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कॉरपोरेट संपादक का नया अवतार: खरीदा हुआ इंटरव्‍यू और भाड़े पर ब्रांडेड चश्‍मा

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(मैन्‍स वर्ल्‍ड पुरुषों की मशहूर लाइफस्‍टाइल पत्रिका है। इसके 10 अप्रैल के अंक में अर्नब गोस्‍वामी का साक्षात्‍कार फोटो शूट के साथ प्रकाशित है जिसकी तस्‍वीरों में वे ब्रूक्‍स ब्रदर्स के जैकेट और ट्राउज़र, थॉमस पिंक की शर्ट और टाइ, शेज़े की घड़ी और कफलिंक व गुच्‍ची का चश्‍मा पहने नज़र आते हैं। इस इंटरव्‍यू के लिए अर्नब की पीआर टीम ने पत्रिका को अप्रोच किया था। पत्रिका ने जो सवाल पूछे, वे भी पीआर टीम के बनाए हुए थे। भारतीय पत्रकारिता में एक टीवी चैनल के लॉन्‍च होने से पहले उसके संपादक और मुख्‍य चेहरे की ऐसी ब्रांडिंग आज तक इससे पहले कभी नहीं हुई। यह कॉरपोरेट संपादक का नया अवतार है जहां शर्म, हया, मर्यादा और शुचिता घास खोदने चले गए हैं। पत्रिका ने साक्षात्‍कार का जो इंट्रो लिखा है, वह अपने आप में बताने के लिए पर्याप्‍त है कि भविष्‍य का टीवी समाचार चैनल और उसका संपादक कैसा होगा। इंट्रो का अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है। पूरा साक्षात्‍कार आप यहां पढ़ सकते हैं – संपादक)

 

