज्ञों से ज्ञान ले रही थी जो अमित शाह के ‘चाणक्य’ होने की मुनादी कर रहे थे। (ऊपर की मुख्य तस्वीर में देखिए।)

 

 

लेकिन जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो मीडिया हिस्टीरिया का शिकार हो गया। चार दिन की कोशिशों और मोदी-अमित शाह की अजेयता के मिथक के साथ तमाम नामी ऐंकरों का गुरूर भी जैसे टूट रहा था। आज तक पर अंजना ओम कश्यप ने सूचना दी कि एक ‘बुरी ख़बर’ आ रही है, येदियुरप्पा ने इस्तीफ़ा दे दिया है। वहीं एबीपी ने बताया कि जो कर्नाटक जीतता है, वह लोकसभा चुनाव हार जाता है। इतनी बड़ी ‘जानकारी’ उसने अब तक छिपा के रखी थी।

 

 

तो नया दावा ये था कि येदियुरप्पा ने इस्तीफ़ा देकर दरअसल ‘मास्टर स्ट्रोक’ मारा है। अब सहानुभूति की लहर पर सवार होकर लोकसभा चुनाव में वे भारी जीत हासिल करेंगे। एक वोट से सरकार खोते समय अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण दिखाया गया और येदियुरप्पा से उनकी तुलना की गई। (भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट आए येदियुरप्पा से वाजपेयी की तुलना में बीजेपी नेता भी पीछे नहीं थे, आश्चर्य) हालाँकि कुछ दिन पहले यह ख़बरें भी छप चुकी हैं कि अगर कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस मिलकर लड़े तो बीजेपी की हाथ ज़्यादा से ज़्यादा छह सीटें आएंगी। लेकिन कर्नाटक की हार पर मिशन 2019 का रंग डाला जाने लगा।

हद तो ये है कि बीजेपी की हार के साथ ही संसदीय व्यवस्था का मज़ाक उड़ाया जाने लगा जिसमें सीटों के लिहज़ से नंबर एक पार्टी की सरकार नहीं बनती बल्कि चुनाव बाद होने वाले गठजोड़ों की सरकार बन जाती है। (गोवा, मणिपुर और मेघालय के समय मीडिया ने इस बुद्धि पर ताला लगाकर चाबी फेंक दी थी।)

एबीपी ने मज़ाक उड़ाने के लिए किसी दक्षिण भारतीय फ़िल्म का एक टुकड़ा दिखाया जिसमें कम नंबर पाने वाले तीन बच्चे अपने नंबर जोड़कर क्लास में फ़र्स्ट आने वाले बच्चे को पीछे कर देते हैं। वहीं प्रमोद महाजन का लोकसभा में दिया गया, इस सिलसिले में एक भाषण भी दिखाया गया जिसमें बीजेपी के नंबर एक होने के बावजूद विपक्ष में होने की बात को लेकर लोकतंत्र की विडंबना का बयान चीन के प्रतिनिधियों से किया जा रहा था।

ऐसे मे सवाल उठता है कि क्या एबीपी के संपादक भारत में अपनाई गई संसदीय व्यवस्था के बुनियादी नियम भूल गए हैं। क्या वे भूल गए हैं कि सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ा दल होना नहीं, बहुमत जुटाना ज़रूरी होता है। यही संविधानसम्मत व्यवस्था है और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अगर इस व्यवस्था में खामी है तो फिर प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए जिसमें वोट प्रतिशत के हिसाब से सीटें तय होती हैं।

लेकिन टीवी संपादकों को इसमे रुचि नहीं थी। वोट के लिहाज़ से  कर्नाटक में कांग्रेस सबसे बड़ा दल है जिस पर वे बात भी नहीं करना चाहते थे क्योंकि उनकी निगाह में ‘मैंडेट बीजेपी को मिला’, जिसे कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर लूट लिया। हद तो तब हो गई जब एबीपी ने बौखलाहट में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए  ‘तेरे को राहुल’ जैसी भाषा लिखनी शुरू कर दी..

 

 

यह मानना मुश्क्लि है कि मीडिया को पत्रकारिता के या संसदीय व्यवस्था के बुनियादी सिद्दांतों की जानकारी नहीं है। फिर ऐसी बेशर्मी दिखाने  का मतलब क्या है?  आख़िर किस दबाव में तमाम ऐंकर और संपादक वह लाइन पार कर गए हैं जहाँ विवेक और न्याय साथ छोड़ देते हैं,  जिसके लिए मुक्तिबोध लिख गए हैं—

पिस गया वह भीतरी/और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच/ऐसी ट्रैजडी है नीच !

 

नोट— इस लेख में वर्णित ‘मीडिया’ का मतलब वह परिदृश्य है जो 24 घंटे में 20-22 घंटे नज़र आता है। बाक़ी एक दो घंटे क़ायदे की बात भी होती ही है। आख़िर रवीश कुमार और पुण्य प्रसून वाजपेयी भी यही हैं जो विवेक का झंडा बुलंद करते हैं। ये अपवाद नियम की पुष्टि करते हैं।

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