अर्नब गोस्‍वामी का नया समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी जो इस महीने के अंत में लॉन्‍च होने वाला है, प्रसारण से पहले ही झंझट में फंस गया। सुब्रमण्‍यन स्‍वामी ने शिकायत दर्ज करवायी कि इसका नाम रिपब्लिक एम्‍बलम और नाम से जुड़े कानून का उल्‍लंघन करता है। उसके बाद इसका नाम बदलकर रिपब्लिक टीवी कर दिया गया। इसके अलावा एक कानूनी जंग भी दि वायर नामक समाचार वेबसाइट पर छपे एक लेख को लेकर जारी है जिसका शीर्षक था ”अर्नब्स रिपब्लिक, मोदीज़ आइडियोलॉजी”। यह लेख उद्मी से राज्‍यसभा के सांसद बने राजीव चंद्रशेखर के कारोबारी सौदों में हितों के टकराव के बारे में था जो बीजेपी के करीबी माने जाते हैं और रिपब्लिक टीवी में जिनकी बहुलांश शेयरधारिता है। चंद्रशेखर ने  लेख के खिलाफ़ अदालत में एक मुकदमा दर्ज कराया जिसके बाद से वेबसाइट ने इस लेख को हटा दिया है।
इसीलिए हमें थोड़ा आश्‍चर्य हुआ जब नए चैनल की पीआर (जनसंपर्क) टीम की ओर से हमारे पास एक अनुरोध आया कि क्‍या अर्नब पर कवरस्‍टोरी की कोई गुंजाइश बन सकती है, वो भी बाकायदे एमडब्‍लू शैली वाले शूट के साथ। यह इंटरव्‍यू एक साझा कार्यस्‍थल पर लिया गया जो मुंबई की एक पुरानी मिल के परिसर के भीतर मौजूद है जहां अर्नब आजकल बैठ कर सारा काम निपटा रहे हैं। वे थोड़ा देर से पहुंचते हैं, सामान्‍य कपड़ों में, दाढ़ी ताज़ा कटी हुई है और सिर के बाल टाइम्‍स नाउ के दिनों के मुकाबले थोड़ा ज्‍यादा लंबे हैं। हम तकरीबन चौंक जाते हैं जब वे काफी शांति और विनम्रता से अपना परिचय देते हैं (और देर से आने के लिए माफी मांगते हैं); टाइम्‍स नाउ पर उनकी निर्मित छवि का प्रभाव ऐसा है कि किसी के भी दिमाग में उन्‍हें सोचते ही और कोई खयाल आता ही नहीं, सिवाय आग उगलते उनके बददिमाग चेहरे के जो हलका सा उकसाने पर आपको चबा जाएगा।
वे काफी तेजी से एक कुर्सी पर जम जाते हैं और इशारा करते हैं कि वे तैयार हैं। वे लड़खड़ाते कम हैं और उनके स्‍वर में इस्‍पात जैसा संकल्‍प दिखता है; साफ़ है कि उन्‍हें इससे कोई मतलब नहीं कि उनके कहे पर लोग कैसी प्रतिक्रिया देंगे (जैसा कि आप शायद इस स्‍टोरी के शीर्षक को देखकर बता सकते हैं)। एक बात और साफ़ है कि वे वास्‍तव में यह मानते हैं कि एक पत्रकार से ज्‍यादा वे एक मुक्तिदाता हैं और रिपब्लिक टीवी समाचारों की हमारी परिचित दुनिया की शक्‍ल बदलने जा रहा है। जिसे वे ”लुटियन दिल्‍ली” की पत्रकारिता कहते हैं, उसके प्रति और लिबरलों के प्रति अपनी नफ़रत को छुपाने की वे कोई कोशिश नहीं करते। जहां तक उनका प्रश्‍न है, लिबरल की उनकी परिभाषा यह है कि ”मैं मानता हूं कि आपको सेना-समर्थक और देशभक्‍त होना चाहिए।” अगर ऐसा करने से कोई दक्षिणपंथी हो जाता हो, तो वे मानते हैं कि 100 फीसदी भारत को ”दक्षिणपंथी हो जाना चाहिए”।
दो दिन बाद कवर शूट पर उनका उत्‍साह देखते ही बनता है। वे खुद को सेट पर दूसरों से परिचित करवाते हैं और इस बात से वे बेहद आह्लादित हैं कि इस तरह पहले कभी भी उनकी तस्‍वीर नहीं उतारी गई। वे हर शॉट को काफी करीने से देख रहे हैं और शैली व फोटाग्राफी से अपनी आश्‍वस्ति ज़ाहिर कर रहे हैं। वे हर एक को निजी रूप से धन्‍यवाद देते हैं और सब से कहते हैं कि रिपब्लिक टीवी शुरू होने पर सब उसे देखें।
जहां तक उद्घाटन का सवाल है, तो इस इंटरव्‍यू में पूछे गए प्रश्‍नों को (फॉलो-अप प्रश्‍नों के अलावा) उनकी पीआर टीम ने तैयार किया था। हमें दो सवालों से बचने को कहा गया था। पहला सवाल रिपब्लिक टीवी के स्‍वामित्‍व और राजीव चंद्रशेखर के बारे में था, कि क्‍या बीजेपी से सांसद की निकटता चैनल के स्‍वतंत्र चरित्र के खिलाफ जाती है। दूसरे, चंद्रशेखर और दि वायर के बीच जारी कानूनी जंग में विवादित स्‍टोरी पर गोस्‍वामी के निजी पक्ष से जुड़ा सवाल था। हमने पूछा कि क्‍या यह किसी लोकतंत्र के लिए स्‍वास्‍थ्‍यप्रद होगा कि प्रेस के साथ किसी भी तरह की कोई छेड़छाड़ की जाए। गोस्‍वामी ने परोक्ष तरीके से ही सही, दि वायर के बारे में अपनी राय रखी।
टाइम्‍स नाउ पर दस साल से ज्‍यादा समय तक गोस्‍वामी रात की हंगामेदार बहसों की सदारत करते रहे जब उन्‍होंने हर रात दर्जनों पैनलिस्‍टों को अपमानित किया, नाराज़ किया और शर्मिंदा किया। आप उन्‍हें पसंद करते हों या नहीं, लेकिन इन्‍होंने हमेशा के लिए भारत के टीवी समाचारों का चेहरा बदल डाला- कभी बीबीसी की तर्ज पर चलने वाले चैनलों का विनम्र अवतार आज टकराव भरी बहसों और आक्रामक संस्‍करण में तब्‍दील हो चुका है। यह इंटरव्‍यू अगर कोई संकेत है, तो कह सकते हैं कि रिपब्लिक टीवी के साथ वे दूसरी पारी के लिए तैयार हो रहे हैं।

(मैन्‍स वर्ल्‍ड पत्रिका से साभार